Saturday, March 1, 2008

बहस छोड़ें, बस ब्लॉगिंग करें

हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर्स पर इन दिनों काम की पोस्ट ढूंढ़ने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। कुछ लोग बहस में जुटे हैं, अभद्र भाषा है, आरोप हैं, प्रतिबंध लगाने की बात है और कहीं दबी छुपी गुट बंदी की बात भी। मैंने कहीं मन में पक्का कर रखा था कि मैं ब्लॉगिंग पर होने वाली इस प्रकार की किसी भी आपसी छिंटाकशी से दूर रहूंगा और बस जो अच्छा लगेगा वह पढूंगा, सुनूंगा। मेरा मानना है कि ब्लागिंग स्वतंत्र अभिव्यक्ति का एक ऐसा मंच है जो संपादकीय कतर ब्यौंत से परे औऱ मन की अपने विचारों की, सोच की अभिव्यिक्ति है। इसके चलते पिछले कुछ समय में( मैं पिछले लम्बे अर्से से यहां हूं) एकाएक हिन्दी ब्लॉगसॆ की संख्या में अच्छी खासी बढोतरी हुई। कई अच्छे ब्लॉग्स हैं। जिन पर बहुत कुछ ऐसा आता है जो मन को भाता है। इसके चलते लग रहा है कि चलो अच्छा है इन्टरनेट ही सही एक मंच तो मिल रहा है लोगों की भावनाओँ, लेखन को जानने का। हां, कुछ ब्लॉग ऐसे भी हैं जिन पर जाने का कोई मन नहीं होता, इन्फेक्ट वहां जाता भी नहीं हूं। हिन्दी ब्लॉगिंग की इस समृद्धता से मन प्रसन्न है। कुछ ब्लॉग अपनी राग गाते हैं, उनका अपना चरित्र है, वहां जाने वालों को वह अच्छा भी लगता होगा। यही तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। यहां लोग अपनी बात कर रहे हैं, समाज की बात कर रहे हैं, अपने अंदाज में कर रहे हैं, अपनी पहचान से कर रहे हैं, छद्म पहचान से कर रहे हैं, पर कर रहे हैं। अब सवाल उठता है निजी मान अपमान का? तो एक बात तो हम सभी ब्लॉगर्स को समझ लेनी चाहिए की हम यहां अपनी रिस्क पर हैं। किसी ने भी हमें ब्लॉग बना कर अपने बात पोस्ट करने के लिए जबरन नहीं उकसाया है। हर कोई जो भी लिख रहा है अपनी इच्छा से लिख रहा है। सारी समस्या है, प्रतिक्रिया की। हम अपने लिखे की टिप्पणी चाहते हैं और साथ चाहते हैं कि हर कोई हम से सहमत हो। असहमत होने पर हम अपनी सफाई भी देते हैं। बस यहीं से विवाद शुरु हो जाते हैं। मुझे तरकश वाले संजय जी की एक पोस्ट में इस टिप्पणी पुराण का महत्व, साइड इफेक्ट, समझ आया और मैंने उसी समय से अपने ब्लॉग पर से टिप्पणी का ऑप्शन हटा दिया। यानी अपने ब्लॉग पर जो मैं लिख रहा हूं अपनी अभिव्यक्ति के लिए है न की किसी अन्य से प्रशंसा पाने के लिए। अन्य से प्रशंसा पाने के लिए नौकरी ही बहुत है। इन दिनों ब्लॉगवल्डॆ में चल रहे सारे झगड़े की जड़ यही टिप्पणी आकांक्षा है। लोग मिलने चाहिये अपने बौद्धिक विचारों को आपस में बांटने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लेकिन शायद यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर धड़े बंदी हो गई है। ऐसा नहीं है कि मैं किसी को गाली दिए जाने या किसी का अपमान करने का पक्षधर हूं। यह अधिकार किसी को भी नहीं होना चाहिए। जो लोग ऐसा कर रहे हैं वे गलत हैं, पर इन्हें तरजीह देना भी गलत है। इनकी ओर ध्यान दिए बिना यथावत अपने अनुसार पोस्टिंग करते रहें तो ही हिन्दी ब्लॉगिंग का बढ़ता कारवां अनवरत बढ़ता रह सकता है।
आप कहेंगे कि जब मैंने इस विषय पर नहीं लिखने का सोच रखा था तो ऐसा क्या हो गया कि इतना लम्बा लेख दे मारा। दरअसल आज इरफान के लेख में मैंने हिन्दी ब्लॉगिंग की ओर एक निराशा का भाव देखा। इरफान एक बहुत अच्छे ब्लॉगर हैं और उनकी बहुत सारी पोस्ट, पॉडकास्ट ने हिन्दी ब्लॉगजगत को समृद्ध किया है। उनका या उनके जैसे लोग यदि इस प्रकार की बहसों से विचलित होजाएंगे तो ब्लॉगिंग का नुक्सान हो सकता है। इसलिए सभी लोगों से खासकर इस प्रकार की बहसों में हिस्सा लेने वालों से एक ही आग्रह है कि जिसे जो पोस्ट करना है उसे उसके ब्लॉग पर पोस्ट करने दें। आपकी उससे मतभिन्नता है तो अपने ब्लॉग पर उसे जाहिर करें। लेकिन प्रतिबंध की बात न करें। यह तय है कि सनसनी बिकती है और उसकी टीआरपी भी ज्यादा होती है लेकिन हर कोई उसका रुख करेगा तो ब्लॉगजगत भी हिन्दी न्यूज चैनलों की राह पकड़ लेगा। इस विवाद पर ये मेरा पहला और आखिरी पोस्ट है। बस सबसे गुजारिश है कि धड़े बंदी करने की बजाय अभिव्यक्त करते चलें। जितनी ज्यादा अभिव्यक्तियां होंगी ब्लॉग्स उतने ही लोकप्रिय होंगे। अभी प्रश्न किसी एक को रोकने का नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को बुलाने का है। तो बस ऐसा लिखें की अन्य लोग भी ब्लॉग बनाएं औऱ ब्लॉग एग्रीगेटसॆ की २४ घण्टे की सूची में पोस्टिंग की सूची लम्बी होती जाए। सादर....


पुनश्चः यहां किसी को निजी तौर पर प्रताड़ित करने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए,इसके लिए सम्बंिधत को तुरन्त साइबर कानून का सहारा भी लेना चाहिए। निजी जानकारी को सार्वजनिक करना एक घृणित कृत्य है। मेरी नजर में किसी के नम्बर को उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक करना भी ऐसा ही है। इस प्रकार की ब्लॉगिंग करने वाले कृपया ऐसा न करें।

Thursday, February 28, 2008

शून्य का आकार

विशेष भंगिमाओं और चहरे के भावों से शून्य के केनवास पर कोई आकार उकेर देना असंभव नहीं पर मुश्किल बहुत होता है। पर जब भी ऐसा होता है, दर्शक स्तब्ध और मंत्रमुग्ध हो जाता है। कुछ ऐसा ही नजारा था, मंगलवार की शाम जयपुर के रवीन्द्र मंच पर । कथक नर्तकी उमा डोंगरें ने वात्सल्य का रस सभागार में घोला तो मानो पूरा सभागार ही एक मां के दुलार रम गया। गोदी में झूलता बाल गोपाल और उसकी अदाओं पर रीझती मां। कोई मां जब अपने बालक को नहलाती और तैयार करती होगी तो कितनी आत्मतुष्टी मिलती होगी, इन मनोभावों को किसी अभिनेत्री के प्रदर्शन में भी इतनी सुघड़ता से नहीं उभारा गया होगा जितनी कुशलता से उमा डोगरे ने कथक की प्रस्तुति में साकार किया। होठों की स्मित मुस्कान बालक की दिखाई जा रही बालक्रिड़ाओं का अहसास करवा रहे थे। बच्चे की मालिश के दृश्य उसके हुष्ट-पुष्ट होने का अहसास करवा रहे थे। वाकई बिना किसी बालक के मंच पर उपस्थित हुए उमा ने एक ऐसे बालक का अहसास करवा दिया जो न केवल चंचल था बल्कि नटखट भी था। जिसकी सुन्दरता को अहसास करते हुए उसे काला टिका लगाने का हर दर्शक का मन कर रहा था। जो जब तब मां का आंचल खींच लेता था, और काग के ग्रास खा जाने का भय दिखाने पर ही कौर खा रहा था। मैंने अपनी सहकर्मी के आग्रह पर पहली बार ही कथक की कोई प्रस्तुति देखी थी और इन वात्सल्य प्रस्तुति से पहले तक पूरा कार्यक्रम मुझे कुछ खास प्रभावित नहीं कर पा रहा था। शायद इसीलिए बाज लोग पहुंचे हुए कलाकारों को उस्ताद कहते हैं जो चंद क्षणों में ही ऐसा समां बांध देते हैं कि लगता है कि यदि यह नहीं देखा होता तो कभी नहीं लगता कि ऐसा भी होता है। पर मुझे फिर भी लगता है कि इन कलाकारों को अपनी वरिष्ठता को मंच पर जाहिर नहीं करना चाहिए। अक्सर लोग नहीं चाहते फिर भी कुछ अव्यवस्थाएं हो जाती हैं, लेकिन वे इन्हें तुच्छ मान लें तो ही उनकी हस्ती दर्शकों और प्रशंसकों के मध्य बनी रहती है।

Wednesday, February 20, 2008

बजट बसंती से रंग दे बसंती

हा सखी बसंत आयो,बजट आयो। अबके फागुन तो चुनावी बयार है तो बजट भी बसंती टच लिए होगा। बसंत की ये बयार जिस ओर भी बहेगी, बस निहाल कर देगी। रुपया आएगा और खो जाएगा। हमें इक्कीसवीं शती में ले जाने वाले हमारे एक स्व. भारत रत्न तो कह भी गए थे कि जो रुपया दिल्ली से चलता है वो अपने गंतव्य तक पहुंचने पर घिस कर चौदह पैसे मात्र का रह जाता है। और ये होता है जनकल्याणकारी योजनाओं में। तो भाई इसमें बुराई भी क्या है, जब योजना जन कल्याणकारी है तो उसे बनाने और अमलीजामा पहनाने वाले भी तो जन ही हैं उनका कल्याण क्यों जरूरी नहीं होना चाहिए। हां, लेकिन एसी जनकल्याणकारी योजनाओँ की गुंजाइश बसंत वाले बजट में ही होती है।इस बार तो डबल झटका है, हमारा सूबा औऱ केन्द्र का निजाम दोनों ही जन अदालत में जाने वाले हैं तो मिलकर लुटाने का इरादा है। देखिए क्या क्या लुटता है। पर सवाल है कि पिछले बजट में हुई घोषणाओं का क्या होने वाला है। वैसे यह सवाल बेमानी है क्योंकि हर नए सवाल के उठने पर पुराना सवाल खारिज हो जाता है। यह भी वैसे ही खारिज है, क्योंकि हमसे पहले भी बहुतों ने उठाया था आगे भी उठाया जाएगा। नियति हर बार एक ही होनी है। पता चला है कि सालों पहले आंध्रप्रदेश में सुपर स्टार एनटीआर का आजमाया फार्मुला इस बार सूबे में भी आजमाया जा सकता है। चावलों के भरोसे आंध्रा की गद्दी पाने वाले एनटीआर का प्रतिपादित किया हुआ सस्ता अनाज फार्मुला कई जगह जम कर चला। अबके सूबे की रिआया को भी एसे ही किसी फार्मुले के जरिए लुभाने की कवायद हो सकती है। पर सवाल उठता है कि क्या दिनों दिन बिगड़ते घर के बजट को नियंत्रित करने की कोई कवायद इन बजटों में होगी? पट्रोल, रसोई गैस को सरकार ने कमाई का साधन क्यों समझ रखा है। क्या ये कोई विलासिता की वस्तु है। केन्द्र और राज्य दोनों ही सरकारें इस इंधन पर जमकर कमाई करते हैं। जैसे लोग इसे मजे के लिए उड़ाते हैं। अब जबकि हर घर में साइकिल नहीं मोटरसाइकिल है, औसतन हर मध्यम वर्गीय घर में एक छोटी कार है, क्यों नहीं सरकार इन पर लगा टैक्स हटा देती और इन्हें पूरी तरह बाजार के हवाले कर देती। हमें नारा मिलता है सब्सिडी का। ये खेल है दस रुपए छीन कर दो रुपए एहसान के साथ वापस देने का।क्या कोई हमें इस खेल से मुक्ति दिलाएगा। सही मायनों में तो बजट का बसंत तभी बहारों वाला होगा जब हर साल बढ़ती पैट्रोल डीजल की किमतों पर से सरकार अपना हिस्सा लेना बंद कर दे। क्या होगा एसा रंग दे बसंती बजट?????????? नहीं तो ये बसंत भी हा हंत ही साबित होगा।

Saturday, February 16, 2008

दुनिया के सारे पुरुषों एक हो जाओ....

दुनिया के सारे पुरुषों एक हो जाओ....
एक बेरोजगार आत्महत्या के बाद जब परालोक में पहुंचता है तो जब वहां अपनी मृत्यु का कारण बेरोजगारी बताता है, तो कारण लिख रहे क्लर्क ने एकाएक अपने हाथ रोक लिए और कहने लगा, तुम नए लोगों को कुछ समझ नहीं आता, प्रगति के नाम पर जाने क्या कर रहे हो। इन दिनों ऊपर आने वालों लड़कों में बेरोजगारी ही एक बड़ा फैक्टर है। ससुरे समझते ही नहीं हैं जाने कौनसी समानता का राग अलाप रहे हैं। अब झेलो समानता, छोकरियां ही नौकरियां ले रही हैं और इनके पास तो कोई काम नहीं है। खैर भाई आ गए हो तो अन्दर चलो, पर यहां समानता का राग मत अलापना। युवक को अन्दर जाते ही घोड़े पर विराजमान बालों को पीछे चोटी की तरह बांधे हुए एक शख्स के दर्शन हुए, तलवार हाथ में लिए कुछ चिन्तातुर सा यह शख्स पहला सवाल दागता है, सुपर ट्युसडे का क्या रहा? ये क्या होता है? अरे भाई वहां मेरे सिंहासन पर कौन बैठने वाला है? आपका सिंहासन? हां वही जिसे बड़ी मुश्किल से बनाया था। अब तक तो सब ठीक था, पर लगता है इस बार कोई गड़बड़ है, या तो कोई लेडी होगी या कोई ब्लैक. पूरा सिस्टम तहस नहस करने पर तुले हैं, पता नहीं क्या हो गया है धरती के पुरुषों को जो अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने चले हैं। हमें पता था कि एक बार यदि इन लेडिजों,यही कहा गया था, (महिलाओं) को यदि घर से बाहर निकलने दिया तो सारे जेन्टसों की जरुरत ही नहीं रहेगी। पहले कहा पढ़ाओ, पढ़ाया तो नतीजा देख लो, सारे काम धन्धों में हर तरफ महिलाएं ही महिलाएं नजर आ रही हैं,तुम कहते थे, इन्हें सॉफ्ट काम देंगे, ऐसा सॉफ्ट काम दिया कि खुद ही सॉफ्ट हो गए। अब देखो हर हार्ड काम पर ये सोफ्ट गल्सॆ ही दिख रही हैं। सेना से लेकर सोफ्टवेयर तक। दुकान से लेकर मकान तक। और अब राजनीति में भी ये ही दीखेंगी। हम तो जानते थे कि ये जो मादा है यह आदम से ज्यादा समझदार है,इसलिए तरकीब लगाई और इसे घर तक ही रखा था। इसीका नतीजा था कि सबसे ज्यादा सभ्य होने का दम भरने वाले देश में भी आज तक कोई महिला नेतृत्व करने के लिए तरस रही है। पर अब देखो क्या होगा? संकट ये नहीं है कि लड़कियां राज करेंगी। संकट ये कि फिर ये बिचारा मर्द करेगा क्या। लड़कियां तो घर का काम करके और बच्चे पालकर ही खुश थीं। क्योंकि उन्हें लगता था कि कुदरत ने उसे इन्हीं कामों के लिए बनाया है, पर मर्द क्या करेगा? नौकरियां सारी आधी दुनिया के हवाले होती जा रही हैं। घर चलाना औऱ बच्चे पालना मर्द को कभी आ नहीं सकता। क्योंकि उसमें वो सहज संभाल करने की आदत नहीं होती। और फिर अब तो विग्यान ने ऐसा काम कर दिया है कि बच्चे पैदा करने के लिए भी लड़कियों को लड़कों की जरुरत नहीं होने वाली। राज और काज करेंगी लड़कियां और लड़कों को घर के काम करवाएंगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो लड़कों को बेरोजगारी के चलते मर कर ऊपर ही आना है। तुम भी ऐसे ही आए हुए लगते हो।
लड़का बेचारा अवाक, वाकई उसे याद आने लगा कि वह जहां जहां भी नौकरी के लिए गया हर जगह किसी न किसी लड़की का ही सलेक्शन हुआ। उसकी महिला मित्र भी एक बैंक में अच्छे पैकेज पर काम करती थी। चाहती थी कि लिव इन रिलेशन में वह ही सारे काम करे। बर्तन, कपड़ों और खाना बनाने तक तो ठीक था। पर उसकी दोस्तों के सामने पानी सर्व करने और , बड़ा अच्छा है, कहां से लाईं? जैसी बातें सुन कर ही तो उसने मरने का मन बनाया था, ये अलग बात है कि सुसाइड नोट में उसने बेरोजगारी का जिक्र किया था। ये चोटी वाला बात तो ठीक कह रहा है। इसका इलाज क्या हो यह भी इससे ही पूछना चाहिए। सर इसका कोई हल? हल मेरे पास नहीं है,हल वो सामने जो दाढ़ी वाला है, वो ही हल निकालने का दावा करता है, उसी से पूछो?
लम्बी सफेद हल्की काली दाढ़ी वाले ने एक ही मंत्र दिया- दुनिया के सारे मर्दों एक हो जाओ.

Friday, February 1, 2008

धोनी को धोया मीडिया ने

कहते हैं क्रिकेट बाय चांस, पर मीडिया टेक्स नो चांस। जी हां कुछ ऐसा ही होता है जब क्रिकेट में जीत होती है, धोनी का बल्ला चमकता है तो हैडलाइन होती है मैदान के सूरमा,धोनी के शेरों ने जीता जग लेकिन जब हार होती है तो हैडलाइन बनती है बन गया चूरमा, धोनी के शेर कागज के शेर। कुछ यही हाल है हमारे मीडिया का। हर दिन नई कहानी औऱ नई इबारत लिखता है, जो आज कहा जा रहा है वह कल नहीं कहा जाएगा, जो कल कहा जाएगा उसकी खबर खुद कहने वाले को ही नहीं है। आत्मविश्वास से लबरेज महेन्द्र सिंह धोनी ने कहा प्रेक्टिस मैच हो जाएगा, तो मीडीया भी यही कह रहा था, विश्वचैम्पियनों के लिए बहुत आसान साबित होगा २०२० का यह खेल। मैच हुआ नतीजा आया वो हम सब जानते हैं, लेकिन मीडिया के सुर बदले और पूरी टीम के धराशायी होने के चलते हारने वाले इण्डिया के मीडिया का निशाना बने धोनी। अब हर चैनल के अपने अपने विशेषग्य हैं, एक महिला विशेषग्य है, क्रिकेट विश्लेषक हैं और अपने क्रिकेट प्रेमी तो हैं ही, सब मिल कर ठोंकना शुरु करते हैं, दे दना दन। नतीजा होता है हर नया बोलने वाला पहले वाले से कुछ ज्यादा बोलता है,सनसना कर बोलता है क्यों सनसनी बिकती है। कार्यक्रम जब अन्त तक पहुंचता है तो कार्यक्रम के साथ ही किसी का क्रियाकर्म हो जाता है। ये तो शुक्र है कि हमारी टीम का चयन मैदान के प्रदर्शन और बोर्ड के संबंध के तालमेल से होता है, कहीं जनमत या इन विश्लेषकों के भरोसे होता तो सोचिए कब क्या हो जाता किसी को भी दूसरा मौका तो मिलता ही नहीं। खैर अपनी बात तो बहुत हुई पर एक सवाल है, ये इलेक्ट्रोनिक वाले इतना क्यों बोलते हैं, इतना बोलना जरूरी है तो ऐसा क्यों बोलते हैं, भई आपको चाहे ये ट्रेड ट्रिक लगती हो पर यकीन मानिए हिन्दुस्तानी घरों में तो आप किसी लाफ्टर शो के कैरेक्टर से ज्यादा तवज्जो नहीं पा रहे हैं। आपकी हर अतिरंजित टिप्पणी पर एक ठहाका होता है और रिमोट अगले चैनल की तरफ कदम बढ़ा देता है। पर यदि फिर भी इलेक्ट्रोनिक के इस कारनामे में आपको कोई तर्क नजर आता हो भई मुझे जरूर बताना कुछ ग्यान वृद्धि ही सही................

Thursday, January 31, 2008

सावधान मा बदौलत पधार रहे हैं...

मीडिया भी कई बार बेईमान बलम सा व्यवहार करता है, जब जिसे जिस तरह की कवरेज की जरूरत होती है तब तो करता नहीं, पर कभी बिना मांगे ही इतनी कवरेज देता है कि बस निहाल कर देता है। करोंड़ों का एडवर्टाइजिंग बजट एक ही दिन में पूरा कर देता है। कुछ यही हाल इन दिनों आशुतोष गोवारीकर का है। जब वे नहीं चाहते थे की फिल्म की ज्यादा चर्चा हो, मीडिया उनका पीछा करे तब वे जयपुर के महलों औऱ खुले मैदानों में मीडियाकर्मियों से दूरी बनाए चलते थे। लेकिन एश अभिषेक के किस्सों का दीवाना मीडिया एश की तलाश में आशुतोष की यूनिट का पीछा ही नहीं छोड़ रहा था। और अब जबकि फिल्म प्रदर्शन के लिए तैयार है, मीडिया है कि जोधा अकबर को पूछ ही नहीं रहा। लेकिन अपने आशुतोष भाई को भी लगता है किसी तगड़े पीआर मैनेजर का साथ मिल गया है। जिसने और कुछ नहीं तो जयपुर के पूर्व राजघराने के लोगों को फिल्म दिखाने की सलाह दी औऱ आशुभाई एसा कर गुजरे।बस फिर क्या था, जोधा अकबर खबरों में, राजघराने ने फिल्म को क्लीन चिट दी, अऱे भाई जैसे राजघराना अब सेंसर बोर्ड हो गया हो। मानो यदि फिल्म के निर्माण के बाद राजघराना आपत्ति करता तो आशुभाई तो फिल्म को डिब्बा बंद ही कर देते। लेकिन आप यकीन मानिए आशु भाई का टोटका चला औऱ जमकर चला। खबरिया चैनलों ने तो बड़ी सी स्टोरी कर दी। राज्य के एक राजपूत धड़े को भी इसके विरोध में खड़ा कर दिया। कोई बड़ी बात नहीं कि फिल्म आने से पहले एक दो धरने प्रदर्शन औऱ हो जाएँ तो खबर की गुणवत्ता बढ़ जाएगी। टाइम स्पेस भी ज्यादा मिल जाएगा। जोधा अकबर के फुटेज तो आशुभाई ने दे ही दिए हैं। कुल मिलाकर विवाद की उंगली थाम कर फिल्म चलाना औऱ प्रचार करना अब आशुतोष गोवारीकर को भी आ गया है। तो अब तैयार हो जाइए न्यूज बुलेटिन में एक न एक स्टोरी आपको मा बदौलत से जुड़ी मिलेगी.....

Wednesday, January 30, 2008

साहित्य के नाम पर सनसनी...

पिछले दिनों जयपुर में साहित्य के नाम पर एक जोरदार मजमा जमा, मजमा इसलिए कि यहां साहित्यकार भी थे, साहित्यप्रेमी भी थे, साहित्यचर्चा भी थी, पर निष्कर्ष नहीं थे। पहले ट्रांसलेटिंग भारत औऱ फिर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के रूप में यह जमावड़ा करीब सात दिन चला। देशी विदेशी साहित्यकारों की भीड़ में जयपुर जैसा टूरिस्ट डेस्टिनेशन जाहिर है विदेशियों के लिए ज्यादा मुफिद रहा औऱ अंग्रेजी के सत्र, साहित्य पर खूब कहकहों औऱ मानसिक विलासिता के दौर चले। पर इसका अंत कुछ अजीब रहा। चंद साहित्यकारों ने भाषा के गौरव की बात कर इस आयोजन से जुड़ीं एक प्रमुख साहित्यकार को ही निशाना बना डाला। फेस्टिवल में किस भाषा के कितने सत्र होने चाहिए, या किसे कितना समय मिलना चाहिए ये प्रश्न अलग हैं जिनका जवाब आयोजन औऱ उसके उद्देश्य के साथ केवल आयोजकों के पास ही होते हैं पर किसी छोटी सी बात को बढ़ा चढ़ा कर कहना या तिल का ताड़ बना देने से तो एसे सवालों का जवाब नहीं मिल सकता। हां, इस सारे विवाद, एक समाचार पत्र ने तो हद ही कर दी न केवल समय पर सत्र पूरा करने के आग्रह को, जो की किसी भी आयोजन में आयोजक की ओर से करना अपेक्षित होता है, अतिरंजित किया गया बल्कि प्रदेश भर के कई साहित्यकारों को ,जिन्होंने शायद इस घटना का केवल वह पक्ष देखा था जो उन्हें दिखाया गया था,भी इस सब में घसीट लिया गया। मानो किन्हीं दो लोगो को समय पर या संक्षेप में कुछ कहने के आग्रह से कोई ललकार मिल गई हो। हकीकत में अतिवादिता आयोजक की नहीं बल्कि इस घटना को ऐसा रूप देने वाले दुराग्रही की है। मैं इसे दुराग्रह ही कहूंगा। हालांकि आयोजक ने विवाद को अनावश्यक तूल नहीं देते हुए अपनी और से खेद व्यक्त किया गया। इसे भी आयोजक का बड़प्पन ही मानना चाहिए। क्या ये अतिरन्जना प्रदेश के छोटे साहित्यजगत में पनप रही किसी समूह विशेष को बढ़ावा देने या प्रश्रय देने की शुरुआत तो नहीं है। अक्सर मुझे साहित्य जगत में इस प्रकार के समूहों की बू तो आती है जो, तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी पीठ खुजाऊं की रणनीति पर काम करते हैं। एक निरपेक्ष पाठक के तौर पर केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि भाषा का गौरव उसमें अपना अमूल्य योगदान देने से बढ़ता है न कि इस प्रकार के थोथे मुद्दों को उछालने से। अच्छा होता ये साहित्यकार इसी समय को एक दो बढ़िया रचनाओँ में लगाते तो साहित्य भी समृद्ध होता औऱ वे भी।

Thursday, January 10, 2008

सड़क सुरक्षा सप्ताह में घर से बाहर निकलने के टिप्स


इन दिनों यातायात पुलिस सड़क सुरक्षा सप्ताह मना रही है। जैसा की पुलिस वालों की खासियत होती है कि या तो वे दोस्त होते हैं या फिर.... आप समझ लें। सड़कों की सुरक्षा के इस अभियान के दौरान हर वाहन चालक उनके लिए दोस्त की श्रेणी में तो कतई नहीं आता। सवाल सड़क की सुरक्षा का होता है इसलिए सड़क पर चलने वाला हर शख्स उनका दुश्मन नम्बर वन होता है। ऐसे में वे चाहे जिसे पकड़कर दुश्नमन करार दे सकते हैं, यदि आप ऐसी किसी दुश्मनी से बचना चाहते हैं तो पेश हैं कुछ सुझाव जिन पर अमल कर आप सकुशल बिना चालान घर वापसी कर सकते हैं। - घर से निकलते समय अपने वाहन को हर ओर से चैक करें। सारे नम्बर दुरुस्त हैं या नहीं यह जरुर देखे। उनका आकार प्रकार नियमों के अनुसार है या नहीं, भले ही आपके सामने वाले शर्मा जी जो ट्रैफिक पुलिस में हवलदार हैं, की मोटरसाइकिल के नम्बर अगड़म बगड़म शैली में हों, आप अपनी चिन्ता किजिएगा,क्योंकि भाई सवाल सड़क की सुरक्शा का है।- अपने वाहन की लाइट जला कर देख लें, रोशनी पूरी है या नहीं, भले ही आप शाम चार बजे ही घर लौट आते हों, पर अभी इसका जलना जरूरी है। सप्ताह खत्म होने के बाद आपकी लाइट भले ही खराब हो जाए कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर अभी तो सप्ताह चल रहा है....।- वाहन के सारे कागज ठीक प्रकार से ढूंढ कर निकाल लें और सम्भालकर साथ में रख लीजिएगा। फोटोप्रति के साथ ही मूल प्रति भी। कुछ ट्रैफिक वाले भाई फोटो प्रति को मूल प्रति का सा सम्मान नहीं देते। सप्ताह खत्म होने के बाद आपसे कोई कागजात के बारे में नहीं पूछेगा इसलिए उन्हें अगले साल तक आप कहीं भी भूल सकते हैं, पर अभी हर्गिज नहीं भूलें। - फिर बारी आती है प्रदूषण की। आपकी गाड़ी चाहे धुंआ देती हो या नहीं, आपके वाहन पर स्टीकर होना चाहिए औऱ पर्स में पॉल्यूशन अण्डर कंट्रोल का प्रमाणपत्र। सप्ताह के दौरान यह बहुत जरूरी है।- हेलमेट की सेहत पर जरा गौर फरमा लीजिएगा।- हां, ड्राइविंग लाइसेंस भी जरूरी है। यूं तो हमारी सड़कों पर हजारों लोग बिना लाइसेंस के वाहन चला रहे हैं पर यदि आपके पास लाइसेंस नहीं है तो आप इन सात दिन तक पिछली सीट पर ही बैठें।यानी अब आप पूरी तैयारी के साथ सड़क सुरक्षा सप्ताह में काम पर जाने के लिए तैयार हैं। पर सड़क पर भी ध्यान रखें यदि आपको किसी सफेद जिप्सी के पास दस पन्द्रह दुपहिया वाहन खड़े नजर आएं तो समझ लीजिए की वे सभी सड़क सुरक्षा का पाठ पढ़ रहे होंगे। न वहां कोई उन्हें नही बताता कि क्या सही है, क्या गलत बस बीच सड़क पर रोका जाता है, और दनादन सवालों की झड़ी लगा दी जाती है। कागज हैं? लाइसेंस है? पॉल्यूशन है? इतनी तेज क्यों चला रहे हो? अन्तिम सवाल सबसे अन्त में आता है और ब्रह्मास्त्र होता है। सारे सवालों का जवाब होता पर इसका जवाब नहीं होता है। इंटरसेप्टर हैं, पर वो इंटरसेप्टर ही आपको यकीन दिला देते हैं कि आप कहीं न कहीं तो गलत ही थे। बस आपका चालान हो गया औऱ आपने सीख ली सड़क सुरक्षा। तो एक बात याद रखिए कि आप चाहे साल भर ट्रैफिक नियमों का पालन करते हों या नहीं पर इस समय जबकि सड़क सुरक्षा सप्ताह चल रहा है आपको पुलिस नामक ,प्राणी, हां शायद प्राणी, को देखते ही उनका पालन शुरु कर देना चाहिए। पर फिर भी आप तय मानिए की आप सही ट्रैफिक नियमों का पालन करना जरूर सीखेंगे और इसका एक ही तरीका है, चालान। तो घर से निकल रहे हैं बस एक ही टिप है चालान के लिए तैयार रहें। या सात दिन के लिए गाड़ी घर रख दें औऱ बस में जीवन असुरक्शा सप्ताह के लिए निकल पड़िए।

Saturday, December 22, 2007

केसीके जर्नलिज्म अवार्ड

केसीके अवार्ड
राजस्थान पत्रिका समूह ने समूह संस्थापक एवं मूर्धन्य पत्रकार कर्पूर चंद्र कुलिश की स्मृति में कर्पूर चंद्र कुलिश अवार्ड २००७ ( केसीके अवार्ड- २००७) की घोषणा की है।पुरस्कार का उद्देश्य व्यावसायिक मूल्यों में नीति, नैतिकता, अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा और मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने का उल्लेखनीय कार्य करने वाले मीडिया लीडर एवं पत्रकारों को सम्मान देना है। वर्ष २००७ के अवार्ड की थीम मानव विकास है। केसीके अवार्ड के विजेता को ११,००० यू एस डॉलर ( करीब साढ़े चार लाख रुपए) का एक पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार के अलावा दस श्रेष्ठ प्रविष्टियों का विशेष रूप से उल्लेख किया जाएगा जिन्हें प्रशस्ति पत्र व पदक प्रदान किए जाएंगे। प्रविष्टि में शामिल में न्यूज स्टोरी किसी दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित होनी चाहिए। अधिक जानकारी के लिए www. rajasthanpatrika.com/kckaward पर विजिट किया जा सकता है। पुरस्कार के लिए प्रविष्टियों की अन्तिम तिथि ३१ जनवरी २००८ है।

Saturday, December 8, 2007

गुजरात तय करेगा देश का भविष्य

गुजरात चुनाव वाकई महज एक राज्य के चुनाव तक सीमित रहने वाले चुनाव नहीं रह गए हैं। दरअसल ये चुनाव कहीं न कहीं दक्षिण औऱ वाम पंथ की लड़ाई को निर्णायक दौर में पहुंचाने वाले हो गए लगते हैं। भाजपा में कोई कारआमद नेतृत्व नहीं होने के चलते गुजरात के चुनाव के नतीजे राष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा असर करेंगे। यदि गुजरात के नरेन्द्र भाई जीते तो उनके राज्य की राजनीति से आगे राष्ट्र् की राजनीति पर चमकने को तय मानिए। यदि वे खेत रहे तो राष्ट्रीय परिदृश्य से भाजपा के खेत होने की शुरुआत मानिए। भला हो बुद्धदेव का जो नंदीग्राम रच दिया औऱ वामपंथ औऱ दक्षिणपंथ का पलड़ा बराबर कर दिया वरना नरेन्द्र मोदी अकेले ही गोधरा को लेकर कोसे जाते और मुकाबला कड़ा नहीं हो पाता लेकिन अब मुकाबला आर पार का है। गुजरात तय करेगा कि हिन्दुस्तान में कौन जीतेगा। शायद इसीलिए राष्ट्रीय राजनीति में कम महत्वपूर्ण माने जाने वाला राज्य गुजरात के चुनाव में राष्ट्रीय मीडिया प्रणप्राण से जुट गया है। कवरेज करने नहीं बल्कि नतीजे प्रभावित करने में। कल की बात कर रहा हूं। एक औऱ तो अपने पंकज भाई एनडीटीवी पर पोरबंदर को चोरबंदर कहते हुए पिछले पांच साल में बंद हुई फैक्ट्रीयों का हिसाब किताब कर रहे थे। तो दूसरी ओऱ और आजतक औऱ हेडलाइन्स टुडे पर मोदी के समर्थन में ऑरकुट जैसी वेबसाइटों पर चल रहे अभियानों के बारे में जानकारी दी जा रही थी। कितना भयंकर विरोधाभास है, एक और ऑरकुट को संस्कृति पर खतरा बताने वाले लोग उसी की सहायता ले रहे हैं तो दूसरी ओऱ एक चैनल पूरी तरह विपक्ष की भाषा बोलता लग रहा है। सामान्यतया इस तरह के आरोप नेता प्रतिपक्ष अपनी प्रेस कांफ्रेंस में लगाता रहता है और प्रेस इसे इसी रूप में कवर करती है। स्वतंत्र प्रेक्षक के रूप में भारतीय मीडिया केवल माहौल की खबरें प्रसारित करने तक सीमित रहता दिखता रहा है। वो तथ्य प्रस्तुत करता है पर उसके नतीजे श्रोताओं, दर्शकों, पाठकों पर छोड़ता आया है, लेकिन इस बार खेल दूसरा लग रहा है। मीडिया तथ्य दे रहा है उसके नतीजे, निष्कर्ष दे रहा है और निर्णय के लिए एक लाइन भी दे रहा है। अब ये नीति कितनी कारगर होगी। कौन जीतेगा ये तो वक्त बताएगा लेकिन एक बात समझ नहीं आई कि जब हर ओर से मोदी की एक तरफा जीत की खबरें आ रही हैं तो मोदी ने विकास का गीत गाते गाते, सोहराबुद्दीन मामले को उछालते हुए हिन्दुत्व की टेर क्यों लगाई। कुछ तो बात है? ......गुजरात के नतीजों का देश की जनता को बेसब्री से इन्तजार है। खासकर राजस्थान की जनता को जिसकी वर्तमान मुख्यमंत्री के कार्यकाल को आज ही के दिन चार साल पूरे हुए हैं। गुजरात के चुनाव मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के अगले साल की दिशा औऱ उनकी कार्यशैली को तय करेंगे। आज चार साल का कार्यकाल पूरा होने के अवसर पर जयपुर में विशाल रैली आयोजित की गई। इस सरकारी सफलता के जश्न में काफी तादात में लोग जुटे। जयपुर की हर सड़क पर अभूतपूवॆ जाम था। एक किलोमीटर की दूरी पार करने में लोगों को एक घण्टा लग गया। पर सरकारी जश्न था इसलिए सब कोई हंस कर सह रहा था। जो मिला वही पूछ रहा था कि रैली कैसी रही । एक दो लोगों ने बताया है कि कोई एक लाख लोगों ने शिरकत की है। इस लिहाज से रैली सफल कही जाएगी। लेकिन इस भीड़ से भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होगा गुजरात की मतपेटी से निकलने वाला जिन्न। वह जिन्न राजस्थान ही बल्कि पूरे देश की भावी राजनीति को तय करने वाला है। यदि नरेन्द्र मोदी फिर गुजराते अगले मुख्यमंत्री होते हैं तो तय मानिए की वे भी मायावती की ही तरह एक न एक दिन लाल किले से भाषण देने के दावेदार बन जाएंगे। देखिए क्या होता है। पर गुजरात की दिलचस्प लड़ाई विधानसभा क्षेत्रों के साथ ही न्यूज चैनलों पर भी है। देखते रहिए औऱ मुस्कुराते रहिए,क्योंकि होगा वही जो मतदाता चाहेगा। और वो चाहता है किसी को कहता नहीं बस करता है. परिणाम अपना रंग दिखाएंगे और उसके बाद यही चैनल उसका विश्लेषण करते रहेंगे।

Friday, December 7, 2007

लिंक रोड , न केवल डेस्टिनेशन बल्कि जिंदगियां भी लिंक

लड़कियां-लड़कियां-लड़कियां ही लड़कियां, जिधर देखो उधर लड़कियां जाने अपनी अतिशय खूबसूरती के कारण या बदसूरती के कारण, लेकिन स्कार्फ बांधे चेहरा छुपाए, टाइट जींस औऱ शॉर्ट और बदन से चिपके हुए टॉप में अपने बदन के आकारों की नुमाइश करती लड़कियां। दो-दो चार चार के समूह में लड़कियां, हंसती खिलखिलाती औऱ किसी लड़के को अपनी और देखता पा कर झटका सा खाती लड़कियां। सड़क के इस छोर से उस छोर तक जहां देखो वहां खड़ी हैं लड़कियां।
शहर के एक मशहूर गर्ल्स कॉलेज के आगे से गुजरिए लड़कियां दिखाई देंगी। आप कहेंगे लड़कियां गर्ल्स कॉलेज बाहर नहीं तो क्या किसी ओनली फॉर बॉयज कॉलेज के बाहर दिखेंगी? सही है बात सामान्य है पर नजारा खास है। कॉलेज के बाह एक सर्कल है औऱ सर्कल जाहिर है चौराहे के बीच है। जब चौराहा है तो चार रास्ते भी हैं। एक रास्ता देश के प्रथम प्रधानमंत्री के नाम पर है तो दूसरा विश्वविद्यालय के घने जंगलों में खोना चाहता है। जो चौथा रास्ता है वो शहर की एक अन्य जीवनरेखा जा मिलता है औऱ अपने आप में मील का पत्थर है। कहने को यह रास्ता महज लिंक रोड है लेकिन जानने वाले जानते हैं कि यह आम रास्ता कितना खास है।
सूबे के बहुत से खास लोगों की ख्वाबगाह इसी रास्ते पर है। तो हम जान रहे थे कि ये लिंक रोड खास क्यों है। शुरुआत में ही जिन ढकी सी उघड़ी सी, शर्मिली सी, बेहया सी लड़कियों का जिक्र हुआ है वे अक्सर इसी लिंक रोड पर पाई जाती हैं। वैसे तो यह लिंक रोड छोटी सी है कुछ सौ मीटर लम्बी। पर आशिकमिजाज लोग इसे पार करने में घण्टों लगा देते हैं। उन्हें आशिकमिजाज कहना आशिकी की तौहीन हो सकती है। पर इस लिंक रोड पर ऐसी कई तौहीनें रोज होती रहती है।
लड़की धीमे- धीमे चली जा रही है। पीछे पीछे एक लड़का चला जा रहा है। लड़के के होठ हिल रहे हैं। मानो कुछ कह रहा है, लगता है लड़की सुन रही है, तभी तो बार बार उसका सिर हिलता जा रहा है, राम जाने हां कर रही है या नो कमेंट्स कह रही है। पर चाल बदस्तूर जारी है। सड़क खत्म हो रही है पर बात खत्म नहीं हो रही । न लड़की टल रही है न लड़का हट छोड़ रहा है। बात पूरी नहीं हुई इसलिए लड़की ने साइड बदली औऱ वापस चलना शुरु कर दिया। अब तक जो ट्रेक अप था अब डाउन हो गया है। ट्रेन पहले जा रही थी अब आ रही है। सिचुएशन वही है, अब लड़के के हाथ भी हिल रहे हैं। दोनों के बीच गैप कम हो गया है। लड़की अब सिर हिलाते हिलाते बीच बीच में कभी कभार हंस भी रही है। वापस सड़क खत्म हो रही है। और ये क्या सड़क खत्म हो गई। लड़की फुटपाथ के एक किनारे पर ठहर गई। उसे ठहरा देख लड़के ने अपना हाथ हवा में हिलाया और एक होंडा मोटरसाइकिल आ कर लड़के के पास रुक गई। मोटरसाइकिल लाने वाले सज्जन ने बड़ी आत्मीयता से उतर कर हेलमेट लड़के को थमाया। तब तक कुछ दूर खड़ी लड़की ने स्कार्फ निकाल और मुहं पर बांधने लगी। लड़के ने हेलमेट पहना औऱ मोटरसाइकिल पर सवार हो किक से उसे स्टार्ट किया। मोटरसाइकिल घुमाई और लड़की के पास रोकी। देखने वाले समझ रहे थे कि दोनों के बीच सब खत्म हो गया लेकिन ये क्या, लड़की बिना समय गंवाए मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठी और मोटरसाइकिल ये जा और वो जा.......।
इस दौरान लिंक रोड पर लड़कियों की संख्या बराबर उतनी ही बनी हुई थी। हां, इस बीच लड़कों के साथ बाइक पर बैठ कर जाने वाली लड़कियों की तादाद भी खासी थी। कुल मिला कर लिंक रोड लड़कियों को कॉलेज से शहर की जीवन रेखा मानी जाने वाली सड़क तक तो पहुंचा ही रही है, लेकिन साथ ही उनकी जीवन रेखा भी संवार रही है। है ना कमाल, लिंक रोड। आपके शहर में भी ऐसी कई लिंक रोड होंगी जरा कुछ देर रुक कर देखिएगा कैसे रोचक नजारे होते हैं। मुस्करा ना पड़ें तो कहियेगा।

Tuesday, December 4, 2007

पानी अमृत या कुछ और जयपुर आइए और देखिए



जयपुर को आप किस रूप में जानते हैं, जाहिर है गुलाबी शहर के रूप में या देश के पहले नियोजित शहर के रूप में ही जानते होंगे। बहुत ज्यादा हुआ तो अब रिअल एस्टेट के क्षेत्र में उभरते बड़े डेस्टिनेशन के रूप में जानते होंगे। राजस्थान की राजधानी के रूप में भी आपका इससे परिचय तो होगा ही। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यह शहर पानी के लिए भी जाना जाएगा। और वो भी नेगेटिव रूप में। इन दिनों जयपुर में पानी अमृत नहीं है। यहां दूषित पानी पीने से लोग मर रहे हैं। भारत के सबसे बड़े राज्य की राजधानी में पिछले कई दिनों से यह कहर बरप रहा है। सड़ी गली पाइप लाइनों में मिले सीवर के मल ने नल से निकल कर लोगों के प्राण हरने शुरु कर दिये हैं। जब से जयपुर आया हूं यहां के अखबारों में एक खबर हर दूसरे तीसरे रोज एक स्थायी कॉलम की तरह पढ़ता आया हूं। नलों से निकला लाल पानी। बदबूदार पानी, या नीला पानी। यानी पानी के दूषित होने की बात कहने वाले समाचार यहां के अखबारों की पेज तीन की लीड बनते आये हैं। लेकिन जाने क्या बात है कि इतना सब होने के बाद भी कभी यहां की पेयजल व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई। अब जब दूषित पानी से मौतों का सिलसिला शुरु हुआ है अफसर औऱ मंत्री अपना मुंह छिपाते घूम रहे हैं । लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ना। हम हिन्दुस्तानियों की फितरत ही एेसी है कि हमसे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, खुद हमें भी नहीं। कुछ दिन हम हल्ला मचाएंगे, जोर जोर से चिल्लाएंगे। और फिर चुप हो जाएंगे। चुप्पी तब तक जब तक फिर से कोई घटना नहीं घट जाए। फिर हल्ला औऱ फिर चुप्पी। यही क्रम है । और इस क्रम को सरकारी बाबुओं अफसरों की जमात अच्छी तरह समझ चुकी है। वो बर मौके का इन्तजार करती है,कब किस गाय से कितना दूध दूहना है,कब उसे बेकार कह उसकी बोली लगानी है,कब उसका रोम रोम बेच खाना है, और कब उसके बिक जाने पर हल्ला कर लोगों को याद दिलाना है कि है कि गाय तो हमारे लिए पूजनीय है, जो हुआ सो हुआ पर अब यह सुनिश्चित करना है कि फिर कोई दूसरा गाय का दूध न दूह पाए। लोग इकट्ठे होंगे हां, में हां मिलाएंगे, वाह क्या अफसर है, कहेंगे। और दूसरे दिन उसी अफसर के हाथों किसी अन्य गाय का दूध दूहे जाते देखेंगे। यही हाल जयपुर के जलदाय विभाग के अफसरों का है। सालों से खराब पाइप लाइन की दुहाई दे रहे हैं। लेकिन हर बार साल छह महीने में बदल जाने की खबरें प्रकाशित कर इतिश्री कर देतेहैं । जाने हकीकत में पाइपलाइन बदलती भी या नहीं। बस हमारी तो एक ही दुआ है कि कम से कम भगवान तो जयपुर पर कृपा बनाए रखें और गोविन्ददेव जी के इस शहर में अब पानी अमृत की जगह जहर न बने।

Monday, December 3, 2007

ब्लॉग वर्ल्ड के साथियों, मदद करो...नारद के फोन्ट नहीं दिख रहे


साथियों, काफी कोशिशों के बावजूद में एग्रीगेटर नारद और कई चिट्ठों में लिखी देवनागरी स्क्रिप्ट नहीं पढ़ पा रहा हूं , मुझे स्क्रीन पर शब्दों के स्थान पर केवल डॉट्स दिखाई दे रहे हैं। और ऐसा केवल चिट्ठों की प्रिविष्ठिओं के साथ हो रहा है। साइड बार में लिखे शब्द आसानी से पढ़े जा रहे हैं। मैंने इन्टरनेट ऑप्शन्स में जा कर ठभई कोिश की है। लेकिन बात कुछ बन नहीं पाई है। मेरे सिस्टम में विण्डोज एक्स पी लोड है। यदि कोई साछई मेरी मदद करेगा को आसानी होगी। कृपया बताएं कि किस प्रकार नारद का फोण्ट पढ़ा जा सकता है। सधन्यवाद।