Thursday, July 29, 2010
हिन्दी सिनेमा का नया शो मैन ....
Wednesday, July 28, 2010
निशाना हमेशा एक तरफ क्यों
खेल भी अब खेल हो गया
मुझे याद आता है मेरी मम्मी जिस स्कूल की प्रधानाचार्य थीं वहां संभाग स्तरीय टूर्नामेंट आयोजित हुए थे। ऐसे टूर्नामेंटों के लिए सरकारी बजट बहुत रस्मी सा होता है। समुचित व्यवस्थाओं के लिए काफी पैसा खर्च होना था। जाहिर है मम्मी अपने स्कूल के अन्य सदस्यों के साथ जनसहयोग के लिए दो तीन जनों से मिलने गईं। छोटा होने के नाते मैं यूं ही साथ था। गांव के जिन भी लोगों से वे मिली सभी ने एक ही बात कही थी, मैडम आप तो बता देना क्या कैसे करना है। गांव की बात है। हमारे गांव में बाहर की छोरियां (लड़कियां) आएंगी। सबको अच्छा लगना चाहिए। गांव की बात खराब नहीं होनी चाहिए।,,,, तो ये थी उस छोटे से गांव के लोगों की भावनाएं। जिन्होंने अपनी जेब से एक खेल आयोजन के लिए पैसा दिया। और राष्ट्रीय स्तर के ये नेता बेकार की बयानबाजी में उलझे हैं।
Tuesday, July 27, 2010
किसके लिए हुए वे शहीद

कल करगिल विजय दिवस था। करगिल कश्मीर में कबायलियों के नाम पर छद्म पाकिस्तानी सैनिकों का घुसपैठ और कब्जे का प्रयास। 1999 में हुई इस बड़ी लड़ाई में देश के सवा पांच सौ से अधिक जवान शहीद हुए और करीब सवा हजार जवान घायल हुए। लड़ाई को ग्यारह साल गुजर गए हैं। पर आश्चर्य करगिल विजय दिवस पर सरकार की ओर से कोई आयोजन नहीं हुआ। भारतीय जनता पार्टी ने कई जगहों पर शहीदों की विधवाओं को सम्मानित किया। सरकारी स्तर पर कोई कार्यक्रम नहीं होना गहरे सवाल खड़े करता है। क्या करगिल की लड़ाई एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुई इसलिए कांग्रेस सरकार उन शहीदों का सम्मान नहीं करना चाहती, और क्या इसीलिए भाजपा सम्मान के कार्यक्रम आयोजित कर रही है। सम्मान समारोह भाजपा आयोजित कर रही है, तो इसका कोई ज्यादा गलत संदेश नहीं है। सम्मान होना चाहिए भले ही बैनर कोई भी हो। पर शहीदों को लेकर राजनीति क्यों। राजीव गांधी, इंदिरागांधी, जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिवस, पुण्यतिथि सहित अन्य अवसरों पर अखबारों को विभिन्न मंत्रालयों के सरकारी विज्ञापनों से भर देने वाली सरकार का क्या देश की सीमा की रक्षा कर प्राण गंवाने वालों के प्रति कोई कर्तव्य नहीं बनता। करगिल के इतिहास को लेकर सेना में चलने वाली लड़ाई को दरकिनार करिए। सोचिए सवा पांच सौ जिंदगियां कम नहीं होती। देश के लिए प्राण गंवाने वालों ने कभी नहीं सोचा होगा की यूं वे हमारी छीछली राजनीति में दल विशेष के शहीद हो कर रह जाएंगे।
करगिल शहीदों को मेरी विनम्र श्रद्धाजंली, प्रभु उनके परिवारों को संबल प्रदान करे।
पुनश्चः हां एक बात का संतोष है, कम से कम से करगिल लड़ाई में शहीद होने वाले जवानों के परिजन बहुत ज्यादा कष्ट में नहीं है। उन्हें जो पैकेज मिला वो उनके सम्मानजनक जीवन के लिए वाकई जरूरी था। हां, कुछ गड़बड़ियां, इन मामलों में भी जिन्हें सरकार त्वरित गति से सुलझाए। जहां परिवारों का मामला हैं वहां भी सरकार को कुछ दखल देना चाहिए।
Monday, July 26, 2010
कामचलाऊ अंदाज
Saturday, July 10, 2010
केसर क्यारीःपीढ़ी का दर्द, और पथराव
Friday, July 9, 2010
प्रेम भी परहेज भी
Wednesday, June 2, 2010
अब दुख भरे दिन बीते रे भैया ,.
अरे भतीजे,, खुश हो जा,, अब दुख भरे दिन बीते रे भैया ,, अब सुख आने वाला है,,,,।
अचकचाते हुए अनमने मन से मैंने चचा से पूछ ही लिया,, कैसा सुख,, हमने तो बस सुना ही सुना है, कि सुख भी कुछ होता है,, तुम किस सुख के बारे में बात कर रहे हो,,चचा।
अरे वो अपनी शान है न अपना कोहीनूर, बस वो वापस आ रहा है,, बुरा हो आततायियों का जो यहां से ले गए,,,,।
अरे तो चचा इसमें खुश होने वाली क्या बात है,, कोहीनूर आए या जाए ,, हमारे यहां क्या कुछ बदल जाएगा,,, तुम काहे परेशान हो रहे हो...।
बस यहीं तो मात खा जाता है हमारा देस भतीजे,, अब तुम जैसे लोग ही तो हैं जिनके कारण सब बेड़ा गर्क हुआ जा रहा है.,. तुमको कोहीनूर से कुछ लेना देना नहीं,,तुम कोई कोई फर्क ही नहीं पड़ता, वहां देश की इज्जत नीलाम हुई जा रही है,, और यहां इन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता,,,,,अजीब आदमी हो,,।
क्या अजीब आदमी हैं,,, देश की इज्जत एक कोहीनूर से नीलाम हो जाएगी,, यहां रोज हर चौराहे, हाइवे और गली मोहल्ले में नीलाम हो रही है जो,, देश में आधे से ज्यादा लोग ठीक से पढ़ नहीं पा रहे और तुम कह रहे हो इज्जत नीलाम हो रही है,,,। बताओं देश के लोग ठीक अंग्रेजी तक तो बोल नहीं पाते और तुम कह रहे हो इज्जत नीलाम हो रही है।,,। कोहीनूर आ कर क्या कर लेगा,,। कहीं किसी लॉकर में बंद ही हो जाएगा न। हमारे देस में कई सरकारी अफसरों के बैंक लॉकरों में वैसे कई कोहीनूर खरीदने लायक माल पड़ा होगा। ये अलग बात है कि अब तुम उसे काला धन कहोगे,,। कोहीनूर न हो गया जी का जंजाल हो गया।
अरे भतीजे इतना काहे गर्म हो रहे,,, खाली कोहीनूर थोड़े ही ला रहे हैं, उसके साथ सुल्तानगंज की बुद्घ प्रतिमा भी ला रहे हैं।,,वैसे ये अंग्रेजी वाली बात तो तुम सही कह रहे हो,, ससुरों का पता नहीं क्या जाता है अंग्रेजी सीखने में,,, सीख लें तो आदमी बन जाएं,,, पर तुम बात भटका रहे हो..।
अरे चचा बुद्ध प्रतिमा की बात कर रहे हो,, हमारे देस में पड़ी मूरतें ही संभाल लें तो बहुत हैं,, यहां तो जिंदा आदमी मूरत हुआ जा रहा है,, वो क्या कहते हैं,, पुरातत्व वाले पता नहीं कितनी जगहों पर मूर्तियों को निकाल निकाल कर यूं ही पटक दिए हैं,, उनको रखने का ठौर नहीं,, बाहर से और ला रहे हैं,, अच्छा बताओ ले भी आओगे तो क्या उनसे बेहतर संभाल पाओगे।
अरे भतीजे तुम्हारी समझ में तो नहीं आएगी,, पर बाकी लोग तो मेरी बात से सहमत होंगे ही,, आखिर हमारा कोहीनूर हमारे पास ही होना चाहिए। बोलो है कि नहीं।
Tuesday, June 1, 2010
सुर सुर की बात
अरे कहीं नहीं, बस यूं जरा मन नासाज था इतने दिनों तक बड़े परेशान हो रहे थे।
क्यों चचा क्या बात हो गई थी.
बस यूं ही, पर आज जरा मन ठीक है, देश तरक्की कर रहा है न, इसलिए।
चचा की बात सुन हम जरा चौंके, देश तरक्की कर रहा है... आपको कैसे पता चला चचा और तुमको ये एकाएक देश की फिकर क्यों होने लगी।
अरे वाह भतीजे हमें फिकर नहीं होगी तो और किसे होगी। वो मनमोहन ने हमें तो ही सारा भार सौंप रखा है, इसी में जरा बिजी रहे थे। इतने दिनों। अब आज देखो खबर आ गई न की उम्मीद से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है देश,.।
चचा एक बात तो समझ में आ गई की तुम विकास दर के नतीजों की बात कर रहे हो,, पर ये मनमोहन वाली बात समझ में नहीं आई। जरा खोल कर समझाओ।
अच्छा तो सुनों,, पर किसी से कहना मत,, तुम तो जानते हो ये सुपर कॉन्फिडेन्शियल है,, देश का सवाल जो है,,,।
ठीक है चचा पर अब बता भी चुको...।
वो क्या है न कि पिछली 22 तारीख को जब मनमोहन सिंह की दूसरी पारी का एक साल पूरा हो गया न तब वो हम से मिला था। क्या हुआ न कि उस रात को जब हम सो गए तब हमारे ऊ 4जी टेक्नीकवाले फोन पर ऊ का फोन आया रहा। हमसे बोला चचा तुम तो पुराने पत्रकार हो,,आज सुबह हम खूब पत्रकारों से बतियाए पर मन नहीं भरा,, कुछ मन की कह सुन नहीं पाए। बहुत पता लगाया तब लगा कि चचा हंगामी लाल ऐसा पुराना पत्रकार है जिससे बात की जा सकती है,,सो हम तुमको फोन लगएं हैं,, तुम से कुछ मन की कहना चाहते हैं,,, ।
अब देस का प्रधानमंत्री कहे तो हम कौन जो ना कह दें,,, हमने कहो ,,, डॉक्टर साब,,,। बस इतना सुनते ही वो तो झूम गया,,, देखा यही न ,, यही अन्तर है पुराने औऱ समझदार पत्रकार में अब तुम समझदार हो तभी जानते हो हमारी डॉक्टरी का मतलब,, इसलिए न हमें डॉक्टर कहा,,, भई वाह,, दरअसल हंगामी जी,, अब मैं बहुत खुश हूं,, मैं अटल जी से भी ज्यादा प्रधानमंत्री रह कर नेहरु जी के वंश के अलावा इस देश सबसे लम्बे समय तक प्रधानमत्री रहने वाला आदमी हो रहा हूं,,,। बताओ औऱ क्या चाहिए,, जब से प्रधानमंत्री बना हूं लोग मेरे पीछे ही पड़ गए हैं राहुल को प्रधानमंत्री कब बना रहे ,, । अरे भाई वो बने जब बने...। मुझ से क्यों पूछते हो,, यह तो वही बात हुई न की घुमा फिरा कर पूछ लिया कि गद्दी से कब उतर रहे हो,,,, बताओ मैंने इस देश के लिए क्या नहीं किया। सबकुछ किया। लोग कहते थे कि कभी इस देश में दूध दही की नदियां बहती थी, मैंने तो नोटों की नदी बहा दी है,,, नरेगा नदी। नरेगा मैया बिल्कुल गंगा सी पवित्र है,,जो भी इसमें डुबकी लगाएगा उसकी सारी गरीबी ये हर लेगी...। अब पूछोगे यह तो केवल गांवों में बहने वाली नदी है,,। अरे शहरो में नदी बहाने की जगह नहीं है,,, वहां नालियां बहाई है,, अरबन रिन्युअल की,,, हर जगह नए नए तरीके की मोरी है,, जिसके जिधर जैसे चाहे मोड़ लो। अब देखो हंगामी लाल जी ,,, सारी दुनिया मंदी के चक्कर में पड़ी थी,... हम बचे या नहीं,, बोलो,, बचे की नहीं,, फिर भी जो है सो पीछ पड़े रहते हो,, हर समय सोनिया जी का डर दिखाते हो,, अरे माना उन्होंने पीएम बनाया है,,.. पर काम तो मैंने ही किया है,, वो तो केवल पब्लिक इन्ट्रेस्ट की बात करती है.. देश की बात तो मैं ही करता हूं।,,, चलो हंगामी जी अब एक बात करना मेरी सबसे बड़ी प्रोब्लम महंगाई है,, मैं चाह कर भी इसे कम नहीं कर पा रहा हूं,, । तुम ठहरे पुराने पत्रकार मुझे जरा महंगाई कम करने का कोई फामुर्ला बताओ,, कहीं से कोई रिसर्च करो,, कोई जप तप करो,, कोई गंडा ताबीज करवाओ,, कुछ करो,, प्लीज,, ।
उनकी इतनी बात सुन कर मैंने कहा,, मनमोहन जी ,, इसको कोई काबू में नहीं कर पाया,, अब आप कहते हो तो मैं कुछ ढूंढता हू,,,। आप मुझे दुबारा फोन करना।..
तब से मैं लगातार कई बाबाओं,, तांत्रिकों ,, पुराने लोगों,, से मिल कर महंगाई को काबू में करने का तोड़ ढूंढ़ रहा हूं,,। पर अब तक तो कुछ मिला नहीं,, भतीजे आज सोचा तुमसे कुछ पूछ लूं तो चला आया तुम्हारे पास,,तुम्हें यदि पता तो तुम ही बताओ,,..।
देखो चचा इसका तो एक ही इलाज है,, जो अभी तुम ही कह रहे थे,,
वो क्या...
महंगाई के अलावा हर बात का ढोल बजाओ,, बस महंगाई की बात पर चुप्पी साध जाओ,,
अभी बढ़ी हुई विकास दर का राग अलवाओ,, महंगाई का सुर अपने आप नीचा हो जाएगा,, ।
लगता है हमारी बात चचा को एकदम से जंच गई और वे तुरन्त अपना चमकता चेहरा ले आगे बढ़ गए। शायद मनमोहन को फोन घुमाने,,,।
Saturday, April 10, 2010
इस्तीफे के साइड इफेक्ट
चचा की बात सुन,, हम क्या कहें हमें कुछ नहीं,, आया,, आपको समझ आया हो तो बताना,,,।
Thursday, February 18, 2010
जिंदगी
कतरा कतरा जिंदगी
लम्हा लम्हा बंदगी
Monday, February 15, 2010
सड़क पर दौड़ता आतंक
पूना में विस्फोट हो गया...। आतंक की एक ओर दास्तां लिख गया.....। खबरों की सुर्खियां कह रही हैं,,,। इन हमलों की योजना बनाने वाले विदेशी थे.....। पर इन्हें अंजाम देने वाले हाथ,, हिन्दुस्तानी हो सकते हैं,,,। गृहमंत्री कह रहे हैं,, हमला और भी बड़ा हो सकता था, पर कम नुकसान हुआ है,, सुरक्षाबलों को बधाई,,,। किसी का कयास है कि 25 तारीख को होने वाली भारत -पाक बातचीत नहीं हो इसलिए हुए हैं हमले ....। तो कोई कह रहा है कि विदेशियों को निशाना बनाने की खातिर हो रहे हैं हमले। हमला चाहे किसी भी कारण हुआ हो,, लेकिन हुआ है,,। किसने किया क्यों किया ये बात दिगर ,, पर हर आम इंसान की चाह की हमले नही हों,, हमलावरों की पहचान हो,, और दोषियों को बख्शा नहीं जाए। फिर से आतंक का जलजला नहीं उठे। फिर ऐसे मौके नहीं आएं की अमनपसंद लोगों को बेवजह सियासतदाओं की लड़ाई में अपनी जान गंवानी पड़े। चिन्ता बहुत बड़ी है,, और उसके सरोकार उससे भी बड़े.....। पर आजाद हिन्दुस्तान की सरजमीं पर इस वाकये की गम्भीरता को बनाए रखते हुए दिल एक और सवाल उठाना चाह रहा है। और वो सवाल आतंक की इस घटना से कहीं कोई ताल्लुक नहीं रखता पर हां हर आम हिन्दुस्तानी की जिन्दगी से जरूर ताल्लुक रखता है।
क्या किसी ने सोचा है कि सुबह जब कोई आम हिन्दुस्तानी घर से अपने दुपहिया वाहन पर सवार हो कर ऑफिस के लिए निकलता है तब उसके या उसे खुशी-खुशी विदा कर रहे उसके परिजनों में से किसी के मन में लेश मात्र भी आशंका नहीं होती कि उसका परिजन सही सलामत घर वापस नहीं पहुंच पाएगा। लेकिन बिना किसी बम धमाके या आतंकी हमले की चपेट मे आए भी उसके परिजन हमेशा हमेशा के लिए उसका इन्तजार करते रह सकते हैं। और इसके लिए कोई विदेशी हाथ, कोई षडयंत्र जिम्मेदार नहीं होता। जिम्मेदार होती हैं तो बस कोलतार की वो सड़कें जो लोगों को मंजिल तक पहुंचाने के लिए बनी होती है। या फिर वो वाहन जो उन सड़कों पर फर्राटे भर मंजिल को लोगों के करीब लाते हैं। जी आप सही समझ रहे हैं मैं बात कर रहा हूं सड़क हादसों में जान गंवाने वाले उन लोगों की जो कहने भर को हादसे का शिकार होते हैं, पर सोचिए क्या वाकई सड़क हादसा ऐसी आपदा हैं जिन्हें टाला नहीं जा सकता । ड्ब्लयू एच ओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की रिपोर्ट के अनुसार भारत ऐसा देश है जहां विश्व भर में सर्वाधिक लोग सड़क हादसों में जान गंवाते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 (रिपोर्ट में उसी वर्ष के आंकड़ों की तुलना की गई है) में भारत की सड़कों पर एक लाख 14 हजार लोगों ने प्राण गंवाए थे। (आतंकियों को इतने लोगों को शिकार बनाने के लिए जाने कितने हमले करने पड़ें।) इतना ही नहीं हर घण्टे देश में तेरह लोग सड़क हादसों में जान गंवा देते हैं। अमरीका में 2006 में 42,642 लोगों ने सड़क हादसों में जान गंवाई तो इंग्लैण्ड में कुल 3298 लोग सड़क हादसों का शिकार हुए।चीन में करीब 89000 लोग हादसों का शिकार हुए । भारत में यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है,क्योंकि यहां बहुत सारे मामले तो दर्ज ही नहीं होते।
Friday, February 5, 2010
जय युवराज,,
चाचा को यूं बेसाख्ता चिल्लाते देख हमसे रहा नहीं गया,,,,,,, अरे चचा क्या मिल गया,,, भतीजे हमें देश का सही वारिस मिल गया,,, क्यों चचा क्या बात हो गई,,, अरे देखते नहीं ,, देखते नहीं अपने युवराज ने क्या कमाल कर दिया,,मुम्बई में,, दिखा दिया की देश एक है,,,, सारे ठेकेदारों को समझा दिया,,, सबको संदेसा दे दिया ,,, कि देश एक है और अब यह सब नहीं चलेगा,,,, मुम्बई में घूम लिए,, लोकल में घूम लिए,,, इसे कहते हैं युवराज,,, कहो क्या कहते हो,,,