Tuesday, January 12, 2010

उतिष्ठत् जाग्रत प्राप्यवरानिबोधत्

आज स्वामी विवेकानंद की जयंती है, यानी युवा दिवस। विवेकानंद ने युवाओं को किसी देश की तकदीर और भविष्य कहा था। उन्होंने ध्येय वाक्य दिया था, उतिष्ठत् जाग्रत् प्राप्यवरानिबोधत्। अर्थात, उठो जागो और तब तक मत रूको जब तक की लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाए। उठने, जागने औऱ लक्ष्य प्राप्त होने तक नहीं थमने की यह प्रक्रिया हर किसी के जीवन में महत्वपूर्ण परिणाम लाती है। पर सवाल उठता है कि कितने लोग अपने लक्ष्य के बारे में जानते हैं, और कितनों को यह अनुभूति हो पाती है कि वे वास्तव में सो रहे हैं। जब उन्हें अपने सोने का अहसास ही नहीं हो पाएगा तो जागने और लक्ष्य पाने की बात तो बहुत दूर है। हम क्या कर रहे हैं, और उसका क्या परिणाम है यह अनुमान लगा पाना बहुत कठिन है। नामुमकिन है ऐसा मैं नहीं कहता। क्योंकि नामुमकिन तो कुछ भी नहीं है। पर सवाल अपनी जगह है, कि यह कैसे पता चले कि हम सो रहे हैं और हमें जागना है। मैंने कुछ जनों से यह सवाल पूछा तो उनका कहना था कि तुमने बचपन में क्या करने और क्या बनने का सोचा था..। मैंने उन्हें बताया। और यह भी बताया कि वह तो मैंने काफी हद तक पाया,, पर अब प्यास बढ़ती जा रही है,, और यही तो अन्तिम सत्य नहीं,, अन्तिम इच्छा नहीं है,, अब जो चाहता हूं वो मिल जाएगा तो कुछ और पाने की चाह जगेगी।,,,मन अक्सर क्लान्त ही रहता है। फिर यदि आप जानते भी हैं कि आप क्या चाहते हैं और उसे पाने का रास्ता भी जाग्रत मस्तिष्क में कहीं दिखने लगता है , लेकिन लक्ष्य प्राप्ति के लिए जो कुछ कर गुजरने वाला जज्बा चाहिए वो कहां से लाया जा सकेगा। लोग कहते हैं कि हिम्मत करके देखो शायद कुछ बात बन जाए,, पर फिर वे ही कहते हैं यार, डर लगता है,, अभी जो जिम्मेदारियां है उन्हें कैसे निभाया जाएगा। जिम्मेदारियों का बोझ ही शायद हरेक को हमेशा सोते रहने पर विवश करता है। वरना कौन नहीं चाहता जागना औऱ लक्ष्य पा लेना,,। पर हां, आज एक बार फिर से स्वामी जी का कथन याद आया औऱ याद आए लक्ष्य। कहां से चले औऱ कहां पहुंच गए.. अभी पता नहीं कहां कहां से गुजर होगा। पर हां, आज फिर कुछ सोचा है,, पूरी तरह से सोने से बेहतर है, कुछ जाग जाया जाए, मंथर गति से ही सही लक्ष्य की ओऱ बढ़ा तो जाए,,। कच्छप शैली में ही आज नहीं तो फिर कभी,, कभी न कभी तो लक्ष्य प्राप्त होगा ही। तो एक बार फिर से उतिष्ठत् जाग्रत् प्राप्यवरानिबोधत्।

Thursday, December 24, 2009

क्या इडियट हैं हम

आप कोई भी चैनल बदलें, किसी भी समय देखें, इन दिनों आमिर खान अपनी नई फिल्म 3 इडियट्स के प्रचार में जोर- शोर से जुटे नजर आएंगे। आमिर के बारे में कहा जा रहा है कि वे 100 प्रतिशत प्रोफेशनल हैं। इतने की अपने फायदे के लिए के किसी भी हद तक जा कर कुछ भी कर गुजरने का माद्दा रखते हैं। अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए नए-नए तरीके इस्तेमाल करते हैं। 3 इडियट्स को चर्चा में लाने के लिए उन्होंने क्या क्या नहीं किया। कैच मी इफ यू कैन अभियान की बात दरकिनार भी कर दी जाए तो तो मीडिया को गाहे बगाहे गॉसिप परोसकर वे अपना काम करते रहते हैं। शाहरुख, सलमान और खुद के खान होने से खानवाद का जो नारा मीडिया ने उछाला है वे उसे भी जमकर कैश कर रहे हैं। पर मुझे याद आते हैं सालों पहले के आमिर खान। तब वे आमिर खान नहीं, चॉकलेटी आमिर हुआ करते थे। कयामत से कयामत तक में एक रोमांटिक लवर बॉय की जो भूमिका उन्होंने की थी, उसके लिए कोई अतिरिक्त प्रचार भी नहीं हुआ था। फिल्म की प्रारम्भिक बनावट और मासूम अदाकारी में ही इतना दम था क फिल्म आप से आप ही हिट और सुपरहिट होती चली गई। फिर दौर आया जो जीता वही सिकन्दर, हम हैं राही प्यार के, गुलाम, रंगीला और सरफरोश का उन सब फिल्मों के लिए आमिर ने अलग से कोई विशेष प्रचार अभियान नहीं चलाया पर फिल्मों ने कारोबार किया। लगान ने इतिहास रचा औऱ अभिनेता आमिर निर्माता आमिर बन गया। अब तक फिल्म में केवल अपनी भूमिका और उसका असर देख कर उसे निभा जाना भर उनकी खासियत हुआ करती थी। अपनी फिल्मों के साथ ही खुद को भी पूरा समय देना उनकी फितरत हुआ करता था। लेकिन जबसे उन्हें समझ आया कि फिल्म् को बनाने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे कायदे के साथ बेचना, उन्होंने फिल्म को बेचना शुरू कर दिया। कहावत है कि, बेहतर सेल्समैन वह होता है जो गंजे को कंघी बेच दे, लगता है आमिर ने वह कहावत सुन ली है और अब इसे आत्मसात करने की डगर पर कदम दर कदम बढ़ रहे हैं। जाने तू या जाने ना, गजनी और तारे जमीं पर के दौरान भी उन्होंने जमकर अपनी मार्केटिंग स्किल्स का मुजाहिरा किया। लेकिन 3 इडियट कुछ ज्यादा ही खास है। चेतन भगत की फाइव पांइट, समवन नोट टु डू इन आईआईटी, पर आधारित इस फिल्म का कथानक मूल उपन्यास से अलग किसी नए रूप में दिखे तो चौंकिएगा नहीं। आमिर की अदा है कि वे अपनी फिल्मों में इतना डूब जाते हैं कि मूल कथानक को मूल नहीं रहने देते। आईआईटी की कॉलेज लाइफ को लेकर बन रही यह फिल्म देश के उन लाखों असफल जे आईआईटीयन्स को तो अपील करेगी ही जो आईआईटी प्रवेश परीक्षा में बैठने के बावजूद आईआईटी में पढ़ नहीं सके और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी है। चेतन ने अपनी किताब में आईआईटी के एजुकेशन और मार्किंग सिस्टम को चुनौती दी थी। उन्होंने बताया कि कैसे 1 से 10 अंकों परफोर्मेंस पैरामीटर अच्छे खासे स्टूडेंट को बुकवर्म में बदल देता है और वह अपने जीवन के सुनहरे सालों को यू हीं गंवा देता है। पढ़ाई और बुकवर्म की बात को ध्यान में रखते हुए भले ही सतही तौर पर कहीं यह लगता हो कि आईआईटी का मार्किंग सिस्टम छात्र की निजी जिंदगी को खत्म कर रहा हो पर यह भी ध्यान रखना होगा कि वही सिस्टम, वही पढ़ाई आईआईटी को बेजोड़ बनाती है।अलग मुकाम देती है। नहीं भूलना चाहिए की आज चेतन जो लिख रहे हैं, वो अच्छा है या बुरा, इसके मूल्यांकन से भी पहले, इसलिए में चर्चा में आ जाता है क्योंकि उसे एक आईआईटीयन ने लिखा है। छात्र जीवन में मौज, मस्ती सभी के जीवन का अंग होती है। मुझे भी याद आता है जब मैं प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ता था, ( मम्मी की पोस्टिंग उन दिनों चित्तौड़गढ़ जिले के गांव गंगरार में हुआ करती थी।) तब स्कूल से दोस्तों के साथ गायब होना औऱ घर के पास एक बड़े बरगद के पेड़ के कोटर में बस्ते छिपा कर, छोटी साइकिल (अधिया, पविया) को किराये पर ले पैडल मारते हुए गांव से करीब दो-तीन किलोमीटर दूर स्टेशन पर पहुंच जाते। जहां ट्रेन के आने का इन्तजार करते, पटरी के पास बैठे रहते, स्टेशन पर घूमते रहते। दूर से ट्रेन आती दिखती तो जेब में रखे दस-बीस पैसे के एल्युमीनियम के सिक्के पटरी पर रख दिया करते थे। इंजन के पहले दूसरे पहिये के गुजरते ही सिक्के पटरी से नीचे गिर जाते। ट्रेन गुजरने के बाद बेढ़ब हुए सिक्कों के नए आकार प्रकार को देखते औऱ खुश हुआ करते थे। क्या इडियटपन था वो भी।
बहरहाल, अपने अजीब से प्रचार अभियान के माध्यम से देशभर को इडियट बना चुके आमिर की फिल्म चंद घंटों बाद ही जनता के सामने होगी। देखना होगा कि फिल्म 3 घंटों में कितनों को इडियट बनाती है और आखिर में कौन इडियट साबित होगा।

Tuesday, December 15, 2009

नया साल, उम्मीद पुरानी

मोबाइल पर चचा हंगामी लाल का मैसेज था,
लम्हा लम्हा वक्त गुजर जाएगा,
१६ दिन बाद नया साल आएगा
आज ही आपको हैप्पी न्यू इयर कह दूं , वर्ना,,
कोई और बाजी मार जाएगा
विश यू है प्पी न्यू इयर २०१० ...
चचा का यह मैसेज पढ़ कर हमारे चेहरे पर मुस्कान थी,, अरे एक साल गुजर गया, अभी कल ही की तो बात है जब सबको हैप्पी न्यू इयर बोला था,, नए साल के लिए कसमें खाईं थी, संकल्प लिए थे,, देखते ही देखते साल कैसे गुजर गया.... । लेकिन मन ने दूसरे ही पल कहा,, हां,, साल तो गुजर गया पर देखते ही देखते कहां गुजरा,॥ इस साल ने तो कई टीस दी हैं,,। हर लम्हा जेब पर और भी भारी हो,, गुजरा....। साल के शुरू में जहां चीनी २० -२१ रुपए किलो थी वो अब साल खत्म होते होते अड़तीस रुपए किलो तक पहुंच गई। साल के सरकने की दर पर मंदी का साया बना रहा,, बहुत सपने सोचे थे॥ नई सरकार बनेगी॥ कुछ राहत मिलेगी॥ पेट्रोल के दाम कम होंगे॥ वो तो हुआ नहीं,, उलटे मुई सब्जी भी रसोई से गायब हो गई अब सूने फ्रिज ,,(दूध तो पहले ही मंहगा था, बस सब्जियों से से फ्रीज में थोड़ी रौनक रहती थी) मंडी में मंदी छाने का इंतजार कर रहे हैं। हर सब्जी में मिल कर सब्जी को बिजनेस क्लास से इकोनोमी क्लास में लाने वाला आलू खुद ही बिजनेस क्लास में शिफ्ट हो गया। साल के शुरू में सोचा था, कुछ बचत हो जाएगी तो कुछ जरूरी चीजें खरीद ली जाएंगी,, पर बचत तो दूर ओवर ड्राफ्ट हो गया,, खैर अब फिर से नया साल आ रहा है,, नई उम्मीदें हैं... सॉरी क्षमा चाहता हूं,, साल नया है,, पर उम्मीदें वही पुरानी हैं,, क्या करूं,, इस साल कुछ हो नहीं पाया,, बस जैसे तैसे साल गुजर गया,, चचा के मैसेज में एक बात तो सही है कि लम्हा लम्हा वक्त गुजर गया... लम्हा चाहे भारीपन से गुजरे या हल्केपन से , पर गुजरता जरूर है...
चलिए,, सभी पढ़ने वालों को आने वाले नए साल की शुभकामनाएं,,,,,

Monday, December 14, 2009

हंगामी लाल की राज्य वार

बहुत दिन से दूसरे शहर की नौकरी बजा रहे हैं, छुट्टी में घर पहंचे तो शाम पड़ते ही चचा हंगामी लाल आ पहुंचे। बहुत दिन बाद मिल रहे थे, हम और वो दोनों बहुत खुश थे। बातों ही बातों में चचा बोल पड़े, अब मिल लो जितना मिलना हो,, क्योंकि कुछ दिन बाद तो तुम हमसे मिलने किसी अस्पताल में आओगे,,
हम चकराए, क्या हुआ चचा,, क्या बात हो गई,, भगवान बचाए अस्पताल के चक्करों से,,,
अरे वो क्या है,, बीमारी जैसी कोई बात नही है,, दरअसल हम अनशन पर बैठने वाले हैं सो जब कमजोर होंगे तो अस्पताल ही में जाएंगे न॥
अरे पर आप अनशन कर काहे रहे हो
अरे वो नए नए राज्य बनाने की मांग हो रही है,, न उसी मामले में हम भी सोच रहे हैं कि एक बार हम भी अनशन कर ही दे,,,
अरे चचा ,, तुमको कौन सा राज्य चाहिए,,,,
मुझे कोई राज्य वाज्य नहीं चाहिए ,,,
तो चचा फिर ये अनशन क्यों...
अरे मेरी तो एक ही मांग है॥ सरकार एक काम करे,,, फिर से सारे राज्यों का गठन कर दे,, भाषा का चक्कर छोड़े और सम्पर्क,, सहजता,, भौगोलिक स्थिति का ध्यान करे... पूर्वांचल, उत्तराचंल, हिमाचल, तेलंगाना,, आंध्रा,, से लेकर केरल,, और राजस्थान से लेकर बंगाल तक,, कुल मिलाकर कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक औऱ जैसलमेर से लेकर इटानगर, गंगटोक तक सबको दुबारा से बना दो,, सबसे कह दो कि ,, भाई ,, अबकी बार सबको भारतीय मान कर राज्य बना रहे हैं,... किसी की भी अलग पहचान नहीं है,, ,, क्या बोलो,, क्या कहते हो॥ छे़ड़ दूं यह राज्य वार,,,
चचा की बात सुन हम चुप,।,,, सन्न,,,
हम कहे चचा तुम्हारी बात और मुद्दे में दम है,।,,, अनशन करो नहीं करो,, उसका फल क्या होगा,, यह तो मुझे पता नहीं,, तुम्हारी राज्य वार का अंजाम भी मैं नहीं जानता.. पर हां तुम्हारी बात जरूर जनता की ईसंसद में पहुंचा दूंगा,, शायद तुम्हें अनशन नहीं करना पड़े.....

तो सभी इन्टरनेट के पाठकों तक हमारे चचा हंगामीलाल का यह मुद्दा पहुंचा रहा हूं,,,,
सादर

Tuesday, October 6, 2009

प्याज तो बहाना है,,

आज के अखबारों की हेडलाइन थी, एक ही दिन में प्याज के दाम दुगने हुए,,,। इससे पहले चीनी, दाल, आलू आटे के भावों को लेकर कुछ न कुछ छपता ही रहता है,,। दाम का बढ़ना अब एक सुर्खी भर रह गया है। कहीं कोई हलचल नहीं। अपने हितों के लिए वेतन भत्तों के लिए,, धरना प्रदर्शन करने वालों को महंगाई कहीं से मुद्दा नहीं लगती है। हां, राजनीतिक दलों के लिए यह एक मुद्दा है जो सनातन है। हर पक्ष वाला विपक्ष के लिए यह मुद्दा जरूर रखता है। दरअसल यह अण्डरग्राउण्ड पैक्ट का नतीजा है। क्योंकि जो आज सत्ता में उसे कल विपक्ष में आना है तब एक मुद्दा रहना चाहिए और वह है महंगाई। सो अभी भी उसे विपक्ष के लिए रहने दो अगली बार जब हम विपक्ष में होंगे तो यह हमारे काम आएगा। तो नेताओं की यह बन्दरबांट अब जनता खूब समझने लगी है इसलिए महंगाई विरोधी धरना प्रदर्शनों में उस दल के ब्लॉक पदाधिकारियों के अलावा कोई शामिल नहीं होता। सो यह आम आदमी की आवाज नहीं बन पाता। लेकिन क्यों नही आम आदमी सड़क पर उतर जाता । क्यों नहीं वो महंगे आलू प्याज को यों ही खरीद (उठा) लाता। आखिर आम आदमी को कोई महंगा बेच जाए और बच जाए। यह क्यो संभव होता है। क्यों नहीं आम आदमी सरकारी दफ्तरों की ईंट से ईंट बजा देता। क्यो नहीं मंत्रियो के काफिलों की हवा निकाल देता। क्यों नहीं वो बता देता कि आम आदमी के पास वोट ही एक मात्र बेचारगी भरा हथियार नहीं है। जो पांच साल बाद खरबूजे पर पड़ने वाली छूरी सरीखा हर बार आम आदमी पर ही गिरता है। क्यों नेता एयरकंडिशन्ड सर्किट हाउस में रियायती दर पर सब्जी दाल उड़ाता है, क्यों नहीं आम आदमी उसकी थाली में से एक सब्जी हटा नहीं देता। क्यों क्यों क्यों,,, आपके पास कोई जवाब हो तो बताना ,, प्याज तो सिर्फ एक बहाना है ,, मेरे सवालों का सिलसिला मुझे चैन नहीं लेने दे रहा ,,,।

Friday, October 2, 2009

फोलोइंग गांधी की

शाम चार बजे जब मोबाइल बजा और स्क्रीन पर चचा का नम्बर दिखा तो चौंकना स्वाभाविक था, हमारे चचा सुबह सुबह एक्टिव होते है,, आज बेवक्त क्यों फोन किया,, जरूर कोई खास बात होगी सो हम भी तुरन्त दफ्तर में अपनी सीट से उठकर ( पत्रकार होने का यह भी एक नुकसान है जब सारा देश छुट्टी का मजा लेता है तब आप दफ्तर में काम में जुटे होते हैं) बाहर को सरक लिए ,,
हां , चचा कहो क्या बात है,,,
वो क्या है भतीजे की एक बात मन में आ रही है,, दरअसल सुबह से गांधी जी के बारे में इतनी सारी बातें सुनी हैं कि आज से गांधी जी को फॉलो करने का विचार बन रहा है,,
ये तो बहुत अच्छी बात है, चचा,,, नेकी औऱ पूछ पूछ ,, तुरन्त शुरू कर दो,,
पर यार ,,
अरे इसमें पर वर क्या,,,,
वो बात दरअसल ये है कि गांधी जी को फोलो करने में एक अड़चन है,,, मैं तो अभी ही नया कुरता सिलवा कर लाया था, और गांधी जी तो ऊपर कुछ भी नहीं पहनते थे,,,
अरे चचा ,, पहनने और न पहनने का क्या है, गांधी जी को फोलो करने के लिए क्या कमर नंगी रखनी जरूरी है,, आप तो बिन्दास जो मर्जी आए पहओ और गांधी को फोलो करो,,
हां, कह तो तुम ठीक रहे हो, पर एक शंका और है,,
वो क्या,,
देखो तुम तो जानते ही हो कि अपना धंधा तो लोगों को पैसा देना और ब्याज कमाना है,, अब उस धन्धे मे ब्याज और मूल वसूलने के लिए कभी कभी किसी को पिटवाना भी पड़ता है,, और गांधी जी तो अहिंसा की बात करते थे,,, अब बिना ठोकपीट अपना धंधा कैसे चलेगा,,,,
अरे चचा गांधी जी ने ये थोड़े ही न कहा था कि धंधा मत करो,, घो़ड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या,, सो तुम तो परेशान मत होओ,, धंधा अपनी जगह है,, बिंदास करो,, वैसे भी धंधे के लिए की गई मारपीट हिंसा नहीं होती यह तो कर्तव्य है,,, जो करना ही होगा,
हां,, यह भी ठीक है,, अब बस एक आखरी शंका का समाधान और कर दो,,
वो देखो चचा,, मैं हो रहा हूं लेट, काम का टाइम है,, तुम तो बस इतना करो कि जैसा चल रहा है, वैसा हीचलने दो,, जैसे जी रहे हो वैसे ही जीते रहो,, बस इतना करो कि हर काम से पहले गांधी को याद करो और गांधी बाबा की जय कह कर काम शुरू करो,, आखिर हमारे नेता लोग भी ऐसे ही करते हैं,,
हां, यह ठीक रहा तो आज से हम भी गांधी के फोलोअर हो गए हैं,। अब गांधी का नाम ले कर ब्याज वसूलने निकल पड़ता हूं। तुम भी गांधी को फोलो करो, बहुत बढ़िया रहेगा, बहुत बढ़िया सिद्धान्त है गांधी बाबा के, जय हो महात्मा गांधी की,,,। इतना कह कर उन्होंने फोन काट दिया
हमने भी राहत की सांस ले ,, हे राम कह दफ्तर पर अपनी सीट का रुख किया,,,।

Thursday, October 1, 2009

गांव की सड़क ऐसी क्यों नहीं,,,,

आजादी के बासठ साल बीत गए हैं, और लोगों को अभी भी हालात में कोई अन्तर नहीं लगता। यहां कोटा में आसपास के किसान बिजली की मांग को लेकर एक महापंचायत में शामिल होने आए थे। बात भले ही राजनैतिक थी, लेकिन दर्द राजनीति से परे था। रैली में आए करीब सात आठ हजार किसानों में आक्रोश कूट कूट कर भरा था। उनमें हर उम्र के किसान थे। सबका एक ही स्वर था, ये जो महल यहां बने हैं, जो लाइट के खम्भे यहां लगे हैं, ये बढ़िया सड़क यहां बनी है,, वो हमारे गांव में क्यों नहीं है,, वोट तो हम भी उतना ही देते हैं, जितना ये शहर वाले देते हैं। एक लम्बी दाढ़ी वाले बुजुर्ग करीब ७५ से ज्यादा उम्र के थे,, ( अपनी उम्र के बारे में उनका कहना है कि अंग्रेज गया नीं, जद मूं पूरो मोट्यार छो। ) कहते हैं कि उनके पिता और घर में सबका अन्त तक यही कहना था कि अंग्रेज बहादुर और राज के टाइम में और अब के टाइम में कोई फर्क नी है। टैम वा ई है। कुछ ई कौने बदल्यो। जब मैंने कहा अरे अब तो सबकुछ बदल गया है, आप खुद वोट देकर अपने लोग चुनते हो, वो ही सारी चीजें तय करते हैं, बुजुर्ग एकदम तल्ख अंदाज में कहता है,, कांई बदल्यो बताओ,, और इतना कहते हुए उसने अपना एक और से फटा कुर्ता आगे कर दिया। यो सिलवा खातिर अंजाम कोनी। है कोई जो कैवे के बाबा काल री चिंता मत कर मूं अनाज देवूंला। कोई न देवें। गाम में पटवारी बिंघोटी अर खाता में जो नाप करे वो तो वोई जाणै।,, पंचायत में आने का सबब पूछने पर हरजी कहता है,, देखो ,, नेता जी आया छा बी न कही कि सरकार कुछ तो सुणैगी, सब बात करांगा तो कुछ तो होगो। जी खातिर आया छा। पण मन तो नी लागे सरकार काई सुणैगी। पैली राज के टाइम में पतो तो रहतो छौ की सरकार कुण छे। अब तो पतो ई कौन लागे की सरकार कुण छै, और वो किण तरया सु सुणैली। कोई राज आ जाओ, गांव वाला की तो कोई न सुणे। ,,,
हरजी की इन बातों मे क्या छुपा है, आप खुद अंदाजा लगा लें, सारी बात यूं की यूं आपके लिए पेश है,,

Monday, September 28, 2009

अब अगले रावण का इन्तजाम ....

लो फिर जल गया रावण। हर साल हम रावण जलाते हैं। पिछले साल से ज्यादा। मुझे आश्चर्य होता है कि इतने रावण आते कहां से हैं। अब तो नया ट्रेंड चला है, हर घर में रावण जलता है। बच्चे भी रावण जलाते हैं। मानो रावण अब खेल हो गया है। जयपुर में तो बकायदा रावण की मंडी लगती है। जिस आकार प्रकार का रावण चाहिए ले जाओ और जलाओ। परंपरा जब शुरु हुई होगी तो पहले पहल गांव शहर का एक रावण होता होगा। लेकिन अब क्या हो गया जो इतने रावणों की जरूरत पड़ने लग गई। प्रतीक भी समाज का आईना ही होता है। ज्यादा बुराई ज्यादा रावण। ग्लैमराइज्ड बुराई, ग्लैमराइज्ड दहन। चलो कोई बात नहीं,,अगले बरस के लिए फिर से बुराई के रावण तैयार करें, पहले से ज्यादा भव्य हो इसके लिए मेहनत करें। आखिर रावण दहन से ही सत्य की जय होगी। सत की जय के लिए असत का वास जरूरी है। सो सोसाइटी जुटी है असत को जमाने, पालने और पौसने में आखिर अगली बार फिर से विजय पर्व जो मनाना है। खैर... अभी तो आज के पर्व की बधाई स्वीकार करें।...

Saturday, September 26, 2009

चाय नाश्ता के रेट और छठा वेतन आयोग

आज फिर चचा हंगामी लाल का फोन आ गया। इसी के साथ चचा ने हमारे सामने एक खुलासा भी किया कि अब चचा गाहे बगाहे फोन करते रहेंगे और हम उनके फोन से बिल्कुल भी नहीं चौंके। हमने जब चचा से इस मेहरबानी का कारण जानना चाहा तो उनका कहना था , देखो भतीजे अब तुम इतनी दूर हो रोज रोज तो आया नहीं जा सकता और रोज कुछ न कुछ ऐसा होता रहेगा कि हमें तुमसे बतियाए बिना चैन नहीं पड़ेगा, सो तुम तैयार रहना अपन फोन पर ही गपशप लगा लेंगे। ठीक है चचा पर आज क्या मुद्दा है। चचा कहने लगे बड़ा जोरदार मुद्दा है, एक बात बताओ तुम चाय नाश्ता करते हो,,
हां,
कितने रुपए खर्च कर देते हो,
अरे वो चार रुपए की पेशल ( चाय वाला छोटू ऐसे ही बोलता है) कट और एक समोसा पांच रुपए का कुल नौ रुपए होते हैं, अपने तो...
तो तुम से तो कहीं अच्छे अपने राजस्थान पुलिस के सिपाही हैं जो ढाईलाख का चायनाश्ता करते हैं।
ढाई लाख का,,चचा ऐसा ढाई लाख में क्या खाते होंगे,, फाइव स्टार में जहां थरूर और कृष्णा रहते थे वहां भी चाय का प्याला ढाई सौ में तो मिल ही जाता हो,,,(पढ़ने वाले लोग यदि इसमें संशोधन चाहें तो आमंत्रित है) और बादाम का हलुआ भी साथ में खाओ तो कुल मिला कर खर्चा सात- आठ सौ हजार रुपए से ज्यादा नहीं हो सकता,, नहीं चचा आपकी बात हजम नहीं हुई, ।
अरे बावले ये चाय नाश्ता तो संज्ञा है,, टर्म है,, नाम है,, काम तो कुछ और ही है, सवाल तो यह है कि ये चाय नाश्ते की जो रेट है एक सिपाही की है,, जरा सोच इससे ऊपर एएसआई, एसआई, सीआई, सीओ, डिप्टी, एएसपी, एसपी, आईजी, एडीजी और डीजी फिर सेक्रेट्री,, ,, रेट बढ़ते बढ़ते कहां तक पहुंचेगी,।,
चचा ये तो वाकई सोचने वाली बात है, शिष्टाचार की कीमत भी बढ़ गई, मुझे अभी कुछ दिन पहले एक पुलिस अधिकारी एक थानेदार के महज दस हजार की रकम लेने के लिए एसीबी के जाल फंसने की घटना का जिक्र करते हुए कह रहा था, सारा स्टेटस गिरा दिया, ,, , फंसना ही था तो कम से कम एक बिन्दी तो और लगवाता तब तो कुछ समझ भी आता,। पर चचा ये सिपाही ने कुछ ज्यादा ही नहीं ले लिया,
अरे भतीजे मुझे भी ऐसा लगा था, सो मैंने एक दूसरे सिपाही को टटोला की यार तुम्हारे बिरादरी भाई ने ज्यादा चाय नाश्ता ले लिया,, इतना तो नहीं लेना चाहिए था, आखिर लेने का भी कोई कायदा होना चाहिए,,, उसका जवाब था,, हंगामीलाल जी सारा कायदा पुलिस वालों के लिए ही है, मंहगाई देखी इस स्पीड से रॉकेट उड़ाया होता तो चांद से आगे पहुंच जाता...। छठा वेतनमान लगने बाद वैसे भी ग्रेड रिवाइज हो गए हैं तो चाय नाश्ता के रेट भी रिवाइज होने ही थे। अब आप क्या जानो कैसे काम चलता है,, ससुरी चीनी 39 रुपए किलो गई है, दाल, चावल ,, आलू, मुर्गी, मच्छी सब महंगे हो गए हैं, वो एक पत्रिका में खबर छपी थी जिसकी हर महीने की पचास हजार आमदनी है वो भी महंगाई में कटौती कर रहा है, और आप को हमारी रेट्स ही ज्यादा लग रही हैं। खैर आप चिन्ता मत करना कभी आपका मामला फंसे तो बताना स्पेशल स्टाफ डिस्काउण्ट दिलवा देंगे। तो भतीजे मैंने तो तुम्हें सिर्फ इसलिए फोन किया था कि कभी कोई बात तो बता देना उसके डिस्काउण्ट को भी चैक कर लेंगे,, कुछ फायदा हो तो क्या बुराई है।
उनकी बात सुन कर मैंने ,,, जी चचा,, कह कर फोन रखना ही उचित समझा।

Friday, September 25, 2009

खींचतान की चिंता और क्रिकेट की चिता

सुबह सुबह मोबाइल की घंटी से नींद टूटना हमारे लिए कोई नई बात नहीं है, अक्सर ऐसा ही होता है जब मोबाइल हमें गुड मार्निंग कहता है। आज भी जब मोबाइल बजा तो उनींदें से हमने फोन का हरा बटन दबाते हुए कहा, हैलो, लेकिन दूसरी ओर की आवाज सुनते ही हमारी सारी खुमारी हवा हो गई। फोन पर चचा हंगामी लाल हैलो, हैलो कर रहे थे।
क्या चचा, आज इतनी सुबह, सब खैरियत तो है,,
खाक खैरीयत होगी,, लड़ाई किसी की और नुकसान हमारा,,,
क्या नुकसान हो गया चचा, किस की लड़ाई की बात कर रहे हो,,
वो गेंद बल्ला खिलाने वाले अफसर नेताओं के टण्टे मे मेरा हजारों का नुकसान हो गया,,,,
किस की बात कर रहे हो,,
अरे तुम आजकल कहां रहते हो जो तुम्हें खबर ही नहीं, पता है,, यहां होने वाला क्रिकेट मैच अब यहां नहीं होगा,, बडौदा में होगा।
अरे तो उससे तुम्हें क्या,,, तुम तो मैच टीवी पर देख लेना,, फिर चाहे यहां हो या बड़ौदा में,,, तुम्हारी बला से
तुम भी भतीजे,, मैच यहां होता तभी तो हमारी कमाई होती,, अबकी बार प्लान बनाया था कि स्टेडियम के बाहर तिरंगी झंडियां, टोपियां और पेंटिंग का सामान लेकर बैठूंगा,, खूब बिक्री होगी,, तुम तो जानते ही हो कि क्रिकेट इस देश के लोगों के लिए क्या है, भगवान है, और भगवान की तो हम पर कृपा होती ही,,। लेकिन बुरा हो इन आरसीए वालों का। जाने क्या सूझी की आपस में ही लड़ पड़े। अरे भाई जब काम आता नहीं तो क्यों करने चले हो। जो करना जानते हैं उन्हीं को क्यों नहीं करने देते। पर ये खेल का मैदान भी जोरदार है,, खेल तो केवल वही सकता है जिसे खेलना आता हो, लेकिन खिलाने का इन्तजाम करने में पनवाड़ी तक जुट सकता है। जिसकी मर्जी हो जो खेल जाए। अब इनके इस चक्कर में तो मेरा नुकसान हो गया।
हां, चचा सो तो है,, तुम ठीक कह रहे हो, नुकसान तो हो ही गया,, लेकिन क्या करें, हिन्दुस्तान में क्या दुनिया में सभी जगह खेल संघों का ऐसा ही हाल है, हां वहां वो थोड़ा प्रोफेशनल हो जाते हैं, पैसा लगाते हैं और उसकी सही उपयोगिता हो इसकी परवाह करते हैं, यहां तो सब जगह यूं ही चलता है, अब देख लो, हॉकी में भी यही हुआ, मशीन गन थामने वाले हाथ हॉकी स्टिक थामने वालों का चयन करने लगे। बिगड़ते हाल देख सरकार ने नई हॉकी कमेटी भी बना दी लेकिन हॉकी सुधरी क्या। चचा,, यूं उम्मीद करोगे की खेल की हालात सुधर जाएगी तो मुश्किल होगा,, लोग हैं एक दूसरे का विरोध करेंगे ही,, एक को दूसरे का काम बुरा लगेगा ही,,
पर भतीजे यो तो मामला बिगड़ता ही जाएगा, आखिर इस मर्ज की दवा क्या है,,
चचा मैं कोई हकीम लुकमान तो हूं नहीं जो हर मर्ज की दवा मेरे पास हो लेकिन एक बात एकदम साफ है कि हिन्दुस्तान में जम्हूरियत का शासन है,, कामयाबी से चल रहा है, हर पांच साल में चुनाव हो जाते हैं, सरकार बदल जाती है, जब उस सरकार के पास पानी, बिजली, सड़क, शांति व्यवस्था, सुरक्षा, बैंक, का जिम्मा है तो खेल को दोयम दर्जे का मान उसे क्यों यो ही लोगों के हवाले कर दिया गया है,। यदि लोगों के हवाले करना भी है तो कोई व्यवस्था करो। जैसे सहकारिता में होता है, जब चुनाव होंगे तब होंगे, जो जीतेगा वो टर्म पूरी करेगा। यों थोड़ी ना कि बीच मे जब मर्जी आए,, चलो भाई हम बीस लोग हो गए अब हम काम करेंगे तुम चलो घर जाओ,, । बीस लोग उस समय कहां गए थे जब चुनाव हुए थे। कोई कायदा कानून है कि नहीं,, क्या हुआ चचा एकदम सुट्ट क्यों साध गए।
अरे वो तुम्हारी बात ही सोच रहा हूं कि कोई कायदा कानून है कि नहीं, ,, मुझे तो लगतान नहीं की कोई कायदा कानून ही है, होता भी है तो उसे जिसकी लाठी होती है वही अपने हिसाब से बदल देता है। यहां के मर्ज की भी यही दवा है, अमुक आदमी नहीं जीत जाए इसलिए उसके आदमी को वोट ही मत देने दो, कानून ही ऐसे बनाओ की मन चाहा ही जीते। जीत जाएं फिर कानून बदल दो,, फिर भी बात नहीं बने तो अदालत तो है ही जो,, यथा स्थिति बनाने के आदेश तो दे ही देगी।
चचा की बात को कुछ ज्यादा ही गम्भीर होते देख मैंने उन्हें रोकने की गरज से कहा,
चचा, क्यों बेकार में दुबले हो रहे हो, बात झंडिया बेचने की है तो उन्हें तो कभी बेच देंगे,
भतीजे तुम समझ नहीं रहे तो बात जितनी झंडियों के बेचने की है उतनी अपने सूबे के इकबाल की बुलन्दगी की भी है,,, इस सब से सूबे का कितना नुकसान होगा, मुझे तो उसकी चिन्ता है,,
चचा की चिन्ता अब मेरी भी चिंता बन गई थी, शायद सूबे के सभी लोगों की चिन्ता भी बन गई है,, कहीं ये खींचतान सूबे में क्रिकेट की चिता नहीं बन जाए,,,।

Wednesday, September 23, 2009

चाहिए एफिशिएंट ब्यूरोक्रेसी

कुछ दिन पहले की बात है,, एक बुजुर्ग महिला,उसका चेहरा ही उसकी उम्र को बयां करने के लिए काफी था, कोटा के दौरे पर आई एक मंत्री से वृद्धावस्था पेंशन की गुहार ले कर मिली। मंत्री महोदया ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था, उस बृद्धा को जिला कलेक्टर के पास ले जा कर उसकी मदद करने के लिए कहा। उस वृद्धा को पेंशन मिली या नहीं, मिली यह एक अलग सवाल है,, लेकिन उससे भी बड़ा दूसरा सवाल है कि उस वृद्धा को पेंशन लेने के लिए एक मंत्री का आसरा क्यों लेना पड़ा। जाहिर है मंत्री से मुलाकात से पहले भी वह कई सरकारी कारिन्दों से मिली होगी। लेकिन सरकारी कारिन्दों से उसकी मुलाकात का क्या हश्र हुआ होगा। सोचने वाली बात है। हम इतना बड़ा तंत्र विकसित कर चुके हैं लेकिन तंत्र में एफिशियंसी नहीं ला पाएं हैं। अब हमारी पहली प्राथमिकता तंत्र में एफिशिएंसी लाने की होनी चाहिए। हर कीमत पर हर हालत में एफिशिएंट प्रशासन होने पर ही हमारी तरक्की संभव है,,, ।

Monday, August 17, 2009

पार्टी विद अ डिफरेंस...

भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई में इन दिनो चल रही उठापठक को लेकर कल फेस बुक पर एक परिचित की टिप्पणी पढ़ने को मिली... वाकई भारतीय जनता पार्टी, पार्टी विद अ डिफरेंस...। दरअसल मामला राजस्थान में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के साथ शुरू हुआ और सुस्त नेतृत्व के कारण इतना बिगड़ा। भाजपा विधानसभा चुनाव में राजस्थान हारने जा रही है यह पार्टी में सभी को मालूम था। सभी से मतलब एक सामान्य कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के राजनीतिक पंडितों तक सभी को। हर कोई जानता था कि चुनाव बहुत आसान नहीं होगा। लेकिन मोदी फार्मुला चलाने औऱ तीन खेमों में बंटी पार्टी ने टिकटों की आपसी बंदरबांट के बाद चुपचाप चुनाव लड़ा और सभी क्षत्रप अजीबो गरीब अहम की लड़ाई में पार्टी को दांव पर लगता देखते रहे। हार हुई, लेकिन लोकसभा चुनाव में कोई सीख नहीं लेने की कसम खाते हुए उसी तिकड़ी के डिफरेंसेज के साथ राजस्थान में जबरदस्त नुकसान झेला गया। अब हार की समीक्षा में यह तय किया गया की सारे घर के बदल डालो। तो तीन में से दो ने अपना रास्ता पकड़ा लेकिन तीसरे को अपनी ताकत का गुमान हो गया। और नई पार्टी तक बनाने की बात हो गई। पता नहीं क्या सदबुद्धि मिली की बाद में कहा जाने लगा कि आदेश सिरमाथे। पर इस सबके बीच उन परिचित की उक्त व्यग्योक्ति सही प्रतीत होती दिखी।

दरअसल भाजपा पार्टी विद ए डिफरेंस तभी तक है जब यह आरएसएस की मूल विचारधारा और निरपेक्षता के सिद्धान्त पर काम करती रहे। जहां भी इसमें या इसके लोगों में सत्ता का भाव विद्यमान हुआ नहीं कि वह डिफरेंस अपनी डायवसिर्टी खो देता है। मुझे पिछले दिनों ही भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता से मुलाकात की याद आती है जब उनका कहना था राजनीति में कोई घर लुटाने नहीं आता। सबको कुछ न कुछ पाने की बनने की आस होती है,,,। और यह हकीकत है इससे मुंह नहीं चुराना चाहिए। लेकिन यह सब हासिल करने के लिए जनसेवा की ही राह चुननी होती है। उनके इस कथन के बाद मुझे सालों पहले कांग्रेस के एक वरिष्ठ दिग्गज नेता से हुई मुलाकात की याद आ गई। वे उस समय विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद की दौड़ में थीं। उनका भी यही कहना था राजनीति में पद एक चार्म है और सभी उसके लिए ही काम करते हैं। उन्होने इसे महत्वकांक्षा का नाम देते हुए कहा था कि महत्वाकांक्षी होना कोई बुरी बात नहीं है। दोनों ही कथन एक से हैं ,, बस बोलने वालों का चोला अलग है। भारतीय जनता पार्टी में सत्ता के सुर बोलने वालों की तादात लगातार बढ़ रही है। यहां तक की संघ के नाम पर भी लोग सत्ता के सुख को आजमाना चाह रहे हैं। और जब लक्ष्य एक है ,, सत्ता तो शायद पार्टी या पार्टी के लोगों के डिफरेंट होने का दावा खोखला ही रहता है। अब भारतीय जनता पार्टी की हालत देख कर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या ,, यह वही पार्टी है जिसे किसी विचारधारा पर आधारित पार्टी कहा जाता है। क्या एक हार किसी पार्टी को इस स्तर तक तोड़ सकती है कि संगठन गौण हो जाए। क्या वाकई में भाजपा का सालों पुराना इतिहास रहा है। ,, इन सबसे परे और सबसे बड़ा सवाल जब लक्ष्य एक है राजनीतिक पद और सत्ता प्राप्त करना तो अलग अलग दल-पार्टी का महत्व ही क्या बचता है। भारतीय जनता पार्टी की यह स्थिति केवल पार्टी ही नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र का भी कठिन समय है। यदि समय रहते भाजपा नहीं सम्भली तो यह देश का दुर्भाग्य ही होगा। एक स्तंभकार लिखते हैं आडवाणी फिर से स्वस्थ हो रहे हैं और उनके परिवार के लोग उनकी छवि को स्वच्छ बनाने में जुट गए हैं। वे लम्बे समय तक नेता प्रतिपक्ष बने रह सकते हैं। यानी आडवाणी स्वयं ही सत्ता से दूर नहीं होना चाहते। वे फिर से नेतृत्व के लिए तैयार हो रहे हैं। ऐसा होने पर वे दूसरों को कैसे दूर होने की सलाह दे पाएंगे और कैसे पार्टी में जोश जगा पाएंगे। यह भी लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि कोई राजनेता अपनी हार होने पर उसे स्वीकारना नहीं चाहता और पार्टी व देश उसे सहने पर मजबूर है।

Thursday, July 9, 2009

चलो आम आदमी को मजबूत बनाएं

आज जब दरवाजे पर दस्तक हुई तो बड़ा अजीब लगा। जब से नए शहर में आए हैं तब से हमारे दरवाजे पर यह पहली दस्तक थी। सच पूछो तो शायद इस शहर में दरवाजों पर दस्तक देने का रिवाज ही नहीं है। खैर हम अचकचाए से, हड़बड़ाए से दौड़ते दौड़ते से दरवाजे तक पहुंचे और एकदम से दरवाजा खोला, तो जो चेहरा हमें देख रहा था, या यूं कहूं की घूर रहा था, उसे देख हमारी तो बांछें ही खिल गई। दरवाजे पर खड़े थे अपने चचा हंगामी लाल। बेसाख्ता मुंह से निकला,, अरे चचा आप और यहां।

क्या करते बरखुरदार तुम तो वहां से चले आए और हमारा हाल भी नहीं लिया सोचा चलो एक पंथ दो काम कर आऊं।

यह तो बहुत बढ़िया किया चाचा आपने पर ये एक पंथ दो काम वाला चक्कर समझ नहीं आया।

अरे भतीजे बड़ा सीधा सा चक्कर है। मैं घर से निकला था आम आदमी की तलाश में। सोचा चलो तुम्हारे शहर के आस पास ही तलाशा जाए आम आदमी, सो चला आया।

पर चचा ये आम आदमी की तलाश.. वो भी एकाएक,,, भला ऐसी भी क्या सूझी।

अरे भाई आम आदमी का जमाना फिर से लौट आया है। गरीब की बात करने वाले अब आम आदमी की बात कर रहे हैं। केन्द्र से लेकर राज्य तक आम आदमी को ही मजबूत करने की बात हो रही है। सो हम भी चल पड़े हैं उसे ढूंढने और मजबूत करने।

पर चचा आप कैसे मजबूत करोगे।

अरे भाई जैसे ये सरकार वाले करेंगे हम बिना कार करेंगे। सर तो हमारे पास है ही।

चचा बात कुछ समझ नहीं आई।

अरे इसमें समझ नहीं आने वाली क्या बात है। वो भी मजबूती की बात कर रहे हैं हम भी मजबूती की बात कर रहे हैं। जैसे ही आम आदमी मिला नहीं कि उसे पकड़ कर खट से खड़ा कर देंगे। देखो ये फट्टे देख रहे हो..(वो हमें अपने साथ लाए लकड़ी के फट्टे दिखाने लगे.. ) बस इनसे उसके पैरों को घुटनों से बांध देंगे।

इससे क्या होगा..

अरे इतना भी नहीं समझते..। खड़ा आदमी बैठता कैसे है.. घुटने मुड़ने से ही न.. लेकिन हम तो ऐसा इंतजाम करेंगे की वो अपने घुटने मोड़ ही नहीं पाए। उसके घुटनों को पक्की मजबूती देंगे।

लेकिन चचा ये तो केवल पैरों का इंतजाम हुआ..

चिन्ता मत करो भतीजे हमने सब सोच लिया है,, हमें यह भी पता है कि आम आदमी बहुत कमजोर है,,, इसलिए हम भी सरकार की तरह पट्टों का खूब सारा स्टॉक साथ लेकर चल रहे हैं.. जहां भी कमजोर होगा वहीं मजबूती के लिए पट्टे बांध देंगे... बोलो है ना पुख्ता इंतजाम...।

अब चचा के इतने पुख्ता इंतजामों के बाद भी असहमत होने की गुस्ताखी कौन कर सकता है,,,,। कम से कम मेरी तो हिम्मत नहीं है.. आपकी आप बताएँ...।