Thursday, March 20, 2014

खुशवंत... जो शब्दों को बना देता था जीवंत...


खुशवंत सिंह नहीं रहे....। यह टीप अभी अभी फेसबुक पर पढ़ी।  मन में धक्का सा लगा। तुरन्त समाचार वेबसाइट्स खंगालनी शुरू की और,,,,। आखिर उस शब्द चितेरे को काल अपने साथ ले ही गया। 99 साल की शानदार पारी में खुशवंत सिंह जिन्हें हम एक पत्रकार, उपन्यासकार, इतिहासकार, स्तम्भलेखक के रूप में जानते हैं अपनी लेखनी से खुशवंत ने मानव मन के कई रूपों को लगातार उजागर किया। कई लोग उनकी बोल्ड लेखनी को जबरन ठूंसा गया यौन वृतांत मानते रहे हैं पर यह भी सच है कि उनकी पुस्तकें बेस्ट सेलर रहीं।  ए कम्पनी ऑफ वुमन तो इस लिहाज से बहुत आगे रही। खुशवंत सिंह खुद कहते थे कि सेक्स के बिना जीवन की कल्पना बेमानी है। उनकी किताबों का जिक्र करते समय हर किसी की आंखों में एक शरारती मुस्कान तैर जाती रही है। पर फिर भी उनका लिखा इतना प्रवाहवान होता है कि उसे सिंगल सिटिंग में खत्म करने की इच्छा सदैव बलवती रही।  मुझे तो लगता है कि वे आधुनिक दौर के बाबू देवकी नंदन खत्री थे। भले ही उनके उपन्यासों  में ऐयार, जासूस, रहस्य नहीं हो पर उनकी लेखनी में बांधे रखने की गजब क्षमता थी।
          देश की राजधानी जिस लुटियन्स दिल्ली में बसती है उसे बनाने वालों में थे उनके पिता सोभा सिंह। 2 फरवरी 1915 को पंजाब के हडाली ( अब पाकिस्तान ) में जन्मे खुशवंत सिंह पर विभाजन का गहरा असर पड़ा था। उन्होंने उस पीड़ा को ट्रेन टू पाकिस्तान में जाहिर भी किया। अस्सी से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके खुशवंत सिंह योजना जैसी सरकारी पत्रिका के सम्पादक भी रहे तो इलेस्ट्रेड वीकली साप्ताहिक के संपादक भी। सिंह ने  विदेश मंत्रालय की नौकरी भी की। खुशवंत का साप्ताहिक कॉलम लोगो की स्मृतियों में लम्बे समय तक बना रहेगा। उनकी सक्रियता की मिसाल इससे ही ली जा सकती है कि 98 की उम्र में भी वे खुशवंतनामाः द लेसंस ऑफ माई लाइफ लिख रहे थे। सिंह 80 से 86 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। इससे पहले 1974 में ही उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका था। पर बाद में 1984 में स्वर्ण मंदिर की कार्रवाई के विरोध में उन्होंने इसे लौटा दिया था। उन्हें 2007 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।सिंह की इंदिरा गांधी से नजदीकियां थीं और इसी वजह से वे कांग्रेस के काफी करीब थे। उन्होंने सिक्ख इतिहास पर गहन काम किया था और खूब लिखा भी । खुशवंत पर बहुत कुछ लिखने का मन है,, अभी तो बस भारी मन से उन्हें आदरांजलि।

Sunday, March 16, 2014

आखिर क्या है केजरीवाल का उद्देश्य

भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को बनारस से पार्टी प्रत्याशी घोषित कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मुरली मनोहर जोशी का विरोध राष्ट्रीय स्वयं सेवक के दखल के पश्चात खत्म हुआ और वो कानपुर से चुनाव लड़ने उतरे। गलती से राजनीति में फंस गया विज्ञान का विद्यार्थी अब पराभव की ओर बढ़ती उद्योगनगरी कानपुर से भाग्य आजमाएगा। भाजपा की सूची में और भी कई उलटफेर हैं। पर लगभग सभी बड़े नाम सूचियों में जगह पाते जा रहे हैं। हालांकि लाल कृष्ण आडवाणी की टिकट की राह जरा मुश्किल नजर आ रही है।
     लोकसभा चुनाव अब दिलचस्प मोड़ लेता जा रहा है, और एकाएक मुकाबला कांग्रेस बनाम भाजपा की बजाय मोदी बनाम केजरीवाल बनाने की कवायद साफ नजर आ रही है।क्या वाकई ऐसा है? क्या केजरीवाल मोदी का मुकाबला कर सकते हैं। उन मोदी का जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया है। केजरीवाल किस गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी हैं? क्या उनकी पार्टी दिल्ली के अपने प्रदर्शन के दम पर केन्द्र में सत्ता हासिल करने का दावा कर सकती है? चलिए एक बारगी मान लेते हैं कि कोई करिश्मा हो जाए और दिल्ली विधानसभा में दूसरी बड़ी पार्टी बन कर उभरने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली की सातों सीटें भी जीत जाए। उसकी सूची के कुछ और बड़े बड़े नाम भी जीत जाएं तो भी आम आदमी पार्टी के कुल सांसदों की संख्या क्या मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, जयललिता की अन्ना द्रमुक , करुणानिधि की द्रमुक, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सीटों से ज्यादा हो सकती है? शायद यह संभावना बहुत दूर की कौड़ी होगा। तो.. तो ,, फिर आखिर क्या है केजरीवाल का उद्देश्य...?
    भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे केजरीवाल मूलतया  आरटीआई के लिए काम करते हुए सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हुए थे। इसके पश्चात उन्होंने भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए जन लोकपाल की मांग की।पर उनकी मांग कोई बहुत असर नहीं डाल पा रही थी। अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें एक चेहरा चाहिए था। उनकी नजर पहुंची महाराष्ट्र के एक गांव रालेगण सिद्धी में ग्राम स्तर पर विकास का अनूठा मॉडल खड़ा करने वाले पूर्व फौजी अन्ना हजारे तक। फिर एकाएक एक रोज अन्ना हजारे के नेतृत्व में जन लोकपाल की मांग बुलंद होती है। रामलीला मैदान पर अन्ना का धरना होता है। और अन्ना के साथ प्रमुख रणनीतिकार के रूप में नजर आते हैं अरविन्द केजरीवाल। धरना चलता है। भ्रष्ट सरकारों से त्रस्त पूरा देश अन्ना की छतरी तले लामबंद होने लगता है। भाजपा के नेता भी धरने का समर्थन करते हैं। कई लोगों का तो यहां तक कहना है कि उस समय धरने को और अन्ना के आंदोलन को सफल बनाने के लिए संघ के कार्यकर्ता भी अन्ना टोपी पहने नजर आए थे। खैर लम्बा आंदोलन होता है और यूपीए सरकार जनलोकपाल लाने का वादा करती है। इसी बीच एक चुनौती उछलती है कि आंदोलन करना और बात है... राजनीति और... हिम्मत हैं तो धरना देने वाले राजनीति में उतर कर खुद विधानसभा में पहुंचे। केजरीवाल चुनौती स्वीकारते हैं। गठन होता है आम आदमी पार्टी यानी आप का। केजरीवाल की पार्टी ने अपना केंद्र चुना दिल्ली। वह दिल्ली जहां पूरा आंदोलन हुआ। केजरीवाल के सामने थी कांग्रेस सरकार। वही कांग्रेस जिस कांग्रेस के नेताओं ने उन्हें राजनीति में आने की चुनौती दी थी। केजरीवाल ने घोषणा की थी कि उनकी पार्टी सरकार में आएगी तो शीला दीक्षित के खिलाफ मुकदमा होगा। कॉमनवेल्थ घोटाले के आरोपी जेल जाएंगे। भ्रष्टाचार की परतें उघड़ेंगी। विधानसभा के नतीजों ने नायक फिल्म के अनिल कपूर को साकार कर दिया। अरविन्द की पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली। अरविन्द की पार्टी ने बाद में सरकार भी बनाई। उसी कांग्रेस के समर्थन से जिसके विरुद्ध ये सारी लड़ाई शुरू हुई थी। खैर उनपचास दिन बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया। और वे लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए। पर ये क्या अब उनके भाषणों का केन्द्र यूपीए सरकार नहीं थी। वो यूपीए सरकार जिसने उनके जन लोकपाल को मानने की बजाय अपना ही लोकपाल बिल लाकर एक तरह से उनसे वादा खिलाफी की थी। वो यूपीए सरकार जो पिछले दस साल से केन्द्र में काबिज है। वो यूपीए सरकार जिस पर टूजी, सीडब्ल्यूजी, कोयला घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के मामलों में लिप्त होने के आरोप लगे। वो यूपीए सरकार जिसके नेताओं की चुनौती को मान कर अरविंद राजनीति में उतरे थे। वो यूपीए सरकार उनके निशाने पर नहीं है। बल्कि एकाएक उनके निशाने पर आ गए भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेद्र मोदी। अब अपने भाषणों में वे केन्द्र की नीतियों की आलोचना नहीं करते, बल्कि वे अब गुजरात का सच उजागर करने की जल्दबाजी में दिखते हैं। उनके भाषणों मे राहुल, सोनिया नहीं मोदी की आलोचना होती है। जबकि मोदी तो अभी केन्द्र में पहुंचे भी नहीं हैं। देश की वर्तमान स्थिति के लिए किसी भी तरह से मोदी, भाजपा या राजग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। फिर भला अरविंद क्यों कर पूरी तरह से मोदी विरोध की राजनीति पर उतर आए हैं।
     इसे समझने के लिए आप बस भारतीय चुनावों की एक बेहद मूल बात को समझ लें।और वह है चुनावों का एफसीसीबी सिद्धांत। यानी फर्स्ट पास्ट द पोस्ट। अर्थात जो सबसे आगे रहा वो जीता। चुनाव एक तरह से वो खेल हो गया है जिसमें वह खिलाड़ी जीतेगा जिसने एक निश्चित समय में सबसे ज्यादा केले खाएं हों। और केले कुल दस ही हों।अब यदि कोई चार ही केले खा सकने की ताकत रखता हो और वह जानता हो कि सामने वाला छह केले खा सकता है तो वह क्या करता है कि  दो प्रतियोगी और उतार देता है, कोई एक खाएगा कोई दो ,,, यानी तीन केले तो इन निश्चित हारने वाले खिलाड़ियों ने खा लिए। यानी दोनों मुख्य खिलाड़ियों के लिए बचे कुल सात केले। इस दौरान निश्चित गति से अपनी चाल से केले खाने वाला चार केले खा कर भी जीत जाएगा। जबकि छह केले खा सकने की क्षमता रखने वाले के लिए केले बचेंगे ही नहीं क्योंकि दो कमजोर से खिलाड़ी अनावश्यक रूप से तीन केले चट कर गए। शायद इन चुनावों में भी कुछ ऐसा ही खेल होने जा रहा है। कोशिश की जा रही है, यूपीए के कार्यकाल से बने सत्ता विरोधी वातावरण और भ्रष्टाचार विरोधी लहर को किसी तरह से बांट दिया जाए। पर शायद रणनीतिकार भी यह अच्छे से समझते हैं कि जब तक प्रतिद्वंद्वी जीतने लायक नही होगा तब तक वोट नहीं बनेंगे। और इसीलिए इस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है कि केजरीवाल मोदी को टक्कर दे सकते हैं।ताकि केजरीवाल की पार्टी को कुछ वोट मिल जाएं। ऐसा होने पर वो वोट शर्तिया यूपीए विरोधी मत होंगे जो मोदी  के नेतृत्व वाले राजग को मिलने वाले हो सकते हैं। केजरीवाल की भी खुद की ऐसी ही कोशिश है कि वो मोदी को मिलने वाले मतों में सेंध लगा सकें। ऐसे में केजरीवाल को मिलने वाले मतों का सीधा फायदा किसे होगा? जाहिर है कांग्रेस और उसके गठबंधन के सहयोगियों को। कुछ जगहों पर क्षेत्रीय दल भी इस बंदरबांट में हिस्सेदारी हासिल कर सकते हैं।
     एक बात और भी है केजरीवाल देश के प्रगतिशील सुधारकों के एक खास समूह से ताल्लुक रखते नजर आते हैं, कुछ लोग उसे वामपंथी समूह भी कहते हैं। हालांकि केजरीवाल ने वामपार्टियों का दामन नहीं थामा पर उनके समर्थकों में इस विचार के लोग बहुत आसानी से चिन्हे जा सकते हैं। उनके प्रत्याशियों की सूची में भी मेघा पाटेकर, सोनी सोरी जैसे नाम इस संभावना को ही बल देते हैं कि शायद उन्हें वामपंथ का समर्थन हासिल है और देश में पूरी तरह से नकारा जा चुका वामपंथ एक नए रूप में अवतरित हो रहा हो।
     यदि केजरीवाल पूरा देश और दिल्ली छोड़कर मोदी से मुकाबला करने बनारस जाते हैं तो यह एक तरह से साफ हो जाता है कि केजरीवाल का उद्देश्य भ्रष्टाचार रोधी शासन की स्थापना से ज्यादा मोदी को रोकना होगा। हालांकि लोकतांत्रिक देश में वे इसके लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं कि वे किन रणनीतियों से आगे बढ़ें पर आम जन मानस में यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि केजरीवाल एकाएक कांग्रेस से मुकाबला करना भूल कर मोदी के मुकाबले में क्यों खड़े हो रहे हैं? जबकि चुनावशास्त्र की जरा भी समझ रखने वाला कह सकता है कि वे स्वयं अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं, और उनका इस तरह का व्यूह अंततः कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगा। उसी कांग्रेस को जिसने उनके लोकपाल को नहीं माना। न लोकसभा में और न ही उनकी अपनी दिल्ली विधानसभा में। जहां वे सदन के नेता होने के बावजूद लाचारी के साथ लोकपाल पर प्रस्ताव के मुद्दे पर इस्तीफा दे आए।

Thursday, March 13, 2014

चायवाला, टोपीवाला, साइकिल वाला....या चॉकलेटी बॉय


चचा हंगामीलाल बहुत दिनों बाद फिर अवतरित हुए हैं। बड़े परेशान हैं। भिड़ते ही न दुआ न सलाम। बस बहुत गंभीर। विचार मग्न। उन्हें अचरज से देखते हुए हमने कहा चचा, चाय मंगा देता हूं, चाय पियोगे। जवाब मिला,, भाई, चाय पीने तुम्हारे पास क्यों आऊंगा। हर नुकक्ड़ पर चाय चौपाल लग रही है। वहीं खूब पी है। जम कर। फिर ,,, अरे वो क्या है ना कि अब से एक महीने बाद चुनाव हैं...। सोच रहे हैं इस बार किसे वोट दिया जाए।.. हम कहे.. अरे चचा जिसे जमे उसे ही दे दो..। कहने लगे अरे बहुत मुश्किल हो रही है। एक तो अच्छा भला विकास पुरूष खुद को चाय वाला चायवाला बनाने पर तुला है,,,। दूसरा कभी मां की दुहाई दे कर कहता है सत्ता जहर है,,, और खुद ही नीलकंठ बनने चला है। और तीसरा जो की खुद को आम आदमी बताता है.. कभी नेताओं को कोसता है, कभी उद्योगपतियों को कोसता है.. कुछ साफ साफ समझ नहीं आता कि आखिर वो है किस तरफ...।
तो चचा आप बताओ क्या करें..। गुमसुम चचा बोले,, देखो भाई अभी तो लड़ाई शुरू हुई है...। छुटभैय्यै नेता इधर से उधर होना शुरू हुए हैं। एक बार सब सेटल हो जाने दो फिर ही देखेंगे... कि किसे वोट देना है...। इतना कह कर चचा तुरंत उड़न छू हो गए। चलिए हम भी जरा लड़ाई का  आनंद लें..।

Sunday, February 24, 2013

कोई है जो प्यार से कह सकेः "हेलो?"

आज अर्से बाद एकाएक कुछ पढ़ने का मन हुआ सो किताबों के रैक में किताबें पलटते पलटते एक पुरानी पत्रिका पर उंगलियां अटक गईं। पत्रिका थी सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट अमरीका की प्रतिष्ठित पत्रिका रीडर्स डाइजेस्ट का हिन्दी अनुवाद। अंक था अक्टूबर 1993 का। मुझे सही मायनों में पढ़ने की आदत डालने का श्रेय बाबू देवकीनंदन खत्री के बाद इसी पत्रिका को जाता है। पन्ने पलटते हुए वो बचपन के दिन याद आ गए जब मैं बेसब्री से डाकबाबू का इन्तजार किया करता था। इसी बीच इसी पत्रिका से जुड़ी कल आई खबर याद  आ गई। और मन की अजीब सी स्थिति हो गई। खबर थी रीडर्स डाइजेस्ट ने फिर दिवालिया घोषित होने के लिए आवेदन किया है। एक बढ़िया पत्रिका की यह गति विचलित करने वाली है।
 तो अक्टूबर 1993 का उस अंक के पन्ने पलटते समय एक पन्ने पर टाइम्स, न्यूयॉर्क में प्रकाशित हुए एक छोटे से उद्धरण ने तत्कालीन अमरीका और आज के भारत की सामयिकता को उजागर कर दिया और मेरा मन इस विचार से उल्लसित हो गया कि जो स्थिति अमरीका ने आजादी के  217 साल बाद हासिल की वह हमने 66 साल में ही हासिल कर ली। तो पेश है सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के अक्टूबर 1993 के अंक में पृष्ठ 26 पर प्रकाशित यह अंश-
 "
हेलो! हेलो?
आप एकमी रबर डक कंपनी में पहुंच गए हैं.आप भुगतान विभाग में किसी से बात करना चाहते हैं तो 1 नम्बर दबाइए. यदि आप कुं करने वाले विभाग में किसी से बात करना चाहें तो 3 दबाइए. यदि आप को पता न हो कि आप किस से बात करेंगे तो नंबर 4 दबाइए.
अतः मैं 4 दबाता हूं और फ़िल्म '2001'के कंप्यूटर हॉल की सी लिंग भ्रामक आवाज आती हैः धन्यवाद, कृपया खामोशी के साथ प्रतीक्षा करें.
यह क्या समझता है इस बीच मैं हाथी का शिकार करने निकल पड़ूगा ?
हमें खेद है, सर, खामोशी के दौरान आप के अनधिकृत रूप से चॉकलेट की पन्नी फाड़ने की आवाज कर देने के कारण आपकी यह कॉल समाप्त कर दी गई है.
अब बारी आती है हिज्जे परीक्षण की. मुझे मिस्टर क्रैमर से बात करने का संदेश मिला है. आप जिस से बात करने आए हैं उस का एक्सटेंशन नंबर नही जानते तो उस के नाम के पहले चार अक्षर भरिए---अब.
मैं लिखता हूं  के-आर-ए-एम. यह मेल क्रैमिंस्की का दफ्तर है. मैं यहां नहीं हूं. यदि आप संदेश छोड़ दें तो मैं आपसे संपर्क कर लूंगा.
"सॉरी," मैं बुदबुदाता हूं."रांग नंबर." हो सकता है वह के-आर-इ-एम-इ-आर लिखता हो. और इस तरह से मुझे जिल क्रैम्स्की मिल जाता है. सी-आर-ए-एम से मिलता है हारवी क्रैमस्टन.
ऐसी कुंठा की तुलना तो बस संगीतमय स्विच बोर्ड से ही हो सकती है. मैं एक नई नौकरी के लिए साक्षात्कार का समय निश्चित करने के लिए फ़ोन करता हूं. मेरे संभावित बॉस की सचिव मुझे होल्ड करने को कहती है. मैं लिंडा रॉनस्टैड की संगीतमय चीखें सुनता हूं, "यूं आर नो गुड !"
इलेक्ट्रॉनिक स्विचबोर्ड से संपर्क का आनंद लेने के लिए उस के टक्कर का कोई चीज़ होनी चाहिए ----- जैसे  कि ऑटोमैटिड टेलीमार्केटिंग मशीन. यह चीज आप को गुसलखाने से बाहर खींच कर कहती हैः यह बहुत महत्वपूर्ण सर्वेक्षण है. यदि आप इन प्रश्नों का उत्तर दें तो इस से हमें आप की अधिक प्रभावकारी सेवा देने में सहायता मिलेगी. दोनों मशीनें अंतहीन पुशबटन वाले कूंकूं, पींपीं और चुप्पियों के माध्यम से एक दूसरे से कलोल करती रहेंगी---और बीच बीच में मोट्सार्ट या मैडोना का संगीत भी चलता रहेगा.
कहिए---- आज के जमाने में कहीं कोई है जो प्यार से कह सकेः "हेलो?"
- मार्टिन ऐशर, 'टाइम्स 'न्यू यॉर्क

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तो अब भारत में भी गहरे तक पैठ चुके आईवीआरएस के युग में क्या आप और हम भी नहीं कहते हैं--- आज के जमाने में कहीं कोई है जो प्यार से कह सके..... हेलो....
क्या कहते हैं......

Saturday, February 23, 2013

रचनात्मक लेखनः कुछ टिप्स

मुझे अक्सर कई लोग मिलते हैं जो कहीं, किसी प्रकार अपना लिखा कुछ प्रकाशित करवाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि आज मैं इस विषय पर कुछ लिखूं, आप भी इसमें कुछ जोड़ेंगे तो अच्छा लगेगा।

सबसे पहले तो आपको यह तय करना होगा कि आप किस विषय पर लिखना चाहते हैं। हर विषय पर पूरे अधिकार के साथ लिख पाने की प्रतिभा कम ही लोगों में होती है और वे भी इसे लम्बे अभ्यास के बाद ही निखार पाते हैं। इसलिए शुरुआत में यह आवश्यक है कि आप अपनी रुचि के बारे में अच्छे से विचार करें। जब एक बार यह तय कर लें कि आपका रुझान किस तरह के लेखन की ओर है तब अगला चरण होगा उससे जुड़ी तमाम बातों -तथ्यों के बारे में आपकी जानकारी को बढ़ाने का। इसी प्रक्रिया में आप यह भी पता लगा सकेंगे कि इन दिनों उक्त विषय पर किस तरह के लेख प्रकाशित हो रहे हैं। जब आपको यह अंदाजा हो जाए कि किस तरह के लेख और कितनी जानकारी के साथ प्रकाशित हो रहे हैं, तब आप तैयार होते हैं लेख लिखने के लिए। लेख लिखते समय सबसे महत्वपूर्ण होती है शैली। यह एक मौलिक तत्व है जो हर लेखक को अपनी विशिष्ट पहचान देती है। बस लेखन की स्वयं की शैली विकसित करते समय एक बात जो ध्यान में रखनी चाहिए वह होती है कि आप किस माध्यम के लिए लिख रहे हैं। अलग अलग माध्यमों की अपनी अलग प्रकार की मांग होती है। कुछ माध्यमों में संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित लेख प्रकाशित होते हैं तो कुछ में लम्बे लेखों के लिए भी स्थान होता है। समाचार पत्रों में सामान्यतया 350 से 600 शब्दों तक के आलेख प्रकाशित होते हैं। कुछ समाचार पत्र 1000-1500 शब्दों के आलेख भी प्रकाशित करते हैं। ऐसे में आपको यदि पहले से पता हो कि आप किस के लिए लिख रहे हैं तो उसी अनुरूप अपनी बात को शब्द सीमा में रहते हुए व्यक्त कर पाएंगे। अधिकांशतया नए या अपरिचित लेखकों के टिप्पणी लेखों को स्थान मिलने में मुश्किल होती है।अतः शुरुआत आप जानकारी परक लेखन से कर सकते हैं। लेख को लिखने के पश्चात उसे ठीक प्रकार से पढ़ें। आवश्यकतानुसार उसमें कांट-छांट करें। पढ़ते समय खुद को लेखक नहीं पाठक मानें और उसी नजरिए उसकी कतर-ब्योंत भी करें। जरा भी अनावश्यक लगने वाला वाक्यांश आपकी कांट-छांट से नहीं बचना चाहिए। नया दौर पूरी तरह कागजरहित है। ऐसे में आप भी लेख को कम्पोज कर ईमेल के द्वारा ही भिजवाएं। कोशिश करें कि जिस माध्यम में आप भिजवा रहे हों वहां उस तरह के कार्य का दायित्व वहन करने वाले व्यक्ति से आपकी एक बार पहले चर्चा हो जाए और आप संबंधित विषय पर उनकी भावनाओं को जान कर उसी अनुरूप अपने लेख में आवश्यक परिवर्तन कर लें। उनसे वांछित फाइल फार्मेट, फॉन्ट की जानकारी भी ले लेवें और उसी अनुरूप अपने लेख को भिजवाएं। संभव हो तो लेख के साथ किस तरह का विजुअल उपयोग किया जा सकता है इसका सुझाव भी दें।
 कई बार नए लेखक एक ही लेख को  एक साथ अलग अलग माध्यमों में भेज देते हैं। ऐसा कदापि नहीं करें। सामान्यतया प्रकाशन माध्यमों किसी भी आलेख के प्राप्त होने के बाद प्रकाशन के लिए स्वीकार करने और प्रकाशित होने तक करीब छह सप्ताह तक का समय लग सकता है। इसलिए इतना समय अवश्य धैर्य रखा जाना चाहिए। आवश्यकता लगे तो संबंधित व्यक्ति से एक -दो बार आग्रह कर सकते हैं पर अति आग्रह संबंधित व्यक्ति के कार्य में बाधक बन सकते हैं। इसका भी ध्यान करें।  अवसर विशेष से संबंधित आलेख के बारे में पहले से सूचित करना उचित रहता है।

Thursday, November 1, 2012

पता नहीं क्यों ?

जाने आज क्यों परेशान थी रिद्धिमा..? आखिर आज ऐसा क्या हो गया जो उसे इतना चुभ रहा था..? अब से पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ। और फिर जो हुआ वह भी तो ऐसा नहीं था जो उसके लिए कुछ नया हो। उसके लिए तो यह सब बहुत सामान्य सा था। फ्रेंड्स अक्सर नाइट आउट पर जाते ही रहते हैं। पार्टी खत्म होने तक किसे होश रहता है कि कौन किसके साथ जा रहा है। उसे खुद ही कहां पता रहता है। फिर यदि जे.. उसके फ्रेंड सर्किल में यही नाम है ज्योत्सना का... अमित के साथ चली गई तो क्या हो गया? अब न उसे और न ही उसके ग्रुप में किसी को इन बातों से कोई फर्क पड़ता है कि कौन किस के साथ कहां घूम रहा है? क्या खा रहा है? क्या पी रहा है? और किस हद तक जा रहा है? अब हदें बची ही कहां है? हद से पार होते हुए भी हद में रहने का सारा सामान तो हमेशा पर्स में रहता है?  इतना सोचते-सोचते उसे याद आ गया जब दीदी कुछ दिन उसके साथ रहने जयपुर आ गई थी। कितनी मुश्किल से समझा पाई थी उसे कि उसकी रूम मेट के पास एंटी प्रेंग्नेंसी पिल्स क्या कर रही थीं। कितनी और कैसी कहानी गढ़ी... गॉड नो। फिर अब अमित और जे को लेकर उसे क्यों परेशानी हो रही है? वैसे उसका खुद का अपना व्यवहार भी तो पिछले चार -पांच दिन से बदल रहा है। अब उसे पार्टीज में हर किसी के साथ डांस करना नहीं भा रहा था। दो-चार स्टेप्स के बाद ही उसे अजीब सा लगने लगता था। और बूज़ वो तो बिल्कुल ही मिस कर देना चाहती है। क्यों इतना बदल रही है वह...यही सब चलता रहा तो मिसफिट हो जाएगी वो अपने सर्किल में। कितने जतन से तो इतने दोस्त बने हैं। मजे मारने का मौका मिल रहा है।आए दिन पार्टी, रात तक थिरकना, लोंग ड्राइव पर जाना। ब्रांडेड कपड़े और जाने क्या क्या। दो साल पहले जब वो जयपुर आई थी, तब कैसी लगती थी, सलवार सूट में कंधों से सरकती चुन्नी को संभालने में ही जुटी रहती थी। पता ही नहीं था कि लाइफ इतनी रंगीन भी होती है। घरवालों से लड़कर हॉस्टल छोड़ा और पीजी जॉइन किया। तब पीजी में शुरू हुई थी नई लाइफ। डेढ़ साल हो गया अब तो सबकुछ फिल्मी लगता है। टीवी पर एड्स में दिखने वाली मॉडल्स भी पीछे रह जाती हैं। पर आज ऐसा क्यों हो रहा है...। तभी रिद्धिमा की नजर कलैण्डर पर पड़ती है..... अरे आज तो एक तारीख हो गई... पर इसमें क्या नया है... तारीख तो बदलनी ही है... वह दिन गिनने लगती है...... 10 ... पूरे 10 दिन ऊपर हो गए हैं ........। कहीं ये अमित की उस दिन की जिद्द की नतीजा तो नहीं है जब उसने कहा नो .. आज हम कुछ भी यूज नहीं करेंगे.. और वो भी तरंग में मान गई थी...। उसे लगा था पिल्स ले लेगी। फिर उसने पिल्स लेना भी चाहा था.. पर पता नहीं क्यों ले नहीं पाई थी....। अब दिन निकल रहे थे...। यानी कुछ गड़बड़ थी। गड़बड़ से उसे कोई डर नहीं था ... उसे अच्छे से पता था एमटीपी किट के बारे में। जरूरत पड़ी तो उससे सब ठीक हो जाएगा। पर उसे अब भी समझ नहीं आ रहा था कि वह इतना परेशान क्यों है? क्यों उसे जे का अमित की एसयूवी से उतरना अच्छा नहीं लगा? पता नहीं क्यों....?

Tuesday, January 24, 2012

जेएलएफः आवो नी पधारो म्हारे देस

आजकल पता नहीं क्या हो रहा है कि चचा हंगामी लाल जब भी मिलते हैं, उदास ही मिलते
हैं, आज ही शाम की बात ले लो, सुबह तो बड़े उत्साह से बोले थे कि भतीजे आज जा रहा हूं
जरा कुछ देख कर आता हूं साहित्य का कुछ मजमा चल रहा है शहर में, वहां जरा कुछ भाई लोग
आए हुए हैं उनसे बतिया कर आता हूं। सो हम तो शाम को उनसे बहुत सारी दुनिया भर की बातें
सुनने की उम्मीद लगाए बैठे थे। लेकिन ये क्या शाम को जब आए तो सुबह सूरजमुखी सा खिला
चेहरा शाम को डाल से टूटे पत्ते की तरह मुरझाया हुआ था। हमारी सवालिया नजरों को ताड़
कर बिना कुछ पूछे ही वे बोलना शुरू हो गए।
भतीजे का बताएं तुमको, आज हम तो बहुत अरमान से गए थे कि अपने पुराने यार लोग आए हुए हैं
उनसे गप करेंगे, कुछ कविता की बात होगी, कुछ गजल की। कुछ किस्से सुनेंगे कुछ कहानी कहेंगे।
बड़ी मुश्किल से तो हम जैसे तैसे उस मजमे में अन्दर घुस पाए, लेकिन घुसने से पहले ही हमें लग
गया था कि आज कुछ शगुन ठीक नहीं लग रहे। पता चला वहां कोई वीसी उसी होने वाली
जिसमें कोई अपनी बात कहना चाह रहा था, पर कुछ लोग चाह रहे थे कि वो अपनी बात नहीं
बोले, ...। हम तो जैसे तैसे बचते बचाते अन्दर पहुंचे और अपने मित्रों को ढूंढने में लग गए। एक
आध मिला भी, पर किसी का भी मिजाज कुछ जमता नहीं लग रहा था। जरा कुरेद कर पता
किया तो सबके मन में एक ही सवाल गूंज रहा था क्या वाकई हिन्दुस्तान में इसे ही आजादी
कहते हैं। सरकारें ऐसे ही संविधान के रक्षा करती हैं। उसकी पालना करती हैं। अरे भाई जो
चीज प्रतिबंधित है वो वाकई प्रतिबंधित है उस पर कोई बोले तो जो जायज हो वो कार्रवाई
करो, कानून में गलती है तो माननी ही पड़ेगी। अब जो कहें कि कानून ने गलत रोक लगाई है
तो उसका भी निस्तार है,, गुहार लगाओ,, भाई लोग लगा भी रहे हैं,,,। जो कहते हैं कानून
सही है और उसकी पालना हो, तो यह भी ठीक है,, । कानून का पालन तो होना ही
चाहिए। जहां कुछ गलत लगे वहीं रोक दो।
हमने कहा चचा, सरकार ने, इस मजमे ने जमाने वालों ने सबने कुछ सोच कर ही सारा मामला
जमाया होगा,,हालात देखे होंगे तभी तो फैसला किया होगा?
कहते तो तुम ठीक हो भतीजे, हमने वहां लोगों को यही समझाया, अरे भाई जो टीवी पर दिख
रहा है, सैंकड़ो किलोमीटर दूर बैठा है, बात की बात में, भावावेश में कुछ ऐसा ही कह बैठे जो
यहां के कानून की सीमा से परे हो तो, अंजाम तो इस मजमे को ही भुगतना पड़ेगा ना। बताओ
तो सही कितनी मेहनत करके वो तीनों ने ये महफिल जमाई है, सालों लगे हैं, कई विवाद आए,
कई गए। पर वो कहते हैं न शो मस्ट गो ऑन की तईं। नमिता बेन, संजोय बाबू और वो
विलियम ने मिलकर एक एक सितारा इस ओढ़नी पर काढ़ा है। हमारी बात से कुछ विलियम भाई
भी मुतमईन थे, कहने लगे हंगामीलाल जी, हमारे लिए तो इस मेले को चलाए रखना महत्वपूर्ण
है, मेला रहेगा तो बात रहेगी, आप चाहे कुछ भी कह दो, भले ही कितना ही गरिया लो पर
एक बात तो मानते हो न कि बच्चों को कुछ किताबों का शौक लगा है, कुछ तो वो साहित्य
की बात कर रहे हैं, कुछ नए लोगों को मंच मिला है, कईयों की किताबें बिकी हैं, कईयों को
मीडिया ने तरजीह दी है, आखिर कुछ तो फायदा हुआ या नहीं।
भतीजे मुझे विलियम की बात में दम लगता है, तुम भी तो जयपुर के वाशिंदे हो तुम को क्या
लगता है.
देखो चचा अपन तो शुरु से ही कहते हैं कि ऐसे मेले ठेले ही गुलाबीनगर की शान हैं, हम तो शुरु
से ही आवो नी पधारो म्हारे देस के संस्कृति के लोग रहे हैं, पावणों को स्वागत करना ही
हमारी परम्परा है। मैं तो कहता हूं जो भी हो विवादों पर मिट्टी डालो और ऐसे आयोजनों के
लिए जुटे रहे हो।
सही कह रहे हो भतीजे, मैं भी तुम्हारी बात से सहमत हूं, मैं तो जरा यूं ही दिन बेकार हो
जाने से उदास हो रहा था, पर तुमसे बात करके सारी उदासी दूर हो गई।

Thursday, January 19, 2012

क्या चुनाव ऐसे होते हैं?

ढ़आज चचा हंगामी लाल बहुत दिन बाद नजर आए थे। पर उनके चेहरे पर वो चमक नहीं थी जो
आम तौर इस ऋतु में होती है।आप यकीन मानिए मैं शीत ऋतु में चाची के हाथ के गोंद के लड्डू
खाने के बाद आने वाली चमक की बात नहीं कर रहा। दरअसल उनकी चमक का मौसम से कोई
ताल्लुक नहीं है पर हां फिजाओं से है। फिजा में जब भी चुनावी रंग नुमाया होता है हमारे चचा
की चमक एकाएक बढ़ जाती है। पर इस बार उनके चेहरे से चमक देख हमें बड़ी चिन्ता हुई। बड़ी
बेकरारी से हमने पूछ ही लिया.. चचा क्या बात है आपके फेवरेट सूबे में सियासी जंग चल रही है
पर आप पर तो असर ही नहीं।
इतना कहते ही जैसे मानो मैंने बर्र के छत्ते को छेड़ दिया हो, चाचा बौराए से बोले,,
बरखुरदार क्यों मजे ले रहे हो,, ये भी कोई चुनाव हैं,, मजाक है मजाक,...। अरे क्या ऐसे ही
चुनाव देखने के लिए इतना इन्तजार कर रहे थे.. बताओ,,, तो जरा,, तुम को भी इस सियासी
जंग का इंतजार था या नहीं,,, । बताओ बताओ,,।
अरे चचा बिल्कुल था, भला होता भी क्यों नहीं, पर ऐसा क्या हो गया जो तुम इतना परेशान हो।
अरे क्या हो गया..? कुछ नहीं हो रहा इसी बात का रोना है। न कोई किसी को कुछ कह
रहा है , न कोई किसी पर तंज कस रहा है। अरे यूं लखनवी तहजीब के साथ भी कभी वहां
चुनाव हुए हैं। वो तो भला हो वो चुनाव आयोग वालों का जो हाथियों पर पर्दा डलवा कर
थोड़ा सा रंग भर दिया वरना तो कुछ भी बाकी नहीं रहता। अब तुम ही बताओ वो राहुल और
उमा तो बुआ भतीजे हो गए। कैसे काम चलेगा,, अरे रिश्तेदारी निभाओगे या चुनाव लड़ोगे। न
माया कुछ बोल रहीं हैं न मुलायम कुछ तेवर दिखा रहे हैं। युवराजों की आपसी लड़ाई भी बहुत
सभ्य हो गई है। सारे इतिहास पे बट्टा लग जाएगा इस बार के चुनाव में। बताओ तो,, और तुम
कहते हो चिन्ता काहे कर रहे हो,,,। तुम ही बोलो क्या वाकई में चुनाव ऐसे होते हैं,, ।
चचा की बात सुन कर हम तो वाकई सोच में पड़े हुए हैं,, कि क्या वाकई चुनाव ऐसे होते हैं,,
आप क्या कहते हैं,,,?

Wednesday, January 11, 2012

हांगकांग के एक संगठन ने भारतीय ब्यूरोक्रेसी को एशिया में अक्षमतम बताया

Sunday, November 27, 2011

शहर, शहरी और सरकार

पिछले करीब दस साल से इस गुलाबी नगर कहलाने वाले शहर में अपना ठिकाना है।
अब तो इस शहर से बेइंतहा प्यार हो गया है। इतिहास और अखबार इसे लगातार
सुनियोजित नगर नियोजन की परम्परा वाला बताते रहे हों पर हमें तो ये
परम्पराएं परकोटे की गुलाबी दीवारों से आगे कहीं नजर नहीं आईं। पर इतना
ही दिल को सूकून देने के लिए बहुत है। आखिर यहां कुछ तो गुलाबी रंग मौजू
है वरना जमाने की गुलाबियत तो कालिख में बदल गई है। दो साल पहले शहर में
बहुत शोर हुआ था। सबने कहा था इतिहास बदलने वाला है। शहर ने अपना रहनुमा
खुद चुना है। पूरे शहर ने मिलकर एक के हाथ में कमान सौंप दी है। लॉटरी से
यह तय हो गया था कि वो कोई महिला ही होगी। वैसे चाहे महिला हो या पुरुष
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बड़ी उम्मीदों से कुछ बदलने के अरमान हर शहरी
ने सजाए थे। हम भी उन्हीं में से थे। लेकिन बदला जरूर और वो भी एक बार
नहीं पांच बार पर वो था शहरी सरकार की नौकरशाही का मुखिया। जिस बादशाह को
वजीरों से काम लेना था वह अपने ही वजीरों से उलझ पड़ा। रही सही कसर बोर्ड
में कांग्रेस और भाजपा के संख्याबल ने पूरी कर दी। मानो पार्षद चुने जाना
उनके लिए कुछ मायने ही नहीं रखता। इससे ज्यादा वे कांग्रेस और भाजपा के
सिपाही हो गए। जिस अमले को शहर का ख्याल करना था वो आपस में ही ऐसा उलझा
का पूरा शहर इस सरकार के सर्कस को दम साधे देखता रहा। शहरवासियों के लिए
इससे बड़ी पीड़ा क्या हो सकती थी कि उनके रखरखाव के इंतजामों की चिता पर
ही यह पूरा खेल हो रहा है। दो साल में शहर के लिए कुछ भी तो ऐसा नहीं हुआ
जिसे लेकर इनकी कुछ प्रशंसा की जाए। कुछ भी तो नहीं है दो साल की
उपलब्धि। एक भी नवाचार नहीं। जरा भी पहल नहीं। शहर सड़ रहा है। सड़कें
टूटी हैं। बाजारों में धक्कमपेल है। गलियों, कॉलोनियों में अतिक्रमण हैं।
परकोटे के मकानों में बने अवैध गोदाम लोगों की जान को जोखिम में डाले हुए
हैं। पार्किंग की कमी से लगते जाम अनमोल समय को कुंभकर्णी भूख के समान पी
रहे हैं। क्या इसी लिए चुना था इन्हें। साधारण सभा की बैठकों में
विधानसभा जैसे नजारे हो गए। क्या क्या नहीं हुआ। धक्का मुक्की में महिला
पार्षद की साड़ी तक फट गई। यह वक्त की खासियत है कि वह किसी का इन्तजार
नहीं करता। दो साल गुजर गए, तीन भी गुजर जाएंगे। यह इस शहर की तासीर है
कि यह अपना अंदाज और बदनुमा नहीं होने देता। आप चाहे इसकी सुध लो या
नहीं। यह अपनी गति से आप ही अपना शोधन करता चलता है। पर हां वो पर्याप्त
है या नहीं यह दूसरी बात है। यदि इस शहरी सरकार के नुमाइंदों ने अब भी
अपने रंग ढंग नहीं सुधारे और शहर की सुध नहीं ली तो और कुछ हो या नहीं हो
एक अभिनव प्रयोग जिससे हम लोकतांत्रिक सुधारों की ओर बढ़ रहे थे, पर जरूर
प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। जो लोग सक्षम होते हुए भी, इस निरंकुशता पर अंकुश
नहीं लगा रहे हैं, यदि वे यह सोचते हों कि उनकी या बड़ी सरकार की इस छोटी
सरकार ऐसे कामकाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है तो इतिहास लिखेगा उनका भी
इतिहास जो तटस्थ रहे........।

Wednesday, November 23, 2011

प्रेस, कॉरपोरेट और काटजू

आम तौर पर लोगों को सुर्खियों में बनाए रखने वाला मीडिया इन दिनों खुद
सुर्खियों में है। वजह है प्रेस काउंसिल के नए मुखिया मार्कण्डेय काटजू
की ओर प्रेस के स्वेच्छाचार पर उठाई अंगुली। काटजू का इशारा खास तौर पर
इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ओर है। प्रेस का दावा है कि वे स्वयं ही
स्वनियंत्रण की ओर बढ़ रहे हैं और उन्होंने आईबीए के बैनर तले इस तरह की
कवायद शुरू भी कर दी है। वे इसका उदाहरण भी देते हैं। लेकिन यह बहस नई
नहीं है और बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही है। सबको अपने कर्तव्य का भान
करवाने वाला स्वयं क्यों निरंकुश हो जाए। जब हर कोई किसी न किसी नियामक
के अधीन है तो फिर प्रेस को भी नियामक के अधीन क्यों नहीं होना चाहिए।
खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। हम जब तब देखते रहते हैं तमाम तरह की
स्टोरियां महज सनसनी बनाने के लिए तरह तरह के साउण्ड और विजुअल इफेक्ट के
साथ पेश की जाती हैं। मीडिया में से इन्फोर्मेशन गायब हो गई है और
एंटरटेनमेंट बढ़ गया है। ऐसे में काटजू की शिकायत समीचीन पड़ती है क्यों
नहीं सबकी खबर रखने वाला मीडिया भी अपने किए कहे पर जवाबदेह रहे।

Tuesday, August 16, 2011

लोकतंत्र, भ्रष्टाचार का संरक्षक या उन्मूलक

पैंसठवा पड़ाव किसी भी जीवन में एक अहम पड़ाव होता है,सामान्यतौर पर यह जीवन पर पुनःदृष्टिपात कर जीवन में अर्जित अनुभव से समाज को लाभान्वित करने के क्रम में एक मील का पत्थर माना जाता है। स्वाधीन भारत ने भी कल इस पड़ाव में कदम रखा है,लेकिन जीवन की धारणाओं के विपरीत लोकतंत्र के जीवन में यह पड़ाव परिपक्वता की दृष्टि से अहम बनता जा रहा है। अन्ना हजारे जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। उनके प्रखर आंदोलन के तेज तले खुद को अंधकार में पा रही देश की सरकार को उन्हें संतुष्ट करने का उपाय नजर नहीं आ रहा है,नतीजतन एक बार फिर वह कांग्रेस की परिपाटियों के अनुसार दमन की नीति पर चल पड़ी है और उसने अन्ना व उसके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया है। जब भारत की राष्ट्रपति भ्रष्टाचार को कैंसर बता चुकी हों और प्रधानमंत्री स्वंय लाल किल्रे की प्राचीर से यह स्वीकार चुके हों कि सरकारी योजनाओं का पैसा बाबुओं अधिकारियों की जेब में जा रहा है,सरकारी ठेके गलत लोगों को गलत तरीके से दिए जा रहे हैं तो ऐसे में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने का उपाय लेकर जो भी जनता के सामने आएगा उसे जननेतृत्वकारी बनने से कोई नहीं रोक सकता। फिर चाहे वो अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव हों। इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना की गिरफ्तारी देश में बड़ी उथल पुथल मचाएगी। सवाल उठता है इस उथलपुथल को न्यौतने जरूरत क्यों कर पड़ गई। जहां हम यह दावा करते हैं कि हमारी संसद जनमत की अभिव्यक्ति है और वहां पारित होने वाले कानून जनता की सार्वभौमिक स्वीकृति से पारित होते हैं तो फिर जो काम हमारे सांसदों को करना चाहिए वह करने की जरुरत किसी और को क्यों। क्यों हमारे संसद अपने उद्देश्यों में ही विफल हो रही है। मैं यहां अन्ना के जनलोकपाल के पक्ष या विपक्ष में अपनी बात नहीं रख रहा हूं, मैं जरा तंत्र की स्थिति पर बात कर रहा हूं, अन्ना अकेले नहीं हैं जो संसद पर एक बिल को हू बहू पारित करने का दबाव बना रहे हैं, अन्ना के अलावा एक और समूह भी है जिसे लगता है कि वो भी देश को कानूनों का मसौदा दे सकता है, और वह समूह है एनएसी के प्रगतिशील विचारक।जो मनमाने तरीके मनमानी व्याख्याओं के साथ नए मसविदे प्रस्तुत कर रहे हैं। जहां एक ओर अन्ना के साथ जनबल की ताकत है, वहीं दूसरी ओर एनएसी के साथ सत्ता बल की ताकत है। पर सवाल यह है कि अन्ना और एनएसी को यह आवश्यकता क्यों पड़ रही है है जो काम सांसदों का है जिसे सदन के अन्दर होना चाहिए वह सदन के बाहर करें।
असल में हमारी व्यवस्था में सबसे बड़ी खामी है सांसद का अपनी पार्टीलाइन में बंधे रहने की अनिवार्यता, इसी वजह से अपने क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद निर्वाचित सांसद को सदन में वही कहना और करना होता है जो उसकी पार्टी के चंद हुक्मरान तय करते हैं, और सीधे तौर पर इसमें कहीं भी जनमत नहीं होता बल्कि यह तो चंदमत होता है, पर व्यवस्था ऐसी है कि हम इसी चंदमत को जनमत मानने पर विवश हैं। इसी वजह से अन्ना के प्रस्ताव के समर्थन में इतनी जनअभिव्यक्ति होने के बावजूद जनलोकपाल संसद का मुंह देख पाने से वंचित है जबकि वहीं दूसरी और चंदमत के आशीर्वाद के चलते एनएसी की ओर से प्रस्तावित लक्षित हिंसा के नाम पर बनाए जाने वाले मसौदे को सरकार कानूनी जामा पहनाने की पूरी तैयारी में है।
कांग्रेस अन्ना को चुनौती देती है कि वे कहीं से चुनाव लड़कर आएं। हमारी व्यवस्था में यदि अन्ना चुनकर आ भी गए तो क्या कर लेंगे।संसद में एक निर्दलीय सांसद की क्या हैसियत होती है,,,। यदि कोई व्यक्तिगत बिल ले भी आया गया तो पार्टी व्हिप जारी कर उस बिल के परखच्चे उड़ा दिए जाएंगे। क्या कांग्रेस यही चुनौती एनएसी के उन विचारकों को भी दे सकती है जो कि कांग्रेस के शब्दों में कानून बनाने का शौक रखते हैं,,,।
बहरहाल अन्ना गिरफ्तार हो चुके हैं, जनमानस अवाक है,, देखें वक्त किस करवट लेता है.....पर एक बात तय है कि यह मुद्दा तय कर देगा कि लोकतंत्र,भ्रष्टाचार का संरक्षक है या उन्मूलक



Monday, July 18, 2011

कुछ बातें

वो कहते हैं उनकी अदाओं के दीवाने हजार हैं,
पर उन हजारों में हम सा तो कोई दूसरा कहां हैं,
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डर लगता है तिरी जुल्फों में खो न जाऊं
पर वो घनी छांव फिर कहां से पाऊं
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बरसों बाद मिलना और मिलकर भी नजरअंदाज करना
तेरी इस फितरत से तो मुश्किल है अब इश्क का जिंदा रहना
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तमाम कोशिशों के बाद मैं उसको मना न पाया
कुछ खोट है इन चाहतों में जो हो रहा है इश्क का नाम जाया
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जिन्दगी की राहों में हर एक को मंजिल की तलाश है
इसी भागमभाग में हर एक कि जिन्दगी उदास है
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जब भी छाती हैं यें घटाएं, बदलियों सी बरसती हैं तेरी यादें,
जिन्दगी की घटाटोप के बीच बिजलियों सी चमकती हैं तेरी बातें
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जब भी जिक्र होता है मन की गहराईयों में तेरा
आईने में अक्स नजर आ जाता है आज मेरा
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अब हम जमाने को क्या कहें क्यू आती है तिरी याद
बुझा न सके हम राख के अंगार को लाख कोशिश के बाद