Wednesday, April 8, 2009

जूता प्रूफ प्रेस कॉन्फ्रेंस

चचा हंगामी लाल बहुत चिन्तातुर स्वर मं बोले,, कहां हो लाला,., जरा हमारी सुनो,, ये देखो तुम्हारे बिरादरी भाइयों ने क्या कर दिया।

हम थोड़े सकुचाए से, बोले क्या चचा, जूता पुराण पर कह रहे हो क्या।

हां, और नहीं तो क्या, अब वो जो किए जो किए, पर हमें बड़ी फिकर हो गई है।

काहे चचा आपको किस बात की फिकर।

अरे हम भी तो परसों प्रेस कान्फ्रेंस बुलाए रहे हैं। कोई किसी बात के प्रोटेस्ट में हम पर भी जूता उछाल दिए तो। और फिर ये प्रोटेस्ट का तरीका भी बड़ा शानदार है। पूरी प्रेस मौके पर ही मौजूद, हाथों हाथ ही खबर सबके हाथ। न कोई प्रेस विज्ञप्ति का झंझट और न ही कोई सैटिंग का चक्कर। प्रोटेस्ट एकदम हाईलाइट हो जाता है।

अरे चचा, ऐसे ही न कोई इतना बड़ा प्रोटेस्ट करता है।

तुम्हारी बात में तो दम है। पर मुद्दा भले ही कितना ही संगीन क्यों न हो जूता तो चल ही गया न। जिस पर चला उसका तो बोलो राम हो गया न। अब परसों हमारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चल गया तो। न बाबा न। हम कोई रिस्क नहीं लेंगे। सालों से पाली पोसी इज्जत का एक ही दिन में जनाजा निकल जाएगा। प्रेस कॉन्फ्रेंस कैंसिल। बस कैंसिल।

अरे, ये क्या करते हो चचा। चुनाव नहीं लड़ना क्या। प्रेस को नहीं बुलाओगे। साथ नही बिठाओगे। कुछ सेवा नहीं करोगे। उन्हें अपन दिल की बात नहीं बताओगे तो अपने मतदाताओं तक कैसे पहुंचोगे। कैसे चुनाव जीतोगे। उन्हें कैसे पता चलेगा कि एक हंगामीलाल ही है जो उनके दुख दर्द में काम आएगा।

अरे कौन किस के काम आएगा.. मैं तो मेरे ही काम आ जाऊं जो बहुत।

अरे कहने के लिए,.. चचा कहने के लिए.. जीतने के लिए ऐसा कहना जरूरी होता है। कहने से ज्यादा सब तक पहुंचाना जरूरी होता। इसके लिए प्रेस को भी बुलाना जरूरी होता है। पर तुम घबराओं मत हम कुछ इन्तजाम करते हैं।

क्या करोगे।.

न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी वाला फार्मुला काम में लेना पड़ेगा। प्रेस कांफ्रेंस वाले रूम में एक बढ़िया कालीन बिछवाकर सबके जूते बाहर ही खुलवा देंगे। जब जूते ही अन्दर नहीं होंगे तो कोई कैसे फैंकेगा।

अरे जूता नहीं तो कोई पैन ही फैंक देगा। तब...

अरे चचा, यह तो मैंने सोचा ही नहीं था। पैन तो फैंका जा सकता है। पैन लाने से किसी को रोका भी नहीं जा सकता। एक काम करते हैं। पैन का भी जुगाड़ करते हें। प्रेस रिलीज सबको पहले ही पकड़ा देंगे और पैन का भी इन्तजाम कर लेंगे।

बेल्ट का क्या करोगे.. और भी न जाने क्या क्या, फैंक सकते हैं लोग.,. तुम क्या क्या उतरवाओगे..

चचा की इस बात पर हमारी जुबान पर ताला लग गया। हम भी सोचने लगे कि वाकई यदि लोग उतरवाने पर आ गए तो क्या क्या उतरवा सकते हैं।

लेकिन यदि आपके पास कोई जूताप्रूफ प्रेस कान्फ्रेंस करवाने का फार्मुला तो जल्द से जल्द बताना। परसों हमारे चचा की प्रेस कान्फ्रेंस जो है..

Monday, April 6, 2009

वो बे-कार और हम बदहाल

अरे कहां हो बरखुर्दार, तुम लोग क्या-क्या छाप देते हो...!

आवाज सुनते ही हमें यकीन हो गया कि हो न हो चचा हंगामी लाल आज कुछ झुंझलाए हुए हैं और पूरा मीडिया पुराण हम पर ही उतारने वाले हैं, पर वो किस खबर को लेकर लाल-पीले हो रहे थे, इस उत्सुकता से भरे हम उनकी और देखने लगे।

अब देखो.. तुमने छापा,, राहुल बे-कार,,, । अरे भाई लाखों दिलों पर राज करने वाला बेकार कैसे हो सकता है। वो तो निहायत ही काम का आदमी है बेकार होओगे तुम लोग जो उसे एक कार नहीं होने पर ही बे-कार करार दे रहे हो। अरे अभी तो उसकी परख भी नहीं हुई है। पहले जांचों परखो फिर कहो..।

अरे चचा काहे परेशान हो रहे हो वो तो जरा ऐसे ही तुकबंदी मिलाने के लिए लिख दिए थे पर आप परेशान क्यों हो रहे हो। वो बे-कार . कारदार हो आपको क्या,,,।

अरे वाह, मुझे कुछ कैसे नहीं। अब तुम मीडिया वाले तो चटखारे तलाशते हो, राहुल के पास यूं तो करोड़ों रुपए की सम्पति है पर तुम्हें उसका बेकार होना ही खबरगार लगा। वो एक और करोड़पति है जिसके पास कोई पुरानी खटारा है जिसे तुमने जम कर छापा साढ़े सात हजार की फिएट पद्ममिनी कार। तुमको तो कुछ चटखारा चाहिए, सो ठीक है पर हमें फिक्र अपनी है.. हमारी पोल खुलेगी तब तो तुम लोग हमारी तो कुछ भी इज्जत नहीं रखोगे। हमें एक लाइन भी नहीं दोगे।

देंगे कैसे नहीं, चचा तुम्हें भी पार्टी का टिकट मिला है। तुम शपथ पत्र भरो हम लिखेंगे, हंगामी के पास सवा सौ की साइकिल।,,

यही तो अफसोस है, तुम यह नहीं लिख सकते,... क्योंकि यह साइकिल तो हमारे पिता जी की है.. जो अभी गांव में हैं। इस हिसाब से यह उनकी सम्पति हुई।

ओ.. , चलो कोई बात नहीं तुम कुछ तो भरो हम उसी हिसाब से कुछ न कुछ जुगाड़ लगाएंगे और तुम्हें भी खबर लायक बनाएंगे।

अरे नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या, अब देखो हमारा घर, जिस में हम रहते हैं, वो हमारा नहीं है, किराए का है,. पिता जी ने किराए पर लिया..रिटायर हो कर वो तो गांव चले गए और हम यहीं रहते रह गए। पता नहीं किसका है, लेकिन हम रहते हैं तो हमारा ही है,, पर तुम तो जानते हो कि इसका जिक्र तो हम संपत्ति में नहीं कर सकते हैं न...भले ही यह शहर के बीचोंबीच है,., कोई बता रहा था, करोड़ों का है..। रही बात टीवी, कम्प्यूटर, सोफे और भी न जाने क्या क्या की तो वो सब हमारी धर्मपत्नी लाईं थीं। सो वो भी उनका है।

चचा कोई बात नहीं बैंक में एफ डी वगैराह तो होगी..

हां, है तो सही पर इनकम टैक्स वालों के चक्कर में सब रामलाल के नाम पर करवा रखी हैं।

ये रामलाल कौन है,., पहले कभी नाम नहीं सुना।

गांव में हमारे यहां खेत पर काम करता है। वो तो उसके नाम से मैं ही अंगूठा लगा देता हूं। उसे क्या पता।

अरे चचा तुम्हारे नाम जो खाता है.. जिसमें तुम्हारी तनख्वाह आती है.,वो तो होगा ,. उसमें कितने पैसे हैं,.,.

उसमें 323 रुपए हैं।

वाह चचा बस बन गया काम.,., तुम फिकर मत करो तुम्हारी वह झांकी जमेगी की दुनिया देखेगी...

हैडिंग होगा..

बदहाल हंगामीलाल के पास 323 रुपए

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Saturday, March 28, 2009

अध्यक्ष जी की दिलेरी और लोकसभा का टिकट

हमें अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था।पर चचा थे कि हंस हंस कर हमें बताए जा रहे थे।

अरे भइया, तुम नहीं मान रहे थे कि हमें लोकसभा का टिकट मिल जाएगा। देखो मिल गया।

और हम उनके दिखाए अखबार में भारत जनसहयोग पार्टी के लोकसभा उम्मीदवारों की सूची में हंगामीलाल नाम देख कर दंग रह गए थे।

चचा ये हंगामी लाल कोई और होगा। तुम्हारा राजनीति से क्या लेना देना।ये पार्टी वाले तुम्हें क्यों कर टिकट देने लग गए।

अरे मैं ही हूं भाई मानो। अच्छा तुम नहीं मानते तो मत मानो। मैं तो कल ही अपने चुनाव क्षेत्र में जा रहा हूं, प्रचार करने। वैसे यदि तुम वहां किसी को जानते हो तो बताओ। मैं तो वहां पहली बार ही जाउंगा, हालांकि मेरे लकड़दादा जिस गांव में रहते थे वह वहीं कहीं था, लेकिन मुझे तो गांव के नाम के अलावा कुछ भी नहीं पता।

अरे चचा जान पहचान का क्या वो तो पार्टी वाले होंगे न वो तो तुम्हें जानते ही होंगे।

अरे कैसी पार्टी, किसकी पार्टी। मैं तो वहां किसी पार्टी वाले को भी नहीं जानता। मैं भी उनसे पहली बार ही मिलूंगा।

अरे.. न पार्टी वाले तुम्हें जानते हैं, न तुम क्षेत्र में किसी को जानते हो, फिर कैसे वहां चुनाव लड़ने जा रहे हो? अरे तुम्हें टिकट किस ने दे दिया?

टिकट कैसे नहीं देते तुम्हें तो पता है यहां आने से पहले मैं अहमदाबाद में रहता था। अब पार्टी के अध्यक्ष जी तब अहमदाबाद आए हुए थे। उस दौरान हर कोई उन्हें अपने यहां ठहराने से बिदक रहा था। बिचारे जैसे तैसे पार्टी कार्यालय में दिन काट रहे थे। मैंने उनके बारे में अखबार में पढ़ा तो पता चला कि वो अपने ही यहां के निकले। बस मैंने कहा कि चलो यार परदेस में अपने देस का कोई मिला है तो मिल आऊं। वहां जब उनकी हालत देखी तो उन्हें अपने साथ रहने ले आया। तब कुछ दिन वो मेरे साथ रहे थे। अभी जब लोकसभा-लोकसभा सुना और देखा की कोई भी कहीं भी चुनाव लड़ रहा है। जीत रहा है। तो अपन ने भी सोचा की एक बार भाग्य आजमा लिया जाए। बैठे बैठे बोर हो रहे हैं, चल कर चुनाव ही लड़ लें। जीते तो पौ बारह, हारे तो अपने पास क्या है जो कोई ले जाएगा। सो इसी चक्कर में पिछले दिनों अध्यक्ष जी से मिल कर उन्हें पुराने दिन याद दिला दिए। पर कहना पड़ेगा ये अध्यक्ष भाईसाहब हैं दिलेर आदमी। वर्ना आजकल की दुनिया में कौन किस को याद रखता है। लेकिन उन्होंने सब याद रखते हुए टिकट दे दिया।

... सारी बात सुन कर हमें भी लगा कि चचा को चुनाव लड़ ही लेना चाहिए। क्या हुआ जो उन्हें उनके क्षेत्र में कोई नहीं जानता। क्या हुआ जो वे वहां पैराशूट से उतरेंगे। क्या हुआ जो वहां किसी कार्यकर्ता को टिकट देने की बजाय पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया। अब तो पार्टी के लिए दरी बिछाने और उठाने वालों का फर्ज बनाता ही है कि पार्टी ने एक बार जिसे भी भेज दिया उसे जिताएं। और यदि चचा जीत गए तो अपनी तो पांच उंगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में होगा। हम भी सांसद के खास होंगे।,, इतना सब सोचते सोचते हमारे मुंह से निकला.. हां चचा वाकई तुम्हारे अध्यक्ष जी हैं तो दिलेर आदमी....।

Saturday, March 21, 2009

यह पहल लोकतंत्र को मजबूत करेगी

कांग्रेस ने बिहार की 37 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। उसकी यह पहल लोकतंत्र को मजबूत करने वाली साबित हो सकती है। आखिर उत्तर प्रदेश और बिहार हिन्दुस्तान के दो बड़े राज्य हैं जो लोकसभा में एक बहुत बड़ा प्रतिनिधित्व रखते हैं। यहां कांग्रेस के मजबूत होने से कालान्तर में द्विदलीय व्यस्था को मजबूती मिलेगी। और तीसरे मोर्चे के दलों का अस्तित्व कुछ सिमटेगा। जिससे लोकतंत्र में ब्लैकमेल करने वाली ताकतों की ताकत कुछ कमजोर होगी। हो सकता है इस पहल का फायदा अभी कांग्रेस को नहीं हो लेकिन बाद में उसे इसका फायदा जरूर मिलेगा। और कुछ नहीं तो कांग्रेस को इन जगहों पर अपना कार्यकर्ता आधार ही मजबूत करने का मौका मिलेगा।

चुनाव के खेल में अलगाव का जहर

चाचा हंगामी लाल का पिछले कई दिनों से कोई संदेश नहीं था। जाहिर है हमें उनकी चिन्ता होनी थी सो हुई। दफ्तर की व्यस्तताओँ के बीच आज कल करते करते आखिर हमने थोड़ा वक्त निकाला और पहुंच गए उनके घर। मन में घबराए हुए तमाम आशंकाओं को साथ हमने घर की कुण्डी खटखटाई तो, आवाज आई, दरवाजा खुला है, आ जाओ। अन्दर पहुंच कर पाया कि चचा बिल्कुल मजे से टीवी के सामने डटे हुए थे और टीवी पर खबर चल रही थी, वरूण को अग्रिम जमानत...। उन्होंने हमें देखते ही कहा., आओ बर्खुरदार क्या हाल हैं, आखिर हमारी याद आ ही गई। क्या चचा तबियत तो ठीक है। अरे हमारी तबियत का क्या वो तो बिल्कुल ठीकठाक है। इन दिनों बस अरूण-वरूण के हंगामे के चलते जरा टीवी से फुर्सत नहीं मिल रही है। अरे आपको ये अरूण वरूण से क्या लेना देना। अरे लेना देना कैसे नहीं। अरुण की तो फिर भी जाने दो पर वरूण की तो बिल्कुल घर की सी बात है। संजय का खून हमारा कुछ कैसे नहीं लगेगा। बिचारा अकेला पांडव है। आखिर उसका भी तो कुछ हक बनता है राज पर। खैर यह तो उसकी बात है पर हम तो खुद ही बड़े परेशान हैं कल ही सामने वाले ने हमें धमकी दे दी थी कि वह हमें किसी चक्कर में उलझाएगा। हमने तो बस कुछ अपने चौतरें पर खड़े हो कर यही कहा था कि जो भी हमारा दुश्मन हो उसे कीड़े पड़ें लेकिन सामने वाले को क्या सूझा की अपने पूरे कुनबे को लेकर हमें घेर लिया। सब मिल कर कहने लगे हमने उनका ही नहीं उनके पूरे खानदान का अपमान कर दिया औऱ उन्हें बद्दुआ दी है। जिसके लिए हमें खमियाजा भुगतना पड़ेग। इतना ही नहीं चार कोस दूर रहने वाले हमारे भाई के घर पर भी कुछ लोग पहुंच गए, जिन्हें न तो हमारा भाई जानता है और न ही हम, सबकी एक ही रटन्त थी कि हमने उन्हें बद्दुआ दी है। बस इसी मारे हम घर में घुसे बैठे हैं। बाहर निकले कहीं कुछ बोला किसी ने कुछ समझा तो आफत गले पड़ी समझो। इसलिए हमने तो घर में ही रहने में भलाई समझी है। सो दिल लगाने के लिए टीवी देखने लगे तो पता चला कि बिचारा अकेला पांडव भी इसी चक्कर में उलझा पड़ा है। उसका कहना है कि उसने तो किसी के खिलाफ कुछ नहीं कहा। बस अपनी कौम की बहबूदी की दुआ की थी, लेकिन लोगों का क्या जो इसे अपने ऊपर ले बैठे। खैर देखें क्या होता है। जो भी होगा ठीक ही होगा। कोई हमें भी घर से बाहर खुली हवा में सांस लेने का मौका जरूर देगा। हम चुपचाप सकपकाए से चचा का मुंह देख रहे थे कि बाहर शोर उभरा। यहीं हैं, वो यहीं रहता है, उसी ने कहा है, ,,. चचा ने कहा लो फिर आ गए तुम यहां से सरक लो जब माहौल ठण्डा होगा मैं खुद ही तुम्हारे पास आ जाऊंगा। पर ऐसा कब होगा। जल्द ही बस चुनाव निपट जाए फिर तो पूरा मोहल्ला एक होगा। न वो अलग होंगे न मैं अलग होऊंगा। बस चुनाव तक अलगाव रहेगा। मैंने कहा तो चचा ये चुनाव चुनाव खेलना बंद करो। कम से कम आपसी रिश्तों में जहर तो नहीं घुलेगा। इतना कह हम वहां से निकल लिए।....

Monday, March 2, 2009

सोश्यल इंजिनियरिंग की जादूगरी

चचा हंगामीलाल शाम को ही घर पधार गए। आते ही बोले क्या बरखुरदार तुम्हारी जात क्या है जरा बताओ तो सही। सवाल जबरदस्त था और उससे भी जबरदस्त था हमारा रेस्पोंस, क्यों चचा लड़की ब्याहनी है क्या, हमारी तो पहले ही शादी हो चुकी है तुम्हें पता नहीं है क्या। अरे वो तो मुझे पता है वैसे भी अब लड़की ब्याहने के लिए जात बिरादरी देखने की उतनी जरूरत नहीं रह गई है। वो क्या है न कि चुनावी सीजन सामने है और तुम्हारी जात ठीक ठाक हो तो कुछ जुगाड़ बैठ सकता है। इन दिनों जादूगर मुखिया जाति का करिश्मा दिखाने में ही जुटे हैं। सोच रहे हैं कुछ जात का गणित बैठ जाए तो बड़ी पंचायत में कुछ जादू चल जाए। अच्छा, पर तुम्हें क्या पता कि जादूगर जी जात का पासा फेंक कर जीत की राह पर चलने की सोच रहे हैं। अरे यह तो कोई बच्चा भी समझ जाएगा। जादूगर जी ने जब अपने सहायक चुने तो हर कोई एक समाज विशेष का था और तो और जो उनमें से कोई भला मानुष अपने नाम के पीछे जाति नहीं लगाता था तो विशेष तौर पर उसकी जाति के बारे में सबको बताया गया था। नौ जने थे सूबे की नौ ख़ास जातियों से। अच्छा ऐसा क्या, अरे हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या। अब सरकारी मशीनरी के मुखिया की ही बात कर लो कौन जानता था कि जिन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति जमीनों के मुकदमों की सुनवाई करते ही हो जाना तय मान लिया था उन्हें ही सरकारी अमले की कमान सौंप दी जाएगी। अब कौन नहीं जानता कि वे जमीन की बेटी होने के कारण ही इस जगह पहुंची और ताबड़तोड़ चार घण्टे में सूबे के सरकारी अमले की सरताज हो गईं। दो ही घण्टे बाद उनके दरबार के दरबारियों के बढ़ने की खबरें आ गई। और सुबह जो दस नए दरबारी हुए उनमें भी कहीं न कहीं सोश्यल इंजिनियरिंग की जादूगरी साफ दिख रही थी। और सबसे बड़ा खेल तो तब हुआ जब बिना फायरिंग ही सूबे के पुलिस कप्तान फायर हो गए और नए कप्तान आ गए। अब चचा को झटका देने की बारी हमारी थी। हां चचा जभी आज के अखबारों में कल की खबर को लेकर परोसा गया है कि जब जादूगर सूबे के घर की देखरेख करते थे तब ही पहली बार जमीन के बेटे को सूबे की कप्तानी सौंपी गई थी। चचा बोले, हां बेटा अब सब समझ गए लगते हो। सारा खेल चुनाव का है दरअसल जादूगर जी के बारे जमीन से जुड़े लोगों का सोचना है कि जब उन्होंने पहली बार सूबे की कमान संभाली थी तब जमीन से जुड़े एक धरतीपुत्र का दावा था लेकिन पता नहीं क्या खेल हुआ। धरती पुत्र के जबरदस्त बीमार होने की बात उड़ी और कमान जादूगर जी के हाथ रही। सो वे जमीन वाले हमेशा इन्हें हक छीनने वाले के रूप में ही देखते हैं। पर जादूगर जी ऐसा नहीं सोचते हैं इसीलिए तो छोटे धरतीपुत्र को अपने साथ ले कर सूबे की प्यास बुझाने का जिम्मा दे रखा है, और अब सारा सरकारी अमला जमीन की बेटी के हवाले किया है। तो ये तो रही राज की बात अब तुम बताओ की तुम्हारी जाति का कुछ गणित हो तो बैठाएँ। चचा यही तो रोना है, ये जाति का चक्कर हमारे चलाए तो चलता ही नहीं । हम ठहरे सरस्वती की जात वाले, यदि सरस्वती पुत्रों के लिए कोई चक्कर चलता हो तो जरूर चलाओ ताकि हम भी बहती गंगा में पवित्र हो जाएँ।

Thursday, February 26, 2009

बिस्तर पर सुख की नींद का फार्मुला

चचा हंगामी लाल कुछ उदास लग रहे थे। मैंने कहा चचा क्या हुआ आज मुंह क्यों लटका है। ये रोनी सी सूरत क्यों बना रखी है। अरे क्या मुंह लटकाएं अब इस आजाद देश में चैन की नींद सोना भी गुनाह हो गया है। कोई सुख से चैन की नींद सोने की जुगत करे तो उसे जेल पहुंचाने की तैयारियां होनी शुरू हो जाती हैं। चाचा की बात सुनते ही हमारी खोपड़ी घूम गई, सिर भन्ना गया। अरे ऐसा कैसे कह रहे हो। ऐसा भी कहीं होता है। क्या हो गया। चचा बोले अब देखो भाई सुखीराम ने चैन की नींद सोने का ही जुगाड़ तो किया था। सब मिल कर पीछे पड़ गए। मुझे एक बात बताओ, तुम भी तो सोने के लिए डनलप का गद्दा इस्तेमाल करते हो। करते हो न। अब यदि सुखीराम ने सोने के लिए नोटबेड का इस्तेमाल कर लिया तो क्या गलत किया। भाई ये उसकी मजबूरी हो गई थी क्या करता गद्दे के नीचे नोट बिछाए बिना उसे नींद ही नहीं आती थी। और तुमने उसी को मुद्दा बना दिया। हम कहे, पर वो तो इधर-उधर का पैसा था। उसका अपना थोड़े ही था। अरे अपना कैसे नहीं था। अच्छा बताओ उसने पैसा कैसे बनाया। ठेकेदार से ही तो लिया था। तो इसमें क्या गलत किया। मुझे तो एक मेरे परिचित बता रहे थे कि ये तो ठेके के क्लॉज में ही शामिल होता है। तीन से छह प्रतिशत का तो अनलिखा कानून होता है। अब उसने अपना हिस्सा ही तो लिया था। बस उसकी गलती थी तो इतनी की उसने सुख की नींद के लिए उनका बिस्तर बिछा लिया। यदि वो उसे स्विट्जरलैण्ड के बैंक में भेज देता तो कुछ नहीं होता। कोई नहीं बोलता, क्योंकि जो बोल रहे हैं उनके भी दामन साफ नहीं हैं। ... और फिर वो तो जिस कुनबे में रहता था वहां तो हर कोई नोटप्रेमी ही था। मुखिया तक नोट के बल पर राज चला रहे थे। उनका तो कुछ हुआ नहीं बस फंस गया ये बिचारा चैन की नींद सोने का जतन करने वाला। मैंने कहा, पर इससे तुम्हें क्या फर्क पड़ता है। सुखीराम चाहे सोए या चारे की रेल में सफर कर सबको मैनेजमेंट का पाठ पढ़ाए तुम क्यों परेशान हो रहे हो। चचा बोले, अरे वाह अजीब अहमक हो मैं क्यों परेशान नहीं होऊँ। आज सुबह से ही परेशान हूं। मेरी भी तकिए के नीचे पैसे रखकर सोने की आदत है। कभी किसी ने पकड़ लिया तो। कल ही रात सोते समय जेब में पड़ी रेजगारी तकिए के नीचे रख सो गया था। जरा देर में ही सपना आया की सब तरफ लोग खड़े धिक्कार रहे हैं। तुरन्त नीदं खुल गई एक एक सिक्का टटोलकर हटाया। फिर भी सारी रात नींद नहीं आई। चचा की बात में दम था, हम भी कभी कभार पर्स सिरहाने रख सो जाया करते थे। सो चिंता होना जायज था। मैंने कहा चचा एक बात बताओ ये जब सुखीराम के बिस्तर से नोटों का गद्दा बरामद हुआ था तब जो कोतवाल था वो तो उसका रिश्तेदार था न फिर कैसे फंस गया। अरे वही तो गड़बड़ हो गई उस दौरान कुछ तनातनी सा माहौल चल रहा था। मैंने कहा तो तुम चिन्ता मत करो अपने इलाके का कोतवाल अपना पक्का यार है। कुछ उससे पंगा नहीं पड़ने देंगे। वह दिन रात कहेगा तो रात कहेंगे। तुम मस्त हो कर तकिए के, गद्दे के नीचे मर्जी आए जितने सिक्के रख कर सोओ, (नोट रखने की अपनी हैसियत नहीं है) जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का। एक सुखीराम के पकड़े जाने से कुछ नहीं होता यहां तो हर शाख पर सुखीराम हैं जिनके घोंसले नोटों से भरे पड़े हैं।

Wednesday, February 25, 2009

सवाल एक लाख का, जवाब अगली पोस्ट में

आज तो गजब हो गया। चाचा हंगामी लाल सुबह सबेरे ही आ धमके। मैंने उन्हें देखा तो समझा शायद अखबार लेने आए होंगे सो मैंने सारे अखबार उनकी तरफ सरका दिए पर ये क्या उन्होंने अखबारों की तरफ हाथ भी नहीं बढ़ाया। और बोले भइया वो जरा रिमोट देना। मैंने कहा क्यों क्या हो गया ? तो कहने लगे भाई बड़े गजब के आदमी हो, क्या इतना भी नहीं जानते की आज हमारी जय हो होने वाली है। मैंने कहा चचा आपको कैसे पता कि हमारी ही जय हो होगी। शर्तिया हमारी ही जय हो होगी। देख लेना । मैने कहा अच्छा तुम्हें क्या ऑस्कर वालों का फोन आया है जो इतने कॉन्फिडेन्स से कह रहे हो। ऑस्कर वालों का तो नहीं लेकिन यहां के मल्टीप्लेक्स और टीवी चैनल वालों का फोन जरूर आया था। कह रहे थे कि हॉलीवुड के फिल्म प्रोड्युसरों की नजर यहां के मल्टीप्लेक्स पर और टीवी स्क्रीन पर है। उन्हें भरोसा है कि उनकी फिल्मों को यहां देखने वाले मिल जाएंगे। यहां के लोग वहां की फिल्म नहीं देखेंगे तो यहां के विषय औऱ हालात को घोट घाट कर कुछ बनाएंगे जो कमाल कर जाएगा। मैंने कहा चचा फिर भी इतना कॉन्फीडेंस क्यों। तो कहने लगे कल रात स्टीवन स्पीलबर्ग सपने में आए रहे । कहने लगे चाचा मंदी की मार बहुत पड़ रही है। क्या करें कैसे उभरे। फिल्म तो बना देते हैं पर कारोबार नहीं हो रहा। कुछ उपाय बताओ, तो हम कहे देखो इसका बहुत आसान सा रामबाण नुस्खा है, तुम विदेशी सौदागरों को तो पहले से ही पता भी है कि संसार में कुछ कमाने के लिए कुछ बेचना है तो हिन्दुस्तान में बेचो। जम के कमाई होगी। वहां सब केवल खरीदने वाले ही मिलते हैं। अभी कुछ साल पहले तुम लोग ऐसा ही एक चमत्कार कर भी चुके हो। लाइन से सुन्दरियों की लाइन लगा दी थी। नतीजा तुम्हारे ही सामने है वहां का कॉस्मेटिक बजार भारत के भरोसे कुलांचे भरने लगा था। अब फिर से यही चमत्कार दोहराओ। उनकी समझ बात आ गई होगी तो अभी कुछ ही देर में जय हो का नारा बुलन्द हो ही जाएगा। चचा की बात कुछ मेरी भी समझ में आने लगी थी। पांच सात फिल्मों को सही रेस्पोन्स मिल गया तो समझो उनकी लॉटरी लग गई। टीवी पर चलीं तो विज्ञापन का बजट मिल जाएगा। चलो कुछ भी हमारी तो जय हो ही जाएगी। हम यही सोचे बैठे चाय के घूंट लगा रहे थे की चचा हंगामी लाल ने सवाल उछाल दिया, बच्चू तुम्हारे लिए सीधे ही लाख रुपए का सवाल है- जरा जवाब देना

भारत यदि हॉलीवुड का बाजार बन गया तो क्या होगा

  1. बॉलीवुड के फिल्मकार मौलिक हो जाएंगे, क्योंकि वो जहां से आइडिया चुराते थे वो ही उनके कॉम्पीटिशन में होंगे
  2. हमारे शाहरुख और सलमान की सिक्स पैक बढ़कर ट्वेल्व पैक हो जाएगी और वो पचपन साल में भी हीरो बने दिखेंगे (वहां तो ऐसा ही होता है)
  3. हमारे सेंसर बोर्ड की जरूरत ही खत्म हो जाएगी क्योंकि सेंसर बोर्ड भी आखिर कितनी कैंची चलाएगा
  4. हमारी अंग्रेजी सुधर जाएगी

सही जवाब देने वाले इनामी राशि के चैक के बारे में अगली पोस्ट के बाद ही पता चल पाएगा। मैं भी इस सवाल के जवाब देने की गुत्थी सुलझाने में जुटा हूं आपको जवाब सूझे या कोई और ऑप्शन सूझे जरूर बताएं।

Tuesday, December 16, 2008

हार का हार किसके गले में

ज़माने की दोपहर हो चली थी और हमारी सुबह। अख़बारों का जायजा लिया जा चुका था। चाय का दौर चल रहा था। अचानक गेट का दरवाजा खुला और चाचा हंगामी लाल दनदनाते हुए घुसे चले आए। उनका चेहरा थोड़ा तमतमाया सा लग रहा था. मैंने कहा, चचा क्या बात है, काहे गर्म हुए जा रहे हो।
अरे यार क्या बताये हम हार ले कर घूम रहे हैं पर कोई मिल ही नही रहा जिसको पहनाएं।
हमने कहा ये क्या बात हुई चच्चा, ऐसे कोई क्यो पहनेगा और फ़िर ये तो बताओ की ये हार है किसका, किस लिए पहनाना चाहते हो ?
अरे ये भी कोई बात हुई भला। हार तो हार है, फ़िर भी जानने को इतना ही बेताब हो तो सुनो की ये है हार का हार । भगवा वालों की सूबे में हार हुई है सो उनके ही नाप का लाया था। खास भगवा फूल भी गुथवाए थे । पर ये तो हद ही हो गई माला पहनने के आदी गले अब इधर का रुख ही नहीं कर रहे। बात में मुझे भी दम लगा। अब हार आ गया है तो पहनाया ही जाएगा। पर चच्चा को इसे लाने की क्या सूझी!
क्या चाचा तुम काहे लाये ?
हम थोड़े ही लाने वाले थे , वो तो सूबे के भगवा अध्यक्ष जी खुद ही बोले । हम हार का विश्लेषण किया हूँ । हमें ही हार पहनाये जायें। पद मुक्त समझा जाए। सो ले आए हम ये हार और लगे पहनाने। पर अब उनके सिपहसलार कहते है, अरे हार उन्हें नही महारानी को पहनाओ आख़िर ज़ंग के सारे सैनिक तो उन्ही के थे। हम कहे वो तो ठीक है भइया फ़िर ये पद मुक्ति का राग क्यों ? वो बोले ऐसा ही होता है। यही दस्तूर है।
उनके दस्तूर के चक्कर में पैसे हमारे ठुक गए। सोचा चलो जिसके सैनिक लड़े उन की देहरी पर सजदा कर उन्हें हार पहनाये। पर वहां गए तो पता चला की वे खुद किसी और ही हार की तलाश में दिल्ली के मंदिरों में धोक लगा रही हैं । और तो और उनके भी दरबारी कम नही थे हाथ में हार देखते ही सारा माजरा समझ गए , तुंरत कह उठे देखो भाई, महारानी जी ने तो पहले ही कह दिया था की सैनिक तो मैदान में लड़ रहे हैं पर सेनाओ का प्रबंध ठीक नही हुआ तो आपकी आप जानो । वोही हुआ महारानी के चुने सनिक तो मैदान जीत गए। हारने वाले क्यों हारे , किसने किसको हराया ? आप ख़ुद ही देख लो। रही बात जिम्मेदारी की तो वो अभी भी हार पहनने के ही चक्कर में डेरा डाले हुए है। सो जो ख़ुद ही हार पहनने की कतार में हो वो पराजय की जिम्मेदारी का हार क्या पहनेगा । सो हम वंहा से भी निकल लिए । कुछ आगे ही गए थे की रास्ते में कुछ लोग मिल गए कहने लगे भाई माला लाये हो तो वापस मत ले जाओ कुछ लोग हैं जो सबका दुःख दर्द बांटते हैं स्वयम आगे बढ़ कर सेवा करते हैं । इस बार भी उन्होंने खूब सेवा की है , उन्हें ही जाकर उनके भवन में ये हार पहना दो । हम वंहा चले गए । लेकिन उनका तो तर्क ही जोरदार था, कहने लगे चचा ये जो राजनीति है , इस से हमारा कोई लेना देना नहीं है । हम तो केवल संगठन और सेवा का काम करते है। माला - वाला से भी हमें कोई मतलब नही है। सो आपकी माला आप ही जानो। तो भतीजे अब ये रही माला तुम ही बताओ इसका क्या करूं....?
कुछ देर सोचने के बाद मैने कहा, चचा एक बात बताओ ये हराने- जिताने का काम कौन करता है ...?
जनता .. न....?
हां,, !
.....और तुम भी तो जनता हो, सो ऐसा करो की ये हार का हार तुम ही पहनो। जीत का हार पहनने वाले तो बहुत मिल जायेंगे पर हार का हार तो जनता को ही पहनना होगा।

होम लोन- मन्दी की अनोखी मंडी

लीजिये जनाब एक बार फ़िर से होम लोन की मण्डी सज गई है। प्रोपर्टी बाज़ार के सूरमाओं की बांछे खिल गई हैं। , हमारा इतना कहना था की चाचा हंगामी लाल एकदम से बिगड़ पड़े, कहने लगे तुम को तो हर बात मैं राजनीति ही दिखाई पड़ती हैं। अब यदि कर्जा सस्ता हुआ हैं, गरीब को घर मिल रहा हैं, तो तुम्हारे पेट में क्यों बल पड़ रहे हैं, काहे इसे मण्डी कह रहे हो?
हम कहे चाचा , बात ग़रीब या अमीर की नही हैं, सरकार की भी नही हैं, है तो बस प्रोपर्टी बाज़ार के मदारियों की हैं, उनकी डुगडुगी बजेगी और नौकरीपेशा गरीब मारा जाएगा, बैंक वाले मिल कर ताली बजायेंगे।
पाँच साल पहले भी ऐसी ही मण्डी सजी थी, खूब कर्जा सस्ता हुआ था। चौदह से सात फीसदी तक गिर गया था, हर कोई खोमचा लगाये आवाज लगा रहा था मकान ले लो, मकान लेलो और अपने पीछे एक रहाडी पर कर्ज बांटने वाले बैंक के मेनेजर को बिठाये हुए हाथों हाथ नए मकान को गिरवी रखवाने का पूरा प्रबंध किए रहता था। तब लोंगो ने खूब जम के मकान खरीदे । मकान थे की कम नही पड़ते थे बस दाम जरा बढ़ जाते तो बैंक वाले लोन अमाउंट बढ़ा देते और कहते की ई ऍम आई में कुछ सौ रुपये बढ़ जायेंगे बस। सो लोग लगे बड़े और ऊंचे, बढ़िया मकान खरीदने। बेचने वाले तो बेच गए। उल्टा सीधा सब ठेल गए। कुछ खुद रखा कुछ अपने राजनेतिक आकाओं को खिला गए और पार्टी में बढ़िया ओहदा पा गए । पीछे बच गए किराये की रकम में अपने घर का सपना साकार करने वाले लेनदार और उम्रभर किराये के रूप में सूद पाने वाले देनदार।
इतनी बात सुन चाचा से रहा नही गया फ़िर लपक कर बोले देखो ये किरायेदार पुराण हमें मत सुनाओ , मुझे तो बस इतना बताओ की इस सबसे तुम्हारे पेट में क्यों दर्द उठ रहा हैं?
चाचा पहले पूरी बात सुनो, फ़िर कुछ कहना , चलो एक बात बताओ, तुम अभी किराए के मकान में रहते हो?
हाँ।
कितना किराया देते हो?
दो हजार
मान लो तुम्हारा मकान मालिक किराया बढ़ा दे तो ? तीन हज़ार कर दे तो?
में तो मकान बदल लूँगा। तीन हज़ार कोई मेरे जैसा आदमी दे सकता हैं, बच्चों की फीस कंहासे लाऊँगा?ना बाबा न मकान बदलना ही भला।
सही कह रहे हो चाचा तुम तो मकान बदल लोगे पर ये बैंक के किरायेदार और अपन घर के मालिक तो मकान भी नही बदल सकते। समझे ?
सही कह रहे हो। पर फिर भी?
क्या फिर भी? ये बैंक वाले जब चाहे तब कोई न कोई बहाना बना कर ब्याज बढ़ा देते हैं। अब ये जो नया पासा फेंका हैं, सरकार के दबाव में तो इससे पुराने कर्जदारों को तो कुछ मिलना नही हैं, इन्हे लूटने के लिए नए कर्जदार और मिल जायेंगे । मंदी के नाम पर मण्डी का खेल हो रहा हैं। बैंक और बिल्डर चोक छक्के मारेंगे और हम तुम बाउंड्री लाइन के बाहर से बोल ला ला कर देंगे ।
अब के चचा बोले, बात तो तुम्हारी दमदार हैं भतीजे, लेकिन इंसान बेचारा क्या करे सपनो को हकीक़त में बदलते हुए ठगा रह जाना उसका मुकद्दर हैं।

Tuesday, December 2, 2008

शोर थमा अब जोर से चुनो

लो थम गया चुनाव का शोर। भाषण का जोर। भाषाओँ का सभ्य असभ्य आक्रमण । विकास से भ्रष्टाचार तक पाँव रखने और हाथ थामने का दौर। जादू के जोर से वोट की बोट तैराने का करिश्मा । नेताओ की फौज और कार्यकर्ताओं का टोटा । बगावत के सुर और मान मनोवल के बोल। पुराणी पंगत और पुराने ही जीमनखोर। अख़बारों की कतरन और नारों की खबरें। सामंतवाद और आतंकवाद का राग। राम और रहीम की दुहाई। गरीब की जोरू सबकी भोजाई । यानी चुनाव प्रचार के इन दिनों में वो सब था जो आम चुनाव में होता है, बस नही था तो लोगों में जोश नही था। प्रचार थम गया जो कभी परवान ही नही चढा था। अशोक के पराक्रम से वसुंधरा के शौर्य तक । इन चुनावों में कुछ भी नया नही था। कोई मुद्दा नही था। कोई लहर नही थी। है तो बस वोट डालने की मजबूरी । हिन्दुस्तानी होने के नाते वोट डालना है ये जरूरी है ,, पर किसे और क्यों डालें इसका कोई जवाब नही है। सो रस्म अदायगी के इस फेर में किसी न किसी की लोटरी खुलेगी । कोई जीतेगा कोई हारेगा । सब किस्मत होगा । जो जीतेगा वो बोलेगा में इसलिए जीता वो इसलिए हारा ,,,, पर हकीक़त तो इतनी ही है की सब किस्मत है ॥ जो जीतेगा वोही जीतेगा । दोनों ही दलों की सत्ता संगठन को मानाने से इंकार कराती है और संघठन है की अपनी चाल से चलता है। तो मानिये की देश के भाग की तरह हमरे राज के भाग भी किस को रजा और किस को रंक बनते है इसके बटन भले ही परसों दबंगेपर कोई इस मुगालते मैं नही रहे की उसका बटन कोई फ़ैसला करेगा। हम तो नही कर रहे पर आप भी मत नही करना।

Saturday, November 29, 2008

धमाका.. धमाका.. धमाका.. धमाका

धमाका.. धमाका.. धमाका.. धमाका .. मुंबई में एक और धमाका ..
अब तक का सबसे बड़ा धमाका.,,
१५० मर गए ,,
सवा तीन सौ घायल हो गए,,
५१ घंटों तक मुंबई में गोलियां गूंजती रहीं ...
पुलिस - सेना - कमांडो सभी ने मिल कर इतना बड़ा हमला नाकाम कर दिया,, चंद लोगों ने पूरा मुंबई जाम कर दिया ,, देश को हिला दिया,, राजनेता हिल गए .,., प्रधानमंत्री संतरी और तमाम जीव जंतरी सभी हिल गए ,,, अब दो -तीन दिन तक हिलते ही रहेंगे ,, बस दो दिन , तीन दिन । बहुत हुआ तो चार दिन हिल लेंगे। देश विदेश के अख़बारों की सुर्खियों पर मुंबई २६ /११ छाया रहेगा,, सरकार के बयान आ गए हैं, और आ जायेंगे ,,, ।
राजनेता अपना काम यानि राजनीती कर रहे हैं , राजनीती नही करने की अपील के साथ, ,,, आतंकी को बख्शा नही जाएगा ,, दुनिया के किसी भी कोने में हो हम नही छोडेंगे ...आतंक का मुहँ तोड़ जवाब देंगे,, (पहले आतंकी को ढूंढ तो लो ) जब हो जाएगा उसे पकड़ लेंगे तो पक्की कारवाई करेंगे ... लेकिन इन सब में एक ही अड़चन है,, पुलिस है, पर कडा कानून नही है,, और कडा कानून हम बना नही सकते ,,, क्योंकि हमारी सरकार का मानना है की कोई भी कडा कानून मानवाधिकारों का हनन हो सकता है,, आप भले ही कहते रहिये की जो मरे हैं उनका भी मानवाधिकार है पर ,,, होता होगा,, मानवाधिकार तो वोटाधिकार से तय होता है। आप जितने बड़े वोट बैंक ....... आपका मानवाधिकार भी उतना ही बड़ा ,,, तो कुल मिला कर आप यह समझ लो की जो कानून है वो तो यही रहेगा,, अब आप इस कानून में कुछ कर सकते हो, उखाड़ सकते हो तो उखाड़ लो ,,। लेकिन हमारे जांबांज पुलिस वालों का क्या कीजिये जो तमाम प्रेशर में भी कुछ कर जाते है आतंक के गुरु को पकड़ लेते हैं । पर वो क्या कहते हैं न की हमारे तो संविधान मैं ही लिखा है की सौ दोषी भले छूट जायें पर एक निर्दोष नही मरना चाहिए सो हम, सो निर्दोषों के खून के बाद भी एक दोषी को बचाने में जुटे रहते हैं ।
अब मुंबई के बाद भी यही होगा। ,, हमारे रहनुमा इसी प्रकार गाल बजा बजा कर बयान देंगे और हमारे पर हुकुम चलते रहेंगे ,। हम मन में सोचेंगे अबकी बार चुनाव आने दो । इन्होने नहीं किया तो हम ही कुछ करेंगे । पर
हम इन्हे ही चुनेगे ,, क्योंकि इनकी पार्टी इन्हे ही टिकेट देगी। हम वोट भी देंगे और गाली भी देंगे ,, पर नाग नाथ या सांपनाथ में से किसी एक को ही चुनेंगे,, । ये हमें कानून की सीख देंगे ,, एकजुट होने को कहेंगे । पर होगा क्या । हम यूँ ही मरेंगे । इस तंत्र मैं यही होना है। कोई निजात नही है। शायद सब नही जानते की क्यों मुंबई ओपरेशन इतना लंबा खिंचा । अन्दर जो बंधक थे वो वो कौन थे जरा नाम सामने आने दीजिये सब सामने आ जयेगा,, । पर हाँ अब इस तंत्र पर ,,शमा चाहूँगा भीड़तंत्र पर भरोसा नही रहा । क्या वाकई ऐ वेडनस डे जैसी बेबसी हो गई लगती है,,, । बस ज्यादा कुछ नही लिखा जा रहा ,, अब कोई तारतम्यता नही बची है बैठना भी नही है,, पर कोई तो समझाओ भाई हमारे वोट लेते हो तो हमारी सुरक्षा भी करो । क्या हमने अपना इंतजाम ख़ुद ही करना होगा ???????

Monday, October 27, 2008

सुनो, बाजार कह रहा है, दीपावली आ गई है


लो जी एक बार फिर करीब तीन सौ साठ (कुछ कम या ज्यादा हो सकते हैं) दिन बाद दीपावली एक बार फिर से आ गई है। महंगाई की आंधी के बीच मंदी के दियों में जल रहा बोनस का तेल कब तक उल्लास के दीपक को जलाए रख पाएगा सबको बस यही इन्तजार है। आप और हम भले ही इस मंदी औऱ महंगाई के दोहरे दैत्य से घबरा रहे हों लेकिन बाजार इस बार राम बना बैठा है और ठान चुका है कि इन दोनों दैत्यों का संहार कर के ही दम लेगा। ऑफर के न्यौतों से सजा धजा बाजार ग्राहकों का इन्तजार कर रहा है। ग्राहक भी तैयार हो कर बाजार जा रहा है। सब कुछ देख रहा है, परख रहा है,पर खरीद कुछ नहीं पा रहा। बोनस का तेल तो पूजा और मिठाई के दिये जलाने में ही खर्च जो हो गया है। आम आदमी की तो क्या कहिए जब बड़ी कंपनियां अपनी स्थापित परंपराओं से पीछे हट रही हैं। कम्पनियां केवल बोनस दे कर ही दीपावली शुभ हो कह रही हैं। लेकिन आप चिन्ता नहीं करें आप घर नहीं सजा सकते कोई बात नहीं बाजार सज रहा है। आप वहां जाइए शौक से घूमिए चमक दमक और रौनक का अहसास करिए जम कर पटाखों की आवाज सुनिए, बच्चों को भी सुनाइए। और दीपावली मनाइये। एक खबर में पढ़ा था इस बार बाजार की बिक्री घटी है और विंडो शॉपिंग करने वालों की तादात बढ़ी है। विग्यापन बाजार में खींच तो सकते हैं पर कुछ खरिदवा नहीं सकते। तो अपना तो सारे प्रसून जोशियों और पीयूष पाण्डेयों से यही कहना है कि भाई अब ऐसा विग्यापन बनाओ जो खरीदने की इच्छा के साथ ही ताकत भी दे। हमारी तो भगवान से यही प्राथॆना है कि वह सभी को खरीदने की ताकत बक्शे ताकि वे तन के साथ ही मन से भी दीपावली शुभ हो कह सकें। अन्ततः एक बार फिर से दीपावली शुभ हो।