Wednesday, June 2, 2010

अब दुख भरे दिन बीते रे भैया ,.

फोन की घंटी बजी,,, जो बजती ही चली गई,,, अटेंड किया तो चचा की आवाज आई।
अरे भतीजे,, खुश हो जा,, अब दुख भरे दिन बीते रे भैया ,, अब सुख आने वाला है,,,,।
अचकचाते हुए अनमने मन से मैंने चचा से पूछ ही लिया,, कैसा सुख,, हमने तो बस सुना ही सुना है, कि सुख भी कुछ होता है,, तुम किस सुख के बारे में बात कर रहे हो,,चचा।
अरे वो अपनी शान है न अपना कोहीनूर, बस वो वापस आ रहा है,, बुरा हो आततायियों का जो यहां से ले गए,,,,।
अरे तो चचा इसमें खुश होने वाली क्या बात है,, कोहीनूर आए या जाए ,, हमारे यहां क्या कुछ बदल जाएगा,,, तुम काहे परेशान हो रहे हो...।
बस यहीं तो मात खा जाता है हमारा देस भतीजे,, अब तुम जैसे लोग ही तो हैं जिनके कारण सब बेड़ा गर्क हुआ जा रहा है.,. तुमको कोहीनूर से कुछ लेना देना नहीं,,तुम कोई कोई फर्क ही नहीं पड़ता, वहां देश की इज्जत नीलाम हुई जा रही है,, और यहां इन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता,,,,,अजीब आदमी हो,,।
क्या अजीब आदमी हैं,,, देश की इज्जत एक कोहीनूर से नीलाम हो जाएगी,, यहां रोज हर चौराहे, हाइवे और गली मोहल्ले में नीलाम हो रही है जो,, देश में आधे से ज्यादा लोग ठीक से पढ़ नहीं पा रहे और तुम कह रहे हो इज्जत नीलाम हो रही है,,,। बताओं देश के लोग ठीक अंग्रेजी तक तो बोल नहीं पाते और तुम कह रहे हो इज्जत नीलाम हो रही है।,,। कोहीनूर आ कर क्या कर लेगा,,। कहीं किसी लॉकर में बंद ही हो जाएगा न। हमारे देस में कई सरकारी अफसरों के बैंक लॉकरों में वैसे कई कोहीनूर खरीदने लायक माल पड़ा होगा। ये अलग बात है कि अब तुम उसे काला धन कहोगे,,। कोहीनूर न हो गया जी का जंजाल हो गया।
अरे भतीजे इतना काहे गर्म हो रहे,,, खाली कोहीनूर थोड़े ही ला रहे हैं, उसके साथ सुल्तानगंज की बुद्घ प्रतिमा भी ला रहे हैं।,,वैसे ये अंग्रेजी वाली बात तो तुम सही कह रहे हो,, ससुरों का पता नहीं क्या जाता है अंग्रेजी सीखने में,,, सीख लें तो आदमी बन जाएं,,, पर तुम बात भटका रहे हो..।
अरे चचा बुद्ध प्रतिमा की बात कर रहे हो,, हमारे देस में पड़ी मूरतें ही संभाल लें तो बहुत हैं,, यहां तो जिंदा आदमी मूरत हुआ जा रहा है,, वो क्या कहते हैं,, पुरातत्व वाले पता नहीं कितनी जगहों पर मूर्तियों को निकाल निकाल कर यूं ही पटक दिए हैं,, उनको रखने का ठौर नहीं,, बाहर से और ला रहे हैं,, अच्छा बताओ ले भी आओगे तो क्या उनसे बेहतर संभाल पाओगे।
अरे भतीजे तुम्हारी समझ में तो नहीं आएगी,, पर बाकी लोग तो मेरी बात से सहमत होंगे ही,, आखिर हमारा कोहीनूर हमारे पास ही होना चाहिए। बोलो है कि नहीं।

Tuesday, June 1, 2010

सुर सुर की बात

चचा हंगामी लाल आज बहुत दिनों बाद नजर आए तो हमने कहा चचा कहां चले गए थे, इतने दिन।
अरे कहीं नहीं, बस यूं जरा मन नासाज था इतने दिनों तक बड़े परेशान हो रहे थे।
क्यों चचा क्या बात हो गई थी.
बस यूं ही, पर आज जरा मन ठीक है, देश तरक्की कर रहा है न, इसलिए।
चचा की बात सुन हम जरा चौंके, देश तरक्की कर रहा है... आपको कैसे पता चला चचा और तुमको ये एकाएक देश की फिकर क्यों होने लगी।
अरे वाह भतीजे हमें फिकर नहीं होगी तो और किसे होगी। वो मनमोहन ने हमें तो ही सारा भार सौंप रखा है, इसी में जरा बिजी रहे थे। इतने दिनों। अब आज देखो खबर आ गई न की उम्मीद से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है देश,.।
चचा एक बात तो समझ में आ गई की तुम विकास दर के नतीजों की बात कर रहे हो,, पर ये मनमोहन वाली बात समझ में नहीं आई। जरा खोल कर समझाओ।
अच्छा तो सुनों,, पर किसी से कहना मत,, तुम तो जानते हो ये सुपर कॉन्फिडेन्शियल है,, देश का सवाल जो है,,,।
ठीक है चचा पर अब बता भी चुको...।
वो क्या है न कि पिछली 22 तारीख को जब मनमोहन सिंह की दूसरी पारी का एक साल पूरा हो गया न तब वो हम से मिला था। क्या हुआ न कि उस रात को जब हम सो गए तब हमारे ऊ 4जी टेक्नीकवाले फोन पर ऊ का फोन आया रहा। हमसे बोला चचा तुम तो पुराने पत्रकार हो,,आज सुबह हम खूब पत्रकारों से बतियाए पर मन नहीं भरा,, कुछ मन की कह सुन नहीं पाए। बहुत पता लगाया तब लगा कि चचा हंगामी लाल ऐसा पुराना पत्रकार है जिससे बात की जा सकती है,,सो हम तुमको फोन लगएं हैं,, तुम से कुछ मन की कहना चाहते हैं,,, ।
अब देस का प्रधानमंत्री कहे तो हम कौन जो ना कह दें,,, हमने कहो ,,, डॉक्टर साब,,,। बस इतना सुनते ही वो तो झूम गया,,, देखा यही न ,, यही अन्तर है पुराने औऱ समझदार पत्रकार में अब तुम समझदार हो तभी जानते हो हमारी डॉक्टरी का मतलब,, इसलिए न हमें डॉक्टर कहा,,, भई वाह,, दरअसल हंगामी जी,, अब मैं बहुत खुश हूं,, मैं अटल जी से भी ज्यादा प्रधानमंत्री रह कर नेहरु जी के वंश के अलावा इस देश सबसे लम्बे समय तक प्रधानमत्री रहने वाला आदमी हो रहा हूं,,,। बताओ औऱ क्या चाहिए,, जब से प्रधानमंत्री बना हूं लोग मेरे पीछे ही पड़ गए हैं राहुल को प्रधानमंत्री कब बना रहे ,, । अरे भाई वो बने जब बने...। मुझ से क्यों पूछते हो,, यह तो वही बात हुई न की घुमा फिरा कर पूछ लिया कि गद्दी से कब उतर रहे हो,,,, बताओ मैंने इस देश के लिए क्या नहीं किया। सबकुछ किया। लोग कहते थे कि कभी इस देश में दूध दही की नदियां बहती थी, मैंने तो नोटों की नदी बहा दी है,,, नरेगा नदी। नरेगा मैया बिल्कुल गंगा सी पवित्र है,,जो भी इसमें डुबकी लगाएगा उसकी सारी गरीबी ये हर लेगी...। अब पूछोगे यह तो केवल गांवों में बहने वाली नदी है,,। अरे शहरो में नदी बहाने की जगह नहीं है,,, वहां नालियां बहाई है,, अरबन रिन्युअल की,,, हर जगह नए नए तरीके की मोरी है,, जिसके जिधर जैसे चाहे मोड़ लो। अब देखो हंगामी लाल जी ,,, सारी दुनिया मंदी के चक्कर में पड़ी थी,... हम बचे या नहीं,, बोलो,, बचे की नहीं,, फिर भी जो है सो पीछ पड़े रहते हो,, हर समय सोनिया जी का डर दिखाते हो,, अरे माना उन्होंने पीएम बनाया है,,.. पर काम तो मैंने ही किया है,, वो तो केवल पब्लिक इन्ट्रेस्ट की बात करती है.. देश की बात तो मैं ही करता हूं।,,, चलो हंगामी जी अब एक बात करना मेरी सबसे बड़ी प्रोब्लम महंगाई है,, मैं चाह कर भी इसे कम नहीं कर पा रहा हूं,, । तुम ठहरे पुराने पत्रकार मुझे जरा महंगाई कम करने का कोई फामुर्ला बताओ,, कहीं से कोई रिसर्च करो,, कोई जप तप करो,, कोई गंडा ताबीज करवाओ,, कुछ करो,, प्लीज,, ।
उनकी इतनी बात सुन कर मैंने कहा,, मनमोहन जी ,, इसको कोई काबू में नहीं कर पाया,, अब आप कहते हो तो मैं कुछ ढूंढता हू,,,। आप मुझे दुबारा फोन करना।..
तब से मैं लगातार कई बाबाओं,, तांत्रिकों ,, पुराने लोगों,, से मिल कर महंगाई को काबू में करने का तोड़ ढूंढ़ रहा हूं,,। पर अब तक तो कुछ मिला नहीं,, भतीजे आज सोचा तुमसे कुछ पूछ लूं तो चला आया तुम्हारे पास,,तुम्हें यदि पता तो तुम ही बताओ,,..।
देखो चचा इसका तो एक ही इलाज है,, जो अभी तुम ही कह रहे थे,,
वो क्या...
महंगाई के अलावा हर बात का ढोल बजाओ,, बस महंगाई की बात पर चुप्पी साध जाओ,,
अभी बढ़ी हुई विकास दर का राग अलवाओ,, महंगाई का सुर अपने आप नीचा हो जाएगा,, ।
लगता है हमारी बात चचा को एकदम से जंच गई और वे तुरन्त अपना चमकता चेहरा ले आगे बढ़ गए। शायद मनमोहन को फोन घुमाने,,,।

Saturday, April 10, 2010

इस्तीफे के साइड इफेक्ट

कई दिन हो गए हमें चचा हंगामी लाल के कुछ समाचार नहीं मिल रहे थे। सो आज हम सवेरे उनके कमरे पहुंच गए। वहां पहुंचे तो क्या देखते हैं, चचा बड़ी गम्भीर मुद्रा में अखबार हाथ में लिए पता नहीं क्या सोच रहे हैं, हम कहे सलाम चचा, कैसे हैं। हमारी आवाज सुन कर उदास से चचा के चेहरे पर कुछ चमक आई, बोले आओ भतीजे, बस ठीक हैं,,,,। चचा का जवाब कुछ गड़बड़ लगा, सो दुबारा पूछा, बात क्या है चचा कुछ तो बताओ,,। अरे यार अब क्या बताऊं, बेटा बस ये जरा आजकल माओवादियों की खबरों से चिन्ता हो रही है। हम कहे, सो तो है चचा, बात ही ऐसी है चिन्ता होनी ही चाहिए,,,इतने लोग जो मर गए,,। अरे नहीं भतीजे इतने लोग मर गए इससे चिन्ता नहीं हो रही है,, दरअसल वो अपने धोतीधारी गृहमंत्री की हालत देख कर चिन्तित हो रहा हूं। बेचारे के पास देने के लिए और कुछ नहीं तो इस्तीफा ही दे दिया। ,,, पर चचा इससे तुम क्यों चिन्तित हो,, । ,, देखो भतीजे,, तुम नहीं समझोगे,, तुम्हारा राजनीति से कोई लेना देना नहीं है न इसलिए ऐसा कह रहे हो। ये इस्तीफा देने की बात कोई आसान या सहज बात नहीं है, ,, इससे बहुत ज्यादा फर्क पड़ने वाला है,, इसके बहुत से साइड इफेक्ट सामने आएंगे,,,। राजनीति में जो लोग हैं उन्हें भुगतना पड़ेगा..। अब तुम देखो ,, ये बताओ,, ये जो देश है,, ये इतना बड़ा है कि क्या बताऊं,,,, यहां रोज कुछ न कुछ होता रहता है,, कहीं ट्रेन टकरा जाती है,, कहीं पुल गिर जाता है,, कहीं चीन सीमा में घुस आता है,, लब्बो लुआब ये कि कहीं भी कुछ भी हो जाता है,, यूं बात बे बात पर इस्तीफा देने लगे तो हो गया।,,,,, और संकट इस्तीफे का नहीं है,, संकट तो इस्तीफे के बाद का है,, मान लो तुम जैसे नासमझों ने इसे ठीक मान लिया,, इसे परंपरा बना लिया तो सोचो सारे राजनेताओं को इस्तीफा देना पड़ जाएगा, फिर मंत्री बनेगा कौन,, और कैसे,, भइया तुम समझ लो ,, बिना मंत्री देश कैसे चलेगा,, प्रदेश कैसे चलेगा,,। है ही नहीं कोई दूसरा उपाय हमारे सिस्टम में....। इनसे पहले शिवराज जी ऐसे ही थोड़े न अड़ गए थे,, कि नहीं देंगे इस्तीफा,, बहुत सही किया था,, उन्हें देश की चिन्ता जो थी.,। अब सोचो यदि शिबु गुरु जी सोच लेते की भाई मुकदमा चल रहा है,, हम कैसे मुख्यमंत्री बन जाएं,, तो क्या होता,, झारखंड कैसे चलता,, कोई मुख्यमंत्री ही नहीं बनता,, बिना मुख्यमंत्री कैसा प्रदेश। पूरे झारखंड पर संकट आ जाता। ,,, वो तो भला हो जो शिबु गुरु जी सोच समझ कर राज्यहित में डटे रहे कि , चाहे कोई संकट आ जाए मैं कर्तव्य पालन से नहीं हिचकूंगा,, डटा रहूंगा..। लालू जी भी बहुत कोशिश किए, डटे रहे,, शिवराज जी भी डटे रहे ,, तमाम लोग डटे रहे,, इन सबन ने मिल कर बड़ी मुश्किल से राजनेताओं को हर परिस्थिति में उनका काम करते रहने का मार्ग प्रशस्त किया था। अब ये चिदम्बरम फिर से उस लीक को बिगाड़ रहे हैं,,, अरे ऐसे नहीं होता,, वो तो भला हो मनमोहन का जो सब समझते हैं,, स्वीकार ही नहीं किया,, जो स्वीकार लेते तो बड़ी मुसीबत हो जाती ,,। अरे मैं देश के हिसाब से नहीं कह रहा, वो तो जो होगा सो होगा,, नक्सलियों से भिड़ने के लिए जो लोग हैं वो जुटेंगे,, उनका काम है,, हम सब उनके साथ हैं,,, । पर मैं राजनेताओं के हिसाब से कह रहा हूं,, हर राजनेता के लिए बड़ी मुसीबत हो जाती,, चलो अन्त भला तो सब भला,,,।
चचा की बात सुन,, हम क्या कहें हमें कुछ नहीं,, आया,, आपको समझ आया हो तो बताना,,,।

Thursday, February 18, 2010

जिंदगी

कतरा कतरा जिंदगी

लम्हा लम्हा बंदगी

क्या है,क्यूं है ये बंदगी
न समझ, न समझा पाई ये जिंदगी 

Monday, February 15, 2010

सड़क पर दौड़ता आतंक

पूना में विस्फोट हो गया...। आतंक की एक ओर दास्तां लिख गया.....। खबरों की सुर्खियां कह रही हैं,,,। इन हमलों की योजना बनाने वाले विदेशी थे.....। पर इन्हें अंजाम देने वाले हाथ,, हिन्दुस्तानी हो सकते हैं,,,। गृहमंत्री कह रहे हैं,, हमला और भी बड़ा हो सकता था, पर कम नुकसान हुआ है,, सुरक्षाबलों को बधाई,,,। किसी का कयास है कि  25 तारीख को होने वाली भारत -पाक बातचीत नहीं हो इसलिए हुए हैं हमले ....। तो कोई कह रहा है कि विदेशियों को निशाना बनाने की खातिर हो रहे हैं हमले।  हमला चाहे किसी भी कारण हुआ हो,, लेकिन हुआ है,,। किसने किया क्यों किया ये बात दिगर ,, पर हर आम इंसान की चाह की हमले नही हों,, हमलावरों की पहचान हो,, और दोषियों को बख्शा नहीं जाए। फिर से आतंक का जलजला नहीं उठे। फिर ऐसे मौके नहीं आएं की अमनपसंद लोगों को बेवजह सियासतदाओं की लड़ाई में अपनी जान गंवानी पड़े। चिन्ता बहुत बड़ी है,, और उसके सरोकार उससे भी बड़े.....। पर आजाद हिन्दुस्तान की सरजमीं पर इस वाकये की गम्भीरता को बनाए रखते हुए दिल एक और सवाल उठाना चाह रहा है। और वो सवाल आतंक की इस घटना से कहीं कोई ताल्लुक नहीं रखता पर हां हर आम हिन्दुस्तानी की जिन्दगी से जरूर ताल्लुक रखता है। 

क्या किसी ने सोचा है कि सुबह जब कोई आम हिन्दुस्तानी घर से अपने दुपहिया वाहन पर सवार हो कर ऑफिस के लिए निकलता है तब उसके या उसे खुशी-खुशी विदा कर रहे उसके परिजनों में से किसी के मन में लेश मात्र भी आशंका नहीं होती कि उसका परिजन सही सलामत घर वापस नहीं पहुंच पाएगा। लेकिन बिना किसी बम धमाके या आतंकी हमले की चपेट मे आए भी उसके परिजन हमेशा हमेशा के लिए उसका इन्तजार करते रह सकते हैं। और इसके लिए कोई विदेशी हाथ, कोई षडयंत्र  जिम्मेदार नहीं होता। जिम्मेदार होती हैं तो बस कोलतार की वो सड़कें जो लोगों को मंजिल तक पहुंचाने के लिए बनी होती है। या फिर वो वाहन जो उन सड़कों पर फर्राटे भर मंजिल को लोगों के करीब लाते हैं। जी आप सही समझ रहे हैं मैं बात कर रहा हूं सड़क हादसों में जान गंवाने वाले उन लोगों की जो कहने भर को हादसे का शिकार होते हैं, पर सोचिए क्या वाकई सड़क हादसा ऐसी आपदा हैं जिन्हें टाला नहीं जा सकता । ड्ब्लयू एच ओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की  रिपोर्ट के अनुसार भारत ऐसा देश है जहां विश्व भर में सर्वाधिक लोग सड़क हादसों में जान गंवाते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 (रिपोर्ट में उसी वर्ष के आंकड़ों की तुलना की गई है) में भारत की सड़कों पर एक लाख 14 हजार लोगों ने प्राण गंवाए थे। (आतंकियों को इतने लोगों को शिकार बनाने के लिए जाने कितने हमले करने पड़ें।) इतना ही नहीं हर घण्टे देश में तेरह लोग सड़क हादसों में जान गंवा देते हैं। अमरीका में 2006 में 42,642 लोगों ने सड़क हादसों में जान गंवाई तो इंग्लैण्ड में कुल 3298 लोग सड़क हादसों का शिकार हुए।चीन में करीब 89000 लोग हादसों का शिकार हुए । भारत में यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है,क्योंकि यहां बहुत सारे मामले तो दर्ज ही नहीं होते। 

Friday, February 5, 2010

जय युवराज,,

आज चचा हंगामी लाल बहुत जोर से चिल्ला रहे थे,,, मिल गया ,, मिल गया,, मिल गया,,
चाचा को यूं बेसाख्ता चिल्लाते देख हमसे रहा नहीं गया,,,,,,, अरे चचा क्या मिल गया,,, भतीजे हमें देश का सही वारिस मिल गया,,, क्यों चचा क्या बात हो गई,,, अरे देखते नहीं ,, देखते नहीं अपने युवराज ने क्या कमाल कर दिया,,मुम्बई में,, दिखा दिया की देश एक है,,,, सारे ठेकेदारों को समझा दिया,,, सबको संदेसा दे दिया ,,, कि देश एक है और अब यह सब नहीं चलेगा,,,, मुम्बई में घूम लिए,, लोकल में घूम लिए,,, इसे कहते हैं युवराज,,, कहो क्या कहते हो,,,

Tuesday, January 12, 2010

उतिष्ठत् जाग्रत प्राप्यवरानिबोधत्

आज स्वामी विवेकानंद की जयंती है, यानी युवा दिवस। विवेकानंद ने युवाओं को किसी देश की तकदीर और भविष्य कहा था। उन्होंने ध्येय वाक्य दिया था, उतिष्ठत् जाग्रत् प्राप्यवरानिबोधत्। अर्थात, उठो जागो और तब तक मत रूको जब तक की लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाए। उठने, जागने औऱ लक्ष्य प्राप्त होने तक नहीं थमने की यह प्रक्रिया हर किसी के जीवन में महत्वपूर्ण परिणाम लाती है। पर सवाल उठता है कि कितने लोग अपने लक्ष्य के बारे में जानते हैं, और कितनों को यह अनुभूति हो पाती है कि वे वास्तव में सो रहे हैं। जब उन्हें अपने सोने का अहसास ही नहीं हो पाएगा तो जागने और लक्ष्य पाने की बात तो बहुत दूर है। हम क्या कर रहे हैं, और उसका क्या परिणाम है यह अनुमान लगा पाना बहुत कठिन है। नामुमकिन है ऐसा मैं नहीं कहता। क्योंकि नामुमकिन तो कुछ भी नहीं है। पर सवाल अपनी जगह है, कि यह कैसे पता चले कि हम सो रहे हैं और हमें जागना है। मैंने कुछ जनों से यह सवाल पूछा तो उनका कहना था कि तुमने बचपन में क्या करने और क्या बनने का सोचा था..। मैंने उन्हें बताया। और यह भी बताया कि वह तो मैंने काफी हद तक पाया,, पर अब प्यास बढ़ती जा रही है,, और यही तो अन्तिम सत्य नहीं,, अन्तिम इच्छा नहीं है,, अब जो चाहता हूं वो मिल जाएगा तो कुछ और पाने की चाह जगेगी।,,,मन अक्सर क्लान्त ही रहता है। फिर यदि आप जानते भी हैं कि आप क्या चाहते हैं और उसे पाने का रास्ता भी जाग्रत मस्तिष्क में कहीं दिखने लगता है , लेकिन लक्ष्य प्राप्ति के लिए जो कुछ कर गुजरने वाला जज्बा चाहिए वो कहां से लाया जा सकेगा। लोग कहते हैं कि हिम्मत करके देखो शायद कुछ बात बन जाए,, पर फिर वे ही कहते हैं यार, डर लगता है,, अभी जो जिम्मेदारियां है उन्हें कैसे निभाया जाएगा। जिम्मेदारियों का बोझ ही शायद हरेक को हमेशा सोते रहने पर विवश करता है। वरना कौन नहीं चाहता जागना औऱ लक्ष्य पा लेना,,। पर हां, आज एक बार फिर से स्वामी जी का कथन याद आया औऱ याद आए लक्ष्य। कहां से चले औऱ कहां पहुंच गए.. अभी पता नहीं कहां कहां से गुजर होगा। पर हां, आज फिर कुछ सोचा है,, पूरी तरह से सोने से बेहतर है, कुछ जाग जाया जाए, मंथर गति से ही सही लक्ष्य की ओऱ बढ़ा तो जाए,,। कच्छप शैली में ही आज नहीं तो फिर कभी,, कभी न कभी तो लक्ष्य प्राप्त होगा ही। तो एक बार फिर से उतिष्ठत् जाग्रत् प्राप्यवरानिबोधत्।

Thursday, December 24, 2009

क्या इडियट हैं हम

आप कोई भी चैनल बदलें, किसी भी समय देखें, इन दिनों आमिर खान अपनी नई फिल्म 3 इडियट्स के प्रचार में जोर- शोर से जुटे नजर आएंगे। आमिर के बारे में कहा जा रहा है कि वे 100 प्रतिशत प्रोफेशनल हैं। इतने की अपने फायदे के लिए के किसी भी हद तक जा कर कुछ भी कर गुजरने का माद्दा रखते हैं। अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए नए-नए तरीके इस्तेमाल करते हैं। 3 इडियट्स को चर्चा में लाने के लिए उन्होंने क्या क्या नहीं किया। कैच मी इफ यू कैन अभियान की बात दरकिनार भी कर दी जाए तो तो मीडिया को गाहे बगाहे गॉसिप परोसकर वे अपना काम करते रहते हैं। शाहरुख, सलमान और खुद के खान होने से खानवाद का जो नारा मीडिया ने उछाला है वे उसे भी जमकर कैश कर रहे हैं। पर मुझे याद आते हैं सालों पहले के आमिर खान। तब वे आमिर खान नहीं, चॉकलेटी आमिर हुआ करते थे। कयामत से कयामत तक में एक रोमांटिक लवर बॉय की जो भूमिका उन्होंने की थी, उसके लिए कोई अतिरिक्त प्रचार भी नहीं हुआ था। फिल्म की प्रारम्भिक बनावट और मासूम अदाकारी में ही इतना दम था क फिल्म आप से आप ही हिट और सुपरहिट होती चली गई। फिर दौर आया जो जीता वही सिकन्दर, हम हैं राही प्यार के, गुलाम, रंगीला और सरफरोश का उन सब फिल्मों के लिए आमिर ने अलग से कोई विशेष प्रचार अभियान नहीं चलाया पर फिल्मों ने कारोबार किया। लगान ने इतिहास रचा औऱ अभिनेता आमिर निर्माता आमिर बन गया। अब तक फिल्म में केवल अपनी भूमिका और उसका असर देख कर उसे निभा जाना भर उनकी खासियत हुआ करती थी। अपनी फिल्मों के साथ ही खुद को भी पूरा समय देना उनकी फितरत हुआ करता था। लेकिन जबसे उन्हें समझ आया कि फिल्म् को बनाने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे कायदे के साथ बेचना, उन्होंने फिल्म को बेचना शुरू कर दिया। कहावत है कि, बेहतर सेल्समैन वह होता है जो गंजे को कंघी बेच दे, लगता है आमिर ने वह कहावत सुन ली है और अब इसे आत्मसात करने की डगर पर कदम दर कदम बढ़ रहे हैं। जाने तू या जाने ना, गजनी और तारे जमीं पर के दौरान भी उन्होंने जमकर अपनी मार्केटिंग स्किल्स का मुजाहिरा किया। लेकिन 3 इडियट कुछ ज्यादा ही खास है। चेतन भगत की फाइव पांइट, समवन नोट टु डू इन आईआईटी, पर आधारित इस फिल्म का कथानक मूल उपन्यास से अलग किसी नए रूप में दिखे तो चौंकिएगा नहीं। आमिर की अदा है कि वे अपनी फिल्मों में इतना डूब जाते हैं कि मूल कथानक को मूल नहीं रहने देते। आईआईटी की कॉलेज लाइफ को लेकर बन रही यह फिल्म देश के उन लाखों असफल जे आईआईटीयन्स को तो अपील करेगी ही जो आईआईटी प्रवेश परीक्षा में बैठने के बावजूद आईआईटी में पढ़ नहीं सके और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी है। चेतन ने अपनी किताब में आईआईटी के एजुकेशन और मार्किंग सिस्टम को चुनौती दी थी। उन्होंने बताया कि कैसे 1 से 10 अंकों परफोर्मेंस पैरामीटर अच्छे खासे स्टूडेंट को बुकवर्म में बदल देता है और वह अपने जीवन के सुनहरे सालों को यू हीं गंवा देता है। पढ़ाई और बुकवर्म की बात को ध्यान में रखते हुए भले ही सतही तौर पर कहीं यह लगता हो कि आईआईटी का मार्किंग सिस्टम छात्र की निजी जिंदगी को खत्म कर रहा हो पर यह भी ध्यान रखना होगा कि वही सिस्टम, वही पढ़ाई आईआईटी को बेजोड़ बनाती है।अलग मुकाम देती है। नहीं भूलना चाहिए की आज चेतन जो लिख रहे हैं, वो अच्छा है या बुरा, इसके मूल्यांकन से भी पहले, इसलिए में चर्चा में आ जाता है क्योंकि उसे एक आईआईटीयन ने लिखा है। छात्र जीवन में मौज, मस्ती सभी के जीवन का अंग होती है। मुझे भी याद आता है जब मैं प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ता था, ( मम्मी की पोस्टिंग उन दिनों चित्तौड़गढ़ जिले के गांव गंगरार में हुआ करती थी।) तब स्कूल से दोस्तों के साथ गायब होना औऱ घर के पास एक बड़े बरगद के पेड़ के कोटर में बस्ते छिपा कर, छोटी साइकिल (अधिया, पविया) को किराये पर ले पैडल मारते हुए गांव से करीब दो-तीन किलोमीटर दूर स्टेशन पर पहुंच जाते। जहां ट्रेन के आने का इन्तजार करते, पटरी के पास बैठे रहते, स्टेशन पर घूमते रहते। दूर से ट्रेन आती दिखती तो जेब में रखे दस-बीस पैसे के एल्युमीनियम के सिक्के पटरी पर रख दिया करते थे। इंजन के पहले दूसरे पहिये के गुजरते ही सिक्के पटरी से नीचे गिर जाते। ट्रेन गुजरने के बाद बेढ़ब हुए सिक्कों के नए आकार प्रकार को देखते औऱ खुश हुआ करते थे। क्या इडियटपन था वो भी।
बहरहाल, अपने अजीब से प्रचार अभियान के माध्यम से देशभर को इडियट बना चुके आमिर की फिल्म चंद घंटों बाद ही जनता के सामने होगी। देखना होगा कि फिल्म 3 घंटों में कितनों को इडियट बनाती है और आखिर में कौन इडियट साबित होगा।

Tuesday, December 15, 2009

नया साल, उम्मीद पुरानी

मोबाइल पर चचा हंगामी लाल का मैसेज था,
लम्हा लम्हा वक्त गुजर जाएगा,
१६ दिन बाद नया साल आएगा
आज ही आपको हैप्पी न्यू इयर कह दूं , वर्ना,,
कोई और बाजी मार जाएगा
विश यू है प्पी न्यू इयर २०१० ...
चचा का यह मैसेज पढ़ कर हमारे चेहरे पर मुस्कान थी,, अरे एक साल गुजर गया, अभी कल ही की तो बात है जब सबको हैप्पी न्यू इयर बोला था,, नए साल के लिए कसमें खाईं थी, संकल्प लिए थे,, देखते ही देखते साल कैसे गुजर गया.... । लेकिन मन ने दूसरे ही पल कहा,, हां,, साल तो गुजर गया पर देखते ही देखते कहां गुजरा,॥ इस साल ने तो कई टीस दी हैं,,। हर लम्हा जेब पर और भी भारी हो,, गुजरा....। साल के शुरू में जहां चीनी २० -२१ रुपए किलो थी वो अब साल खत्म होते होते अड़तीस रुपए किलो तक पहुंच गई। साल के सरकने की दर पर मंदी का साया बना रहा,, बहुत सपने सोचे थे॥ नई सरकार बनेगी॥ कुछ राहत मिलेगी॥ पेट्रोल के दाम कम होंगे॥ वो तो हुआ नहीं,, उलटे मुई सब्जी भी रसोई से गायब हो गई अब सूने फ्रिज ,,(दूध तो पहले ही मंहगा था, बस सब्जियों से से फ्रीज में थोड़ी रौनक रहती थी) मंडी में मंदी छाने का इंतजार कर रहे हैं। हर सब्जी में मिल कर सब्जी को बिजनेस क्लास से इकोनोमी क्लास में लाने वाला आलू खुद ही बिजनेस क्लास में शिफ्ट हो गया। साल के शुरू में सोचा था, कुछ बचत हो जाएगी तो कुछ जरूरी चीजें खरीद ली जाएंगी,, पर बचत तो दूर ओवर ड्राफ्ट हो गया,, खैर अब फिर से नया साल आ रहा है,, नई उम्मीदें हैं... सॉरी क्षमा चाहता हूं,, साल नया है,, पर उम्मीदें वही पुरानी हैं,, क्या करूं,, इस साल कुछ हो नहीं पाया,, बस जैसे तैसे साल गुजर गया,, चचा के मैसेज में एक बात तो सही है कि लम्हा लम्हा वक्त गुजर गया... लम्हा चाहे भारीपन से गुजरे या हल्केपन से , पर गुजरता जरूर है...
चलिए,, सभी पढ़ने वालों को आने वाले नए साल की शुभकामनाएं,,,,,

Monday, December 14, 2009

हंगामी लाल की राज्य वार

बहुत दिन से दूसरे शहर की नौकरी बजा रहे हैं, छुट्टी में घर पहंचे तो शाम पड़ते ही चचा हंगामी लाल आ पहुंचे। बहुत दिन बाद मिल रहे थे, हम और वो दोनों बहुत खुश थे। बातों ही बातों में चचा बोल पड़े, अब मिल लो जितना मिलना हो,, क्योंकि कुछ दिन बाद तो तुम हमसे मिलने किसी अस्पताल में आओगे,,
हम चकराए, क्या हुआ चचा,, क्या बात हो गई,, भगवान बचाए अस्पताल के चक्करों से,,,
अरे वो क्या है,, बीमारी जैसी कोई बात नही है,, दरअसल हम अनशन पर बैठने वाले हैं सो जब कमजोर होंगे तो अस्पताल ही में जाएंगे न॥
अरे पर आप अनशन कर काहे रहे हो
अरे वो नए नए राज्य बनाने की मांग हो रही है,, न उसी मामले में हम भी सोच रहे हैं कि एक बार हम भी अनशन कर ही दे,,,
अरे चचा ,, तुमको कौन सा राज्य चाहिए,,,,
मुझे कोई राज्य वाज्य नहीं चाहिए ,,,
तो चचा फिर ये अनशन क्यों...
अरे मेरी तो एक ही मांग है॥ सरकार एक काम करे,,, फिर से सारे राज्यों का गठन कर दे,, भाषा का चक्कर छोड़े और सम्पर्क,, सहजता,, भौगोलिक स्थिति का ध्यान करे... पूर्वांचल, उत्तराचंल, हिमाचल, तेलंगाना,, आंध्रा,, से लेकर केरल,, और राजस्थान से लेकर बंगाल तक,, कुल मिलाकर कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक औऱ जैसलमेर से लेकर इटानगर, गंगटोक तक सबको दुबारा से बना दो,, सबसे कह दो कि ,, भाई ,, अबकी बार सबको भारतीय मान कर राज्य बना रहे हैं,... किसी की भी अलग पहचान नहीं है,, ,, क्या बोलो,, क्या कहते हो॥ छे़ड़ दूं यह राज्य वार,,,
चचा की बात सुन हम चुप,।,,, सन्न,,,
हम कहे चचा तुम्हारी बात और मुद्दे में दम है,।,,, अनशन करो नहीं करो,, उसका फल क्या होगा,, यह तो मुझे पता नहीं,, तुम्हारी राज्य वार का अंजाम भी मैं नहीं जानता.. पर हां तुम्हारी बात जरूर जनता की ईसंसद में पहुंचा दूंगा,, शायद तुम्हें अनशन नहीं करना पड़े.....

तो सभी इन्टरनेट के पाठकों तक हमारे चचा हंगामीलाल का यह मुद्दा पहुंचा रहा हूं,,,,
सादर

Tuesday, October 6, 2009

प्याज तो बहाना है,,

आज के अखबारों की हेडलाइन थी, एक ही दिन में प्याज के दाम दुगने हुए,,,। इससे पहले चीनी, दाल, आलू आटे के भावों को लेकर कुछ न कुछ छपता ही रहता है,,। दाम का बढ़ना अब एक सुर्खी भर रह गया है। कहीं कोई हलचल नहीं। अपने हितों के लिए वेतन भत्तों के लिए,, धरना प्रदर्शन करने वालों को महंगाई कहीं से मुद्दा नहीं लगती है। हां, राजनीतिक दलों के लिए यह एक मुद्दा है जो सनातन है। हर पक्ष वाला विपक्ष के लिए यह मुद्दा जरूर रखता है। दरअसल यह अण्डरग्राउण्ड पैक्ट का नतीजा है। क्योंकि जो आज सत्ता में उसे कल विपक्ष में आना है तब एक मुद्दा रहना चाहिए और वह है महंगाई। सो अभी भी उसे विपक्ष के लिए रहने दो अगली बार जब हम विपक्ष में होंगे तो यह हमारे काम आएगा। तो नेताओं की यह बन्दरबांट अब जनता खूब समझने लगी है इसलिए महंगाई विरोधी धरना प्रदर्शनों में उस दल के ब्लॉक पदाधिकारियों के अलावा कोई शामिल नहीं होता। सो यह आम आदमी की आवाज नहीं बन पाता। लेकिन क्यों नही आम आदमी सड़क पर उतर जाता । क्यों नहीं वो महंगे आलू प्याज को यों ही खरीद (उठा) लाता। आखिर आम आदमी को कोई महंगा बेच जाए और बच जाए। यह क्यो संभव होता है। क्यों नहीं आम आदमी सरकारी दफ्तरों की ईंट से ईंट बजा देता। क्यो नहीं मंत्रियो के काफिलों की हवा निकाल देता। क्यों नहीं वो बता देता कि आम आदमी के पास वोट ही एक मात्र बेचारगी भरा हथियार नहीं है। जो पांच साल बाद खरबूजे पर पड़ने वाली छूरी सरीखा हर बार आम आदमी पर ही गिरता है। क्यों नेता एयरकंडिशन्ड सर्किट हाउस में रियायती दर पर सब्जी दाल उड़ाता है, क्यों नहीं आम आदमी उसकी थाली में से एक सब्जी हटा नहीं देता। क्यों क्यों क्यों,,, आपके पास कोई जवाब हो तो बताना ,, प्याज तो सिर्फ एक बहाना है ,, मेरे सवालों का सिलसिला मुझे चैन नहीं लेने दे रहा ,,,।

Friday, October 2, 2009

फोलोइंग गांधी की

शाम चार बजे जब मोबाइल बजा और स्क्रीन पर चचा का नम्बर दिखा तो चौंकना स्वाभाविक था, हमारे चचा सुबह सुबह एक्टिव होते है,, आज बेवक्त क्यों फोन किया,, जरूर कोई खास बात होगी सो हम भी तुरन्त दफ्तर में अपनी सीट से उठकर ( पत्रकार होने का यह भी एक नुकसान है जब सारा देश छुट्टी का मजा लेता है तब आप दफ्तर में काम में जुटे होते हैं) बाहर को सरक लिए ,,
हां , चचा कहो क्या बात है,,,
वो क्या है भतीजे की एक बात मन में आ रही है,, दरअसल सुबह से गांधी जी के बारे में इतनी सारी बातें सुनी हैं कि आज से गांधी जी को फॉलो करने का विचार बन रहा है,,
ये तो बहुत अच्छी बात है, चचा,,, नेकी औऱ पूछ पूछ ,, तुरन्त शुरू कर दो,,
पर यार ,,
अरे इसमें पर वर क्या,,,,
वो बात दरअसल ये है कि गांधी जी को फोलो करने में एक अड़चन है,,, मैं तो अभी ही नया कुरता सिलवा कर लाया था, और गांधी जी तो ऊपर कुछ भी नहीं पहनते थे,,,
अरे चचा ,, पहनने और न पहनने का क्या है, गांधी जी को फोलो करने के लिए क्या कमर नंगी रखनी जरूरी है,, आप तो बिन्दास जो मर्जी आए पहओ और गांधी को फोलो करो,,
हां, कह तो तुम ठीक रहे हो, पर एक शंका और है,,
वो क्या,,
देखो तुम तो जानते ही हो कि अपना धंधा तो लोगों को पैसा देना और ब्याज कमाना है,, अब उस धन्धे मे ब्याज और मूल वसूलने के लिए कभी कभी किसी को पिटवाना भी पड़ता है,, और गांधी जी तो अहिंसा की बात करते थे,,, अब बिना ठोकपीट अपना धंधा कैसे चलेगा,,,,
अरे चचा गांधी जी ने ये थोड़े ही न कहा था कि धंधा मत करो,, घो़ड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या,, सो तुम तो परेशान मत होओ,, धंधा अपनी जगह है,, बिंदास करो,, वैसे भी धंधे के लिए की गई मारपीट हिंसा नहीं होती यह तो कर्तव्य है,,, जो करना ही होगा,
हां,, यह भी ठीक है,, अब बस एक आखरी शंका का समाधान और कर दो,,
वो देखो चचा,, मैं हो रहा हूं लेट, काम का टाइम है,, तुम तो बस इतना करो कि जैसा चल रहा है, वैसा हीचलने दो,, जैसे जी रहे हो वैसे ही जीते रहो,, बस इतना करो कि हर काम से पहले गांधी को याद करो और गांधी बाबा की जय कह कर काम शुरू करो,, आखिर हमारे नेता लोग भी ऐसे ही करते हैं,,
हां, यह ठीक रहा तो आज से हम भी गांधी के फोलोअर हो गए हैं,। अब गांधी का नाम ले कर ब्याज वसूलने निकल पड़ता हूं। तुम भी गांधी को फोलो करो, बहुत बढ़िया रहेगा, बहुत बढ़िया सिद्धान्त है गांधी बाबा के, जय हो महात्मा गांधी की,,,। इतना कह कर उन्होंने फोन काट दिया
हमने भी राहत की सांस ले ,, हे राम कह दफ्तर पर अपनी सीट का रुख किया,,,।

Thursday, October 1, 2009

गांव की सड़क ऐसी क्यों नहीं,,,,

आजादी के बासठ साल बीत गए हैं, और लोगों को अभी भी हालात में कोई अन्तर नहीं लगता। यहां कोटा में आसपास के किसान बिजली की मांग को लेकर एक महापंचायत में शामिल होने आए थे। बात भले ही राजनैतिक थी, लेकिन दर्द राजनीति से परे था। रैली में आए करीब सात आठ हजार किसानों में आक्रोश कूट कूट कर भरा था। उनमें हर उम्र के किसान थे। सबका एक ही स्वर था, ये जो महल यहां बने हैं, जो लाइट के खम्भे यहां लगे हैं, ये बढ़िया सड़क यहां बनी है,, वो हमारे गांव में क्यों नहीं है,, वोट तो हम भी उतना ही देते हैं, जितना ये शहर वाले देते हैं। एक लम्बी दाढ़ी वाले बुजुर्ग करीब ७५ से ज्यादा उम्र के थे,, ( अपनी उम्र के बारे में उनका कहना है कि अंग्रेज गया नीं, जद मूं पूरो मोट्यार छो। ) कहते हैं कि उनके पिता और घर में सबका अन्त तक यही कहना था कि अंग्रेज बहादुर और राज के टाइम में और अब के टाइम में कोई फर्क नी है। टैम वा ई है। कुछ ई कौने बदल्यो। जब मैंने कहा अरे अब तो सबकुछ बदल गया है, आप खुद वोट देकर अपने लोग चुनते हो, वो ही सारी चीजें तय करते हैं, बुजुर्ग एकदम तल्ख अंदाज में कहता है,, कांई बदल्यो बताओ,, और इतना कहते हुए उसने अपना एक और से फटा कुर्ता आगे कर दिया। यो सिलवा खातिर अंजाम कोनी। है कोई जो कैवे के बाबा काल री चिंता मत कर मूं अनाज देवूंला। कोई न देवें। गाम में पटवारी बिंघोटी अर खाता में जो नाप करे वो तो वोई जाणै।,, पंचायत में आने का सबब पूछने पर हरजी कहता है,, देखो ,, नेता जी आया छा बी न कही कि सरकार कुछ तो सुणैगी, सब बात करांगा तो कुछ तो होगो। जी खातिर आया छा। पण मन तो नी लागे सरकार काई सुणैगी। पैली राज के टाइम में पतो तो रहतो छौ की सरकार कुण छे। अब तो पतो ई कौन लागे की सरकार कुण छै, और वो किण तरया सु सुणैली। कोई राज आ जाओ, गांव वाला की तो कोई न सुणे। ,,,
हरजी की इन बातों मे क्या छुपा है, आप खुद अंदाजा लगा लें, सारी बात यूं की यूं आपके लिए पेश है,,