Tuesday, August 16, 2011

लोकतंत्र, भ्रष्टाचार का संरक्षक या उन्मूलक

पैंसठवा पड़ाव किसी भी जीवन में एक अहम पड़ाव होता है,सामान्यतौर पर यह जीवन पर पुनःदृष्टिपात कर जीवन में अर्जित अनुभव से समाज को लाभान्वित करने के क्रम में एक मील का पत्थर माना जाता है। स्वाधीन भारत ने भी कल इस पड़ाव में कदम रखा है,लेकिन जीवन की धारणाओं के विपरीत लोकतंत्र के जीवन में यह पड़ाव परिपक्वता की दृष्टि से अहम बनता जा रहा है। अन्ना हजारे जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। उनके प्रखर आंदोलन के तेज तले खुद को अंधकार में पा रही देश की सरकार को उन्हें संतुष्ट करने का उपाय नजर नहीं आ रहा है,नतीजतन एक बार फिर वह कांग्रेस की परिपाटियों के अनुसार दमन की नीति पर चल पड़ी है और उसने अन्ना व उसके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया है। जब भारत की राष्ट्रपति भ्रष्टाचार को कैंसर बता चुकी हों और प्रधानमंत्री स्वंय लाल किल्रे की प्राचीर से यह स्वीकार चुके हों कि सरकारी योजनाओं का पैसा बाबुओं अधिकारियों की जेब में जा रहा है,सरकारी ठेके गलत लोगों को गलत तरीके से दिए जा रहे हैं तो ऐसे में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने का उपाय लेकर जो भी जनता के सामने आएगा उसे जननेतृत्वकारी बनने से कोई नहीं रोक सकता। फिर चाहे वो अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव हों। इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना की गिरफ्तारी देश में बड़ी उथल पुथल मचाएगी। सवाल उठता है इस उथलपुथल को न्यौतने जरूरत क्यों कर पड़ गई। जहां हम यह दावा करते हैं कि हमारी संसद जनमत की अभिव्यक्ति है और वहां पारित होने वाले कानून जनता की सार्वभौमिक स्वीकृति से पारित होते हैं तो फिर जो काम हमारे सांसदों को करना चाहिए वह करने की जरुरत किसी और को क्यों। क्यों हमारे संसद अपने उद्देश्यों में ही विफल हो रही है। मैं यहां अन्ना के जनलोकपाल के पक्ष या विपक्ष में अपनी बात नहीं रख रहा हूं, मैं जरा तंत्र की स्थिति पर बात कर रहा हूं, अन्ना अकेले नहीं हैं जो संसद पर एक बिल को हू बहू पारित करने का दबाव बना रहे हैं, अन्ना के अलावा एक और समूह भी है जिसे लगता है कि वो भी देश को कानूनों का मसौदा दे सकता है, और वह समूह है एनएसी के प्रगतिशील विचारक।जो मनमाने तरीके मनमानी व्याख्याओं के साथ नए मसविदे प्रस्तुत कर रहे हैं। जहां एक ओर अन्ना के साथ जनबल की ताकत है, वहीं दूसरी ओर एनएसी के साथ सत्ता बल की ताकत है। पर सवाल यह है कि अन्ना और एनएसी को यह आवश्यकता क्यों पड़ रही है है जो काम सांसदों का है जिसे सदन के अन्दर होना चाहिए वह सदन के बाहर करें।
असल में हमारी व्यवस्था में सबसे बड़ी खामी है सांसद का अपनी पार्टीलाइन में बंधे रहने की अनिवार्यता, इसी वजह से अपने क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद निर्वाचित सांसद को सदन में वही कहना और करना होता है जो उसकी पार्टी के चंद हुक्मरान तय करते हैं, और सीधे तौर पर इसमें कहीं भी जनमत नहीं होता बल्कि यह तो चंदमत होता है, पर व्यवस्था ऐसी है कि हम इसी चंदमत को जनमत मानने पर विवश हैं। इसी वजह से अन्ना के प्रस्ताव के समर्थन में इतनी जनअभिव्यक्ति होने के बावजूद जनलोकपाल संसद का मुंह देख पाने से वंचित है जबकि वहीं दूसरी और चंदमत के आशीर्वाद के चलते एनएसी की ओर से प्रस्तावित लक्षित हिंसा के नाम पर बनाए जाने वाले मसौदे को सरकार कानूनी जामा पहनाने की पूरी तैयारी में है।
कांग्रेस अन्ना को चुनौती देती है कि वे कहीं से चुनाव लड़कर आएं। हमारी व्यवस्था में यदि अन्ना चुनकर आ भी गए तो क्या कर लेंगे।संसद में एक निर्दलीय सांसद की क्या हैसियत होती है,,,। यदि कोई व्यक्तिगत बिल ले भी आया गया तो पार्टी व्हिप जारी कर उस बिल के परखच्चे उड़ा दिए जाएंगे। क्या कांग्रेस यही चुनौती एनएसी के उन विचारकों को भी दे सकती है जो कि कांग्रेस के शब्दों में कानून बनाने का शौक रखते हैं,,,।
बहरहाल अन्ना गिरफ्तार हो चुके हैं, जनमानस अवाक है,, देखें वक्त किस करवट लेता है.....पर एक बात तय है कि यह मुद्दा तय कर देगा कि लोकतंत्र,भ्रष्टाचार का संरक्षक है या उन्मूलक



Monday, July 18, 2011

कुछ बातें

वो कहते हैं उनकी अदाओं के दीवाने हजार हैं,
पर उन हजारों में हम सा तो कोई दूसरा कहां हैं,
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डर लगता है तिरी जुल्फों में खो न जाऊं
पर वो घनी छांव फिर कहां से पाऊं
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बरसों बाद मिलना और मिलकर भी नजरअंदाज करना
तेरी इस फितरत से तो मुश्किल है अब इश्क का जिंदा रहना
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तमाम कोशिशों के बाद मैं उसको मना न पाया
कुछ खोट है इन चाहतों में जो हो रहा है इश्क का नाम जाया
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जिन्दगी की राहों में हर एक को मंजिल की तलाश है
इसी भागमभाग में हर एक कि जिन्दगी उदास है
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जब भी छाती हैं यें घटाएं, बदलियों सी बरसती हैं तेरी यादें,
जिन्दगी की घटाटोप के बीच बिजलियों सी चमकती हैं तेरी बातें
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जब भी जिक्र होता है मन की गहराईयों में तेरा
आईने में अक्स नजर आ जाता है आज मेरा
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अब हम जमाने को क्या कहें क्यू आती है तिरी याद
बुझा न सके हम राख के अंगार को लाख कोशिश के बाद

Wednesday, April 6, 2011

गांधी फिर सत्याग्रह पर हैं,,,

अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। उस भ्रष्टाचार के खिलाफ जो हमारी रगों में बहते खून के विभिन्न अवयवो में समाहित हो गया है। जीवन में भ्रष्ट कोशिकाओं की मात्रा जानने के लिए किसी लेबोरेट्री टेस्ट की जरूरत नहीं है। जहां भी हाथ रख दो वही नब्ज भ्रष्टाचार के पेट्रोल से दौड़ती महसूस होगी। कोशिश करके देखें। तंत्र की इस प्राणवायु के बिना तंत्र निष्प्राण हो जाता है। कोमा में चला जाता है। कैसा भी काम हो भ्रष्टाचार अपने चरम रूप में नजर आएगा। ऐसे में अन्ना हजारे एक मुहीम ले कर निकले हैं। उनका और उनके सहयोगियों का मत है कि लोकपाल विधेयक का उनका प्रारूप भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकता है। उनकी यह धारणा कितनी सही है या समय के साथ सही साबित होगी इस पर बात किए बिना सबसे पहले अन्ना के आंदोलन को समर्थन। आखिर गांधी के देश में एक बार फिर गांधी सड़क पर हैं और इस बार मुकाबला परायों से नहीं अपनों से है। और एक सत्य यह भी है कि यह लड़ाई फैसला करेगी कि लोकतंत्र के इस भीड़तंत्र में क्या वाकई नैतिकता सम्मान के साथ जी सकेगी या बलशालियों की रंगशाला में दरबान बनना ही नैतिकता की किस्मत है। और क्या मांग है अन्ना की। वे किसी भी अमीर उद्योगपति के गैराज में फालतू खड़ी कार तो नहीं मांग रहे ताकि जिंदगी भर बस तक में नहीं बैठ सकने वाला गरीब उस कार के पेट्रोल भर से यात्रा कर सके। या उसके वार्डरोब में जीवन में बस एक बार पहना गया कपड़ा भी नहीं मांग रहे। वे यह भी नहीं कह रहे कि धनपतियों क्यों जरूरत से ज्यादा धन अपनी तिजोरियों में भर कर गरीबों की आंतों को सूखा रहे हो, क्यों उन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होने दे रहे। नहीं वे किसी से भी कुछ नहीं मांग रहे, वे इतना ही तो कह रहे हैं कि भाई गड़बड़ी की जांच कर सके ऐसा तंत्र बना दो। इसमें भी उन्हें एतराज क्यों है। क्यों डरती है सरकार गड़बड़ी की जांच के पारदर्शी तंत्र से। आखिर ये मांग ऐसी तो नहीं तो जिसे पूरा नहीं किया जा सके। या फिर ये इसलिए पूरी नहीं हो सकती क्योंकि इसमें कोई जाति वर्ग का वोट नहीं जुड़ा। इसका समर्थन करने वाले पटरियों पर डेरा नहीं जमा सकते। वो दिल्ली की आपूर्ति ठप नहीं कर सकते। वो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को डसने वाले भ्रष्ट तंत्र पर नकेल कसने के लिए उनकी ही जिंदगी के चक्के को थाम नहीं सकते। तो सरकार और नौकरशाहों को गलतफहमी है कहीं। अन्ना ने सोए हिन्दुस्तान की कुंभकर्णी नींद को तोड़ने का काम कर दिया है। जितना इसे टाला जाएगा उतना लावा जनता के सीने में जमा होता जाएगा। सरकार जागे न जागे हिन्दुस्तान जागने लगा है। देश की कमान थामने वालो को चिंता करनी चाहिए कि कहीं यह लावा जनता के सीने से निकल कर न बहने लगे। अन्ना के रूप में गांधी ने इस देश को फिर से अपना सहारा दिया है।,,,गांधी फिर सत्याग्रह पर हैं,,, देश को फिर आजाद करवाने के लिए जुट जाएं।

Friday, February 25, 2011

सवाल हां और ना के बीच पिसती जनता का

मेरे एक सीनियर अक्सर कहा करते थे, चुनाव के बाद बस बैंचे बदल जाती हैं हालात नहीं। राजस्थान विधानसभा के मंगलवार से प्रारम्भ बजट सत्र की कार्रवाई को देखने के बाद वाकई यही लगता है कि हालात बदलने इतने आसान भी नहीं। विधानसभा में उठने वाला हर मुद्दा अपनी अहमियत के बजाय पक्ष विपक्ष की रस्साकसी में उलझ कर रह जाता नजर आता है। विधानसभा के इस सत्र की शुरुआत में राज्यपाल के लम्बे अभिभाषण में जहां आंकड़ों की माया पसरी थी वहीं सुनने वालों को कुछ भी नएपन का अहसास नहीं हो रहा था, कई बार ऐसा भी लगा कि क्या इतनी छोटी-छोटी उपलब्धियां भी अभिभाषण में होनी चाहिए। पर शायद सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह अपनी उपलब्धियों को इसी बहाने विधानसभा की कार्रवाई का अंग बनाए और उनका बखान करे। पर इसके बाद जब इस पर करीब पन्द्रह घण्टे की बहस होती है और करीब चालीस से अधिक वक्ता अपने तर्क पेश करते हैं तो वह राजस्थान के विकास या सरकार के कामकाज के विश्लेषण से भटक कर कांग्रेस और भाजपा के आपसी विरोध पर आ टिकती है। हर महारथी यह साबित करने में जुटा नजर आता है कि उसके व्यंग्य बाण सबसे पैने हैं। यहां तक कि सामान्य प्रश्नकाल के दौरान भी मंत्री अपने किए को सही साबित करने की बजाय पिछली सरकारों के कामकाज पर बेजा टिप्पणियां करने में जुटे रहते हैं। पहली बार आए एक विधायक ने तो बहस के दौरान यह कहा भी कि हम हां पक्ष में हैं तो हमें हां और आप ना पक्ष में हो तो आपको ना कहना ही है। क्या वाकई इसी तरह की बहस के लिए यह व्यवस्था की गई थी। पूरी बहस में एक दो वक्ताओं को छोड़कर किसी ने भी अभिभाषण को लेकर बात नहीं कि। भाजपा विधायकों का खास शगल मंत्रीमंडल के बयान रहे तो कांग्रेसी विधायकों ने पिछली भाजपा सरकार की खिंचाई करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। इस बीच जो दो तीन काम के मुद्दे उठे वे बेजा टिप्पणियों और बेकार की बहसबाजी में उलझ कर रह गए। कांग्रेस की ओर से तो खैर कोई ऐसा नाम याद नहीं आता जिसने सरकार के कामकाज की ओवरआल प्रशंसा करने के अलावा कोई खास काम की बात कही हो।हां, रमेश खंडेलवाल ने जरूर विधवाओं की पेंशन की शर्तों को हटाने की मांग की। भाजपा में राव राजेन्द्र सिंह ने आंकड़ों के हवाले से अभिभाषण की कमियां उजागर की तो रोहिताश कुमार ने परिवहन नीति बनाने की मांग की। वाकई उनकी बात में दम था कि क्या रोडवेज की साढे चार हजार बसें पूरे प्रदेश के लिए पर्याप्त हैं और क्यों सरकार रोडवेज को प्रोफिट मेकिंग कारपोरेशन मानता है। जब गांव सड़क से जुड़ गए हैं तो उन पर बस क्यों नहीं चलनी चाहिए। मेरे सीनियर्स का कहना था कि अच्छा है इस बार विधानसभा में कार्यवाही हंगामे की भेंट नहीं चढ़ी कम से कम बहस तो हो रही है,, चलो यदि वे इसे अच्छा कह रहे हैं तो वाकई बुरा इससे और भी बहुत बुरा होता होगा।

Saturday, February 12, 2011

राहुल को वोट का पैमाना,,,,

फेसबुक पर एक साथी ने नवभारत टाइम्स में काम करने वाले शिवेन्द्र कुमार सुमन के ब्लॉग का लिंक पोस्ट किया। शीर्षक था लोग राहुल को वोट क्यों देते हैं। शीर्षक ने सहज उत्सुकता जगाई और जो पाया वो शिवेंद्र के ब्लॉग से साभार कट पेस्ट कर आपको भी पढ़वा रहा हूं। ,,,..


बात 2009 में हुए आम चुनाव की है। दिल्ली में वोटिंग हो गई थी। वोटिंग के दो-तीन बाद मैं ऑफिस कैंटीन में खाना खा रहा था। मेरी बगल में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक महिला पत्रकार खाना खाने आई।

चुनाव का सीज़न था तो उसी की चर्चा चल पड़ी। उसने मुझसे पूछा, ‘आपने वोट दिया?’ मैंने सर हिलाते हुए कहा, ‘नहीं।’ वह चौंकी। थोड़ी तेज़ आवाज़ में पूछा, ‘क्यों?’ मेरा उत्तर था कि मेरे पास वोटर कार्ड नहीं है। उसने मुझे हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए कहा, ‘गज़ब हैं आप! एक जर्नलिस्ट होकर वोटर कार्ड नहीं बनवा सकते?’ मैंने कहा, ‘2 बार कोशिश की थी, पर बन नहीं पाया। वे जो डॉक्युमेंट्स मांगते हैं, वे मेरे पास हैं ही नहीं।’ फिर वह चुपचाप खाना खाने लगी। मुझे लगा, मुझे भी उनसे कुछ बात करनी चाहिए।

मैंने पूछा, ‘आपने वोट दिया?’ उसने चहकते हुए कहा, ‘हां’ और फिर स्याही लगी हई अपनी उंगली दिखाते हुए बोली, ‘यह देखिए।’ मैंने कहा, ‘गुड।’ वह ऐसे मुस्कुराईं जैसे उसने बहुत बड़ा मैदान मार लिया हो और कोई डरपोक व्यक्ति उनके सामने खड़ा हो जो मैदान में उतरा ही न हो। इससे आगे मुझे और नहीं पूछना चाहिए था, लेकिन मन माना नहीं और मैंने फिर एक निजी सवाल दाग दिया। ‘किसको वोट दिया आपने?’ चहकते हुए बोली, ‘मैं नहीं बताऊंगी।’ फिर कुछ देर बाद खुद बोली, ‘कांग्रेस को।’ मैंने फिर सवाल दागा, ‘क्यों?’ उसका जवाब था, ‘कांग्रेस में राहुल गांधी जो हैं, इसलिए।’

मैंने पूछा, ‘आपको राहुल गांधी अच्छे लगते हैं?’ उसने कहां, ‘बेशक।’ मैंने पूछा,
‘राहुल गांधी की कौन सी बात आपको अच्छी लगती है?’ उसने कहा, ‘राहुल का डिंपल! वह जब मुस्कुराता है तो उसका डिंपल बहुत अच्छा लगता है, मैं उसी की कायल हूं। बाकी नेता (उसने कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं के नाम लिए) तो जानवरों की तरह लगते हैं, पता नहीं क्यों लोग उन्हें वोट देते हैं!
’ मैं चुप हो गया। जैसे एक झटके में मुझे परमज्ञान मिल गया। मेरे ज्ञान चक्षु खुल गए।

विस्तृत पढ़ने के लिए निम्न पते पर शिवेंद्र कुमार सुमन के ब्लॉग पर जा सकते हैं।

http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/bejhijhak/entry/%E0%A4%AE-%E0%A4%AC-%E0%A4%B0%E0%A4%95-%E0%A4%95-%E0%A4%A4

Friday, February 11, 2011

बासी कढ़ी में वफादारी की सीख का जलजला

राजस्थान की राजनीति की बासी कढ़ी मे इन दिनों उबाल आया हुआ है। प्रदेश के दोनों ही दलों में उठापटक का दौर चल रहा है लेकिन इस दौर के बीच एक जलजला अचानक आया और प्रदेश के एक राज्यमंत्री को जाने अनजाने में की गई एक टिप्पणी के लिए अपने पद की बलि देनी पड़ी। राज्य के सीमान्त इलाके से आए इस राजनेता को तो यह भी पता नहीं चला कि एक अच्छी और भली बात कहने के चक्कर में वे ऐसा क्या कह गए जिसने उनक सिर से लाल बत्ती का साया छीन लिया। बिचारे पार्टी में अपने काम के बदले हक के रूप में राजनीतिक नियुक्तियों का प्रसाद मांग रहे कार्यकर्ताओं को धीरज रखने और कर्म किए जा फल तो आलाकमान देगा की सीख दे रहे थे। इस्तीफे के बाद भी वे पत्रकारों से मासूमियत भरा सवाल करते रहे,, कि मैं कहां और क्या गलत कह दिया। मैं तो लोगों को पार्टी और सोनिया गांधी के प्रति वफादार रहने की सीख ही दे रहा था। मैं भी इसी वफादारी के बूते बकरियां चराते चराते मंत्री बना हूं और यही मैंने कहा था। अब ये तो कांग्रेस और उनकी पार्टी जाने की उनका एक मंत्री किस बात को और क्यों वफादारी मान रहा है। खैर इस इस्तीफे ने पार्टी के अन्य बड़बोले मंत्रियों में आशंकाओं के बादल गहरा दिए हैं। अब तो सरकार के होशिया मंत्री भी मीडिया से ऑफ द रिकार्ड ब्रीफिंग में जबरदस्त टिप्पणियां करने के बाद धीरे से पूछ लेते हैं,, कहीं कैमरे ऑन तो नहीं है,, पता चला शाम तक इस्तीफा देना पड़ जाएगा। ...बहरहाल मंत्रीमंडल में फेरबदल की हवाएं फिर तेज हो गई हैं पर विधानसभा सत्र और बजट की गहमागहमी के चलते यह अभी दूर की कौड़ी लगता है।
उधर भाजपा एक बार फिर बिना विधायक दल के नेता की सदारत में विधानसभा में उतरेगी जिससे जाहिर है विपक्ष की धार कुंद ही रहेगी। लेकिन डेढ़ साल के लम्बे अंतराल में एक सर्वमान्य नेता तक नहीं चुन पाना भाजपा के एक लोकतांत्रिक संगठन होने और पार्टी विद ए डिफरेंस के नारे को खोखला ही करता है। अब देखना होगा कि क्या वाकई भाजपा अपने अन्तरविरोधों से निपट कर एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभा पाती है या नहीं ।

Monday, November 22, 2010

कुंबले केएससीए के नए अध्यक्ष, श्रीनाथ सचिव

कुंबले केएससीए के नए अध्यक्ष, श्रीनाथ सचिव
आज खबर आई है क्रिकेट के कर्नाटक संघ के अध्यक्ष बने हैं क्रिकेट खिलाडी़ और कम्प्यूटर इंजिनीयर अनिल कुम्बले उनका सहयोग देंगे जवागल श्रीनाथ सचिव के रूप में। तो इसे अब क्रिकेट में एक नए युग की शुरुआत कहा जाना चाहिए। बैडमिंडन में प्रकाश पादुकोण कभी ऐसा प्रयास कर चुके थे। क्रिकेट संघ को राजनेताओं की सैरगाह और पॉवर स्टेटस का सिंबल माना जाता रहा है। जिन राजनेताओँ ने कभी बैट नहीं पकड़ा, बॉल नहीं थामी, जिन्हें यह तक नहीं पता कि बॉल को यदि तराजु में रखा जाएगा तो उसके बदले कितने ग्राम दाल आएगी। पर वे ही इस खेल के भाग्यविधाता बने हुए हैं। उम्मीदों की किरणे लगातार चमकती हैं और बादलों के बीच गाहे बगाहे अपने होने का अहसास करवा जाती है। कुछ ऐसी उम्मीद की यह किरण भी है। शायद इस कर्नाटक किसी बड़े बदलाव का अगुआ बने। वरना राजनेताओं का तो भगवान ही मालिक है और उनके चलाए चलने वाले क्रिकेट संघों से कोई उम्मीद करना बेमानी होगा।

Tuesday, November 2, 2010

ग्ररीबी और कांग्रेस , एक महागाथा

कांग्रेस के युवराज और देश की राजनीतिक गणित को ध्यान मे रखें तो कभी देश के प्रधानमंत्री बनने की संभावना रखने वाले राहुल गांधी ने लम्बे इन्तजार के बाद आखिरकार मुख्यधारा की राजनीति की शुरुआत कर दी है। राहुल का मंत्र और मंतव्य बिल्कुल साप है, वो अपनी दादी, इंदिरागांधी के नक्शेकदम पर राजनीति की बिसात बिछा रहे हैं। इंदिरा गांधी ने नारा दिया, गरीबी हटाओ, राहुल का नारा है गरीब के लिए काम करो। एक आत्मविश्वासी वक्ता के रूप में राहुल ने स्पष्ट संदेश दिया कि गरीब ही कांग्रेस का आधार है। राहुल ने उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में पार्टी के खत्म होने का जिक्र करते हुए कहा कि यहां कांग्रेस पार्टी मरी नहीं है। लेकिन उनका यह स्पष्टीकरण भी सकेत देता है कि कहीं न कहीं कोई तीर है जो दिल में गहरे धंसा हुआ है। राहुल का निशाना साफ है उत्तर भारत औऱ दक्षिण भारत के दो सबसे बड़े राज्य। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इन दोनों राज्यों में देश पर राज करने की कुंजी छीपी है। और दोनों ही जगहों पर कांग्रेस का हाल बेहाल है। पार्टी को फिर से जगाने के लिए राहुल का फार्मुला कहता है कि गरीब की सुनो। क्या राहुल के इस नारे में इंदिरा इज इंडिया की तर्ज पर जब तक गरीब है तब तक कांग्रेस है का भाव छुपा है। सवाल जितना सहज दिख रहा है उतना है नहीं। आखिर राहुल जिन गरीबों के विकास की बात कर रह हैं, वो आजादी के छह दशक बाद भी इतने गरीब क्यों हैं । देश का नब्बे प्रतिशत पैसा महज दस प्रतिशत लोगों के पास ही क्यों हैं। क्या वाकई कांग्रेस गरीबों के लिए काम कर रही है या गरीबी हटाओ के नारे की तरह गरीब का विकास भी एक नारा भर है। कांग्रेस अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती, आखिर पचास साल से अधिक तो कांग्रेस ने ही देश पर राज किया है। सामाजिक विकास के नाम पर नरेगा जैसी कामचलाऊ नीतियां जिनसे देश का छद्म आर्थिक विकास हो रहा है, हमें कहां ले जाएंगी इस पर कोई विचार क्यों नहीं कर रहा। नरेगा ने देश में अकुशल मजदूरों की फौज खड़ी करने में मदद की है। यहां तक कि संगठित क्षेत्र में काम कर रहे मजदूर भी अब नरेगा का रुख कर रहे हैं। नरेगा का अनुदान न तो गांव का विकास कर रहा है और नही इससे किसी को कोई योग्यता हासिल हो रही है। नरेगा की आदत पड़ जाने के बाद जब नरेगा की समीक्षा की जाएगी तब क्या होगा। कहीं यह भी आरक्षण की तरह एक औऱ स्थायी गलफांस न बन जाए। वोट वैंक के चक्कर में हर सरकार के लिए इसे ढोना एक मजबूरी बन जाएगा। अभी नरेगा ने कृत्रिम समृद्धि का बाजार लहलहा दिया है। आर्थिक विकास की दर लगातार बढ़ रही है इसमें भी कहीं न कहीं नरेगा की भूमिका है। लेकिन जब यह बुलबुला फूटेगा तब क्या होगा। इसका सीधा जवाब है, कुछ नहीं होगा बस गांव में गरीब बना रहेगा। मुद्दा बना रहेगा। वोटर बचा रहेगा। क्योंकिं यह समृद्धि अस्थायी है। शायद उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के गरीब यह सत्य जान गए थे। इसलिए वहां के नतीजे बदले नजर आए लेकिन यह दुर्भाग्य है कि जिन हाथों में भाग्य सौंपा गया उनमें भी वो चाहत नहीं थी कि वे सूरत औऱ सीरत बदलें।

आग और एसीबी

जब एक मंत्री के निर्देशित काम ही नहीं हो रहे हों तो उस विभाग के काम काज से आम आदमी को क्या उम्मीद करनी चाहिए। राजस्थान के नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल के अनुसार प्रदेश की राजधानी जयपुर के विकास के लिए बना जयपुर विकास प्राधिकरण उनके लिखे पत्रों का ही जवाब नहीं देता। अब इसे क्या कहा जाए जेडीए अधिकारियों की ढिठता या फिर उनकी नकेल कसने में अधिकारियों की ढिलाई। पता नहीं लेकिन यदि वास्तव में ऐसा है तो यह चिंताजनक है, कि कोई विभाग अपने ही मंत्री के पत्रों का जवाब नहीं दे रहा हो, उस मंत्री को खुलेआम कहना पड़ रहा हो कि वे अपने कर्मचारियों अधिकारियों की शिकायत एसीबी में भेज देंगे। इससे तो लगता है कि विभागीय जांच, कार्रवाई के तंत्र को लकवा मार गया है। कुछ तो बात है वरना बिना आग के धुंआ नहीं उठता। अब राख के ढेर में लोग जुटे हैं उस चिंगारी की तलाश में जिसने यह आग लगाई।

Saturday, October 30, 2010

आखिर कौन है जिम्मेदार

प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सरकारें किस तरहकाम करती है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है पृथ्वीराज नगर परियोजना। 22 साल पहले राज्य सरकार ने कल्पना की थी जयपुर में पृथ्वीराज नगर के रूप में एक सुव्यवस्थित कॉलोनी बसाने की। लेकिन आज वो सुव्यवस्थित सपना किस कदर बदरंग हो चुका यह सबके सामने है। कानूनी दांवपेचों, सरकारी नीतियों के चक्र में फंसा रहा तो बस वह आम आदमी जिसने जीवन भर की कमाई जोड़ कर जयपुर में बसने की चाहत में विवाद फंसी सस्ती जमीन खरीद ली। इस विवाद का फायदा यदि किसी को हुआ तो वह सिर्फ भूमाफिया कहलाने वाले प्रॉपर्टी डीलर्स को हुआ। सालों साल पाबंदी के बावजूद जमीन बिकती रही, लोग बसते रहे। विवादित जमीन के पतों पर रह रहे लोगों के नाम मतदाता सूची में जुड़ते रहे। सरकारें आईं और चली गईं। अफसर आए और चले गए। बची रहीं तो बस अखबारी सुर्खियां और विवादित जमीन पर रहने वाले लोग। पाबंदी के नाम पर उन्हें पानी के कनेक्शन नहीं दिए तो निजी पानी माफिया पनप गए, घरों में बोरवेल खुद गए। धरती के सीने में हजारों छेद हो गए। सरकार ने कहा सड़क नहीं बनेगी। तो लोगों ने कहा बिना सड़क जी लेगें औऱ अपने इंतजाम कर लिए। बीच बीच में अपनी उपस्थिति का अहसास करवाने के लिए प्रशासन के लोग बड़ी बड़ी दैत्याकार मशीनों पर सवार हो कर आ पहुंचते। लोगों ने भी इन दानवों से निपटने का मंत्र जान लिया था, और वह था संघे शक्ति कलयुगै। घंटों की टंकार ने सद्भाव का नया सूत्रपात किया था। सवाल उठता है कि जब पाबंदी थी तो सालों साल वहां कैसे मकान बने, कैसे लोग रहने पहुंचे, क्या इस दौरान प्रशासन नाम की कोई चीज वजूद में नहीं थी। अफसरों, कारिन्दों की इतनी बड़ी फौज क्या कर रही थी। क्या इसमें कोई राजनीति नहीं थी। खुद अदालत ने कहा है कि सरकार के निर्णय भूमाफियाओं को फायदा पहुंचाने वाले रहे। अब इसके क्या मायने निकाले जाएं। तब भी यही सरकार थी और आज भी यही सरकार है।
यह प्रकरण दर्षाता है कि सरकार किस प्रकार कामचलाऊ अंदाज में समय गुजारने के लिए काम कर रही है। रोजाना नित नई योजनाओं की घोषणा करने वाले मंत्रियों को पुरानी योजनाओं की सुध लेनी की फुर्सत तक नहीं है। कोई योजना कोर्ट में पहुंची नहीं कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है। लेकिन क्या सरकारी परियोजनाओं के अपने योजनानुसार उद्देश्य पूरा नहीं कर पाना सरकार और सरकारी अमले की जिम्मेदारी नहीं है। इस पूरे मामले में दोषी कौन रहा, किस किस की लापरवाही रही उन्हें क्यों नहीं जिम्मेदार ठहराया जाता है। क्यों नहीं उनके खिलाफ कार्रवाई होती। इस सवाल का कोई जवाब नहीं है,, या फिर है भी तो ऐसा जिसे सब जानते हैं, पर जुबां पर कोई नहीं लाना चाहता।

Friday, October 29, 2010

पटाखों ने दी खुशी के बदले सजा

अखबार की सुर्खियों के बीच दो खबरें मन को बेचैन कर रही हैं। शहर के दो निजी स्कूलों में पटाखे चलाने पर बच्चों को सजा दी गई है। अब पटाखे चलाना भी जुर्म हो गया है। दीपावली में अब एक सप्ताह बचा है और त्योहारी रंग कहीं नजर नहीं आ रहा।मुझे याद आता है बचपन में हम दशहरे से ही पटाखे छोड़ने की शुरुआत कर देते थे। शाम को जब गली में बच्चों की टोली जमती थी तो हर किसी के पास कोई न कोई पटाखा जरूर होता था। स्कूल में तो टिकड़ियों और हाथगोली की बहार रहती थी। कई बच्चे सुतली बम भी लाते थे। हाथ गोलियां तो खूब जम कर चलाते थे। यहां तक कि कई बार तो खिड़की में से हाथ निकाल बरामदे में गुजर रहे मास्साब के पावों को निशाना बना कर भी हाथगोलियों के धमाके किए थे। लेकिन अब बच्चों में पटाखों को लेकर क्रेज नहीं है या त्योहारों को शिष्टाचार की बेड़ियां पहना रहे हैं। पता नहीं पर कुल मिला कर बच्चों को पटाखे जलाने जैसे अपराध, यदि यह अपराध है तो, के लिए इतनी सजा के बारे में पढ़कर अच्छा नहीं लगा।

Saturday, September 18, 2010

राजस्थान के 23 जिलों में खाद्यान्न असुरक्षा ,food insecurity, rajasthan,

राजस्थान प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्यान्न उपलब्धता एक संकट के रूप में उभर रही है। संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम और इन्स्टीट्युट ऑफ ह्युमन डवलपमेंट की खाद्यान्न सुरक्षा एटलस  के अनुसार  राजस्थान के 33 में से 23 जिलों में खाद्यान्न और पोषण के गम्भीर संकट से निपटने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। प्रदेश के सात जिलों को छोड़कर अन्य में पांच साल से कम आयु की शिशु मृत्यु दर प्रति हजार शिशुओं पर 100 से भी अधिक है। और यह राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। इसी प्रकार पांच जिलों को छोड़ कर प्रदेश के अन्य हिस्सों में हर दूसरा बच्चा औसत से कम वजन का है। हालांकि जहां देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों का प्रतिशत 28 है राजस्थान में यह 22 फीसदी ही है।
खाद्यान्न असुरक्षा वाले जिले- बांसवाड़ा, डूंगरपुर, राजसमंद, बाड़मेर, जैसलमेर, पाली, सिरोही, बीकानेर,जालोर,नागौर, जोधपुर,अजमेर, भीलवाड़ा, करौली, सवाईमाधोपुर,टोंक, धौलपुर,बारां, चित्तौड़गढ़, झालावाड़ और बूंदी।  ( नवगठित जिला प्रतापगढ़ भी चित्तौड़गढ़ से अलग होने के कारण इसी सूची में शामिल होगा। इस प्रकार कुल जिले 23 हो जाएंगे।)

Tuesday, September 14, 2010

सही कहा राहुल ने ...,NAREGA.

राहुल गांधी ने स्वीकारा है कि देश में हर स्तर पर भ्रष्टाचार है। उनके पिता राजीव गांधी ने भी स्वीकारा था कि दिल्ली से चला एक रुपया गांव तक जरूरतमंद के पास पहुंचते पहुंचते घिस कर 14 पैसे रह जाता है। उनकी दादी इंदिरा गांधी ने भी भ्रष्टाचार को स्वीकारा था। तो देश का सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य की देश के सबसे शक्तिशाली परिवार के सभी प्रमुख लोग भ्रष्टाचार को स्वीकारते तो हैं पर वह खत्म नहीं होता है। राहुल ने थोड़ी व्यवहारिक बात कही कि आरोप हर कोई लगाता है, पर नियंत्रण के वक्त कोई भी साथ नहीं होता है। नियंत्रण कि बात करने वाला अकेला खड़ा मिलता है। राहुल की यही बात राजस्थान में शत प्रतिशत सच साबित हो रही है। नरेगा में भ्रष्टाचार की गंगा नहीं बल्कि समुद्र बहने के आरोप लगे थे। सामाजिक अंकेक्षणों और राज्य सरकार की जांचों में भ्रष्टाचार होना साबित हो रहा था। इस पर प्रदेश के पंचायती राज मंत्री भरत सिंह ने मुख्यमंत्री की सहमति से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के उपाय किए थे। लेकिन जैसे उन्होंने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया हो। उनकी ही पार्टी के  विधायक उनका विरोध करने लगे। केकड़ी के कांग्रेसी विधायक रघु शर्मा ने तो विधानसभा में ही भरत सिंह को मानसिक अवसाद ग्रस्त करार देते हुए उनके डॉक्टरी इलाज जैसी गंभीर बात तक कह दी। विधानसभा के बाहर पूरे प्रदेश के सरपंच आंदोलन पर उतारू हो गए यह किसी से छुपा नहीं है। अब खबर है कि राजस्थान सरकार नरेगा में खरीद के अधिकार फिर से ग्राम पंचायत स्तर पर देने पर विचार कर रही है। सरपंचों की मांगों पर विचार करने वाली समिति ने इसकी सिफारिश सरकार को की है। इसी अधिकार को वापस पाने के लिए प्रदेश भर के सरपंच संघर्ष कर रहे थे। यानी जिस भ्रष्टाचार को रोकने की पहल की गई थी। वो पहल अब वापस हो जाएगी। लूट लो जितना चाहो उतना। राहुल की ही बात को उसकी ही पार्टी की एक प्रदेश सरकार साबित कर रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ पहल करने वाला अकेला ही खड़ा रह जाएगा। अब इसे क्या कहा जाए,,,।