आजकल पता नहीं क्या हो रहा है कि चचा हंगामी लाल जब भी मिलते हैं, उदास ही मिलते
हैं, आज ही शाम की बात ले लो, सुबह तो बड़े उत्साह से बोले थे कि भतीजे आज जा रहा हूं
जरा कुछ देख कर आता हूं साहित्य का कुछ मजमा चल रहा है शहर में, वहां जरा कुछ भाई लोग
आए हुए हैं उनसे बतिया कर आता हूं। सो हम तो शाम को उनसे बहुत सारी दुनिया भर की बातें
सुनने की उम्मीद लगाए बैठे थे। लेकिन ये क्या शाम को जब आए तो सुबह सूरजमुखी सा खिला
चेहरा शाम को डाल से टूटे पत्ते की तरह मुरझाया हुआ था। हमारी सवालिया नजरों को ताड़
कर बिना कुछ पूछे ही वे बोलना शुरू हो गए।
भतीजे का बताएं तुमको, आज हम तो बहुत अरमान से गए थे कि अपने पुराने यार लोग आए हुए हैं
उनसे गप करेंगे, कुछ कविता की बात होगी, कुछ गजल की। कुछ किस्से सुनेंगे कुछ कहानी कहेंगे।
बड़ी मुश्किल से तो हम जैसे तैसे उस मजमे में अन्दर घुस पाए, लेकिन घुसने से पहले ही हमें लग
गया था कि आज कुछ शगुन ठीक नहीं लग रहे। पता चला वहां कोई वीसी उसी होने वाली
जिसमें कोई अपनी बात कहना चाह रहा था, पर कुछ लोग चाह रहे थे कि वो अपनी बात नहीं
बोले, ...। हम तो जैसे तैसे बचते बचाते अन्दर पहुंचे और अपने मित्रों को ढूंढने में लग गए। एक
आध मिला भी, पर किसी का भी मिजाज कुछ जमता नहीं लग रहा था। जरा कुरेद कर पता
किया तो सबके मन में एक ही सवाल गूंज रहा था क्या वाकई हिन्दुस्तान में इसे ही आजादी
कहते हैं। सरकारें ऐसे ही संविधान के रक्षा करती हैं। उसकी पालना करती हैं। अरे भाई जो
चीज प्रतिबंधित है वो वाकई प्रतिबंधित है उस पर कोई बोले तो जो जायज हो वो कार्रवाई
करो, कानून में गलती है तो माननी ही पड़ेगी। अब जो कहें कि कानून ने गलत रोक लगाई है
तो उसका भी निस्तार है,, गुहार लगाओ,, भाई लोग लगा भी रहे हैं,,,। जो कहते हैं कानून
सही है और उसकी पालना हो, तो यह भी ठीक है,, । कानून का पालन तो होना ही
चाहिए। जहां कुछ गलत लगे वहीं रोक दो।
हमने कहा चचा, सरकार ने, इस मजमे ने जमाने वालों ने सबने कुछ सोच कर ही सारा मामला
जमाया होगा,,हालात देखे होंगे तभी तो फैसला किया होगा?
कहते तो तुम ठीक हो भतीजे, हमने वहां लोगों को यही समझाया, अरे भाई जो टीवी पर दिख
रहा है, सैंकड़ो किलोमीटर दूर बैठा है, बात की बात में, भावावेश में कुछ ऐसा ही कह बैठे जो
यहां के कानून की सीमा से परे हो तो, अंजाम तो इस मजमे को ही भुगतना पड़ेगा ना। बताओ
तो सही कितनी मेहनत करके वो तीनों ने ये महफिल जमाई है, सालों लगे हैं, कई विवाद आए,
कई गए। पर वो कहते हैं न शो मस्ट गो ऑन की तईं। नमिता बेन, संजोय बाबू और वो
विलियम ने मिलकर एक एक सितारा इस ओढ़नी पर काढ़ा है। हमारी बात से कुछ विलियम भाई
भी मुतमईन थे, कहने लगे हंगामीलाल जी, हमारे लिए तो इस मेले को चलाए रखना महत्वपूर्ण
है, मेला रहेगा तो बात रहेगी, आप चाहे कुछ भी कह दो, भले ही कितना ही गरिया लो पर
एक बात तो मानते हो न कि बच्चों को कुछ किताबों का शौक लगा है, कुछ तो वो साहित्य
की बात कर रहे हैं, कुछ नए लोगों को मंच मिला है, कईयों की किताबें बिकी हैं, कईयों को
मीडिया ने तरजीह दी है, आखिर कुछ तो फायदा हुआ या नहीं।
भतीजे मुझे विलियम की बात में दम लगता है, तुम भी तो जयपुर के वाशिंदे हो तुम को क्या
लगता है.
देखो चचा अपन तो शुरु से ही कहते हैं कि ऐसे मेले ठेले ही गुलाबीनगर की शान हैं, हम तो शुरु
से ही आवो नी पधारो म्हारे देस के संस्कृति के लोग रहे हैं, पावणों को स्वागत करना ही
हमारी परम्परा है। मैं तो कहता हूं जो भी हो विवादों पर मिट्टी डालो और ऐसे आयोजनों के
लिए जुटे रहे हो।
सही कह रहे हो भतीजे, मैं भी तुम्हारी बात से सहमत हूं, मैं तो जरा यूं ही दिन बेकार हो
जाने से उदास हो रहा था, पर तुमसे बात करके सारी उदासी दूर हो गई।
अभिवर्ल्ड
साइबर स्पेस में मेरी दुनिया
Tuesday, January 24, 2012
Thursday, January 19, 2012
क्या चुनाव ऐसे होते हैं?
ढ़आज चचा हंगामी लाल बहुत दिन बाद नजर आए थे। पर उनके चेहरे पर वो चमक नहीं थी जो
आम तौर इस ऋतु में होती है।आप यकीन मानिए मैं शीत ऋतु में चाची के हाथ के गोंद के लड्डू
खाने के बाद आने वाली चमक की बात नहीं कर रहा। दरअसल उनकी चमक का मौसम से कोई
ताल्लुक नहीं है पर हां फिजाओं से है। फिजा में जब भी चुनावी रंग नुमाया होता है हमारे चचा
की चमक एकाएक बढ़ जाती है। पर इस बार उनके चेहरे से चमक देख हमें बड़ी चिन्ता हुई। बड़ी
बेकरारी से हमने पूछ ही लिया.. चचा क्या बात है आपके फेवरेट सूबे में सियासी जंग चल रही है
पर आप पर तो असर ही नहीं।
इतना कहते ही जैसे मानो मैंने बर्र के छत्ते को छेड़ दिया हो, चाचा बौराए से बोले,,
बरखुरदार क्यों मजे ले रहे हो,, ये भी कोई चुनाव हैं,, मजाक है मजाक,...। अरे क्या ऐसे ही
चुनाव देखने के लिए इतना इन्तजार कर रहे थे.. बताओ,,, तो जरा,, तुम को भी इस सियासी
जंग का इंतजार था या नहीं,,, । बताओ बताओ,,।
अरे चचा बिल्कुल था, भला होता भी क्यों नहीं, पर ऐसा क्या हो गया जो तुम इतना परेशान हो।
अरे क्या हो गया..? कुछ नहीं हो रहा इसी बात का रोना है। न कोई किसी को कुछ कह
रहा है , न कोई किसी पर तंज कस रहा है। अरे यूं लखनवी तहजीब के साथ भी कभी वहां
चुनाव हुए हैं। वो तो भला हो वो चुनाव आयोग वालों का जो हाथियों पर पर्दा डलवा कर
थोड़ा सा रंग भर दिया वरना तो कुछ भी बाकी नहीं रहता। अब तुम ही बताओ वो राहुल और
उमा तो बुआ भतीजे हो गए। कैसे काम चलेगा,, अरे रिश्तेदारी निभाओगे या चुनाव लड़ोगे। न
माया कुछ बोल रहीं हैं न मुलायम कुछ तेवर दिखा रहे हैं। युवराजों की आपसी लड़ाई भी बहुत
सभ्य हो गई है। सारे इतिहास पे बट्टा लग जाएगा इस बार के चुनाव में। बताओ तो,, और तुम
कहते हो चिन्ता काहे कर रहे हो,,,। तुम ही बोलो क्या वाकई में चुनाव ऐसे होते हैं,, ।
चचा की बात सुन कर हम तो वाकई सोच में पड़े हुए हैं,, कि क्या वाकई चुनाव ऐसे होते हैं,,
आप क्या कहते हैं,,,?
आम तौर इस ऋतु में होती है।आप यकीन मानिए मैं शीत ऋतु में चाची के हाथ के गोंद के लड्डू
खाने के बाद आने वाली चमक की बात नहीं कर रहा। दरअसल उनकी चमक का मौसम से कोई
ताल्लुक नहीं है पर हां फिजाओं से है। फिजा में जब भी चुनावी रंग नुमाया होता है हमारे चचा
की चमक एकाएक बढ़ जाती है। पर इस बार उनके चेहरे से चमक देख हमें बड़ी चिन्ता हुई। बड़ी
बेकरारी से हमने पूछ ही लिया.. चचा क्या बात है आपके फेवरेट सूबे में सियासी जंग चल रही है
पर आप पर तो असर ही नहीं।
इतना कहते ही जैसे मानो मैंने बर्र के छत्ते को छेड़ दिया हो, चाचा बौराए से बोले,,
बरखुरदार क्यों मजे ले रहे हो,, ये भी कोई चुनाव हैं,, मजाक है मजाक,...। अरे क्या ऐसे ही
चुनाव देखने के लिए इतना इन्तजार कर रहे थे.. बताओ,,, तो जरा,, तुम को भी इस सियासी
जंग का इंतजार था या नहीं,,, । बताओ बताओ,,।
अरे चचा बिल्कुल था, भला होता भी क्यों नहीं, पर ऐसा क्या हो गया जो तुम इतना परेशान हो।
अरे क्या हो गया..? कुछ नहीं हो रहा इसी बात का रोना है। न कोई किसी को कुछ कह
रहा है , न कोई किसी पर तंज कस रहा है। अरे यूं लखनवी तहजीब के साथ भी कभी वहां
चुनाव हुए हैं। वो तो भला हो वो चुनाव आयोग वालों का जो हाथियों पर पर्दा डलवा कर
थोड़ा सा रंग भर दिया वरना तो कुछ भी बाकी नहीं रहता। अब तुम ही बताओ वो राहुल और
उमा तो बुआ भतीजे हो गए। कैसे काम चलेगा,, अरे रिश्तेदारी निभाओगे या चुनाव लड़ोगे। न
माया कुछ बोल रहीं हैं न मुलायम कुछ तेवर दिखा रहे हैं। युवराजों की आपसी लड़ाई भी बहुत
सभ्य हो गई है। सारे इतिहास पे बट्टा लग जाएगा इस बार के चुनाव में। बताओ तो,, और तुम
कहते हो चिन्ता काहे कर रहे हो,,,। तुम ही बोलो क्या वाकई में चुनाव ऐसे होते हैं,, ।
चचा की बात सुन कर हम तो वाकई सोच में पड़े हुए हैं,, कि क्या वाकई चुनाव ऐसे होते हैं,,
आप क्या कहते हैं,,,?
Wednesday, January 11, 2012
हांगकांग के एक संगठन ने भारतीय ब्यूरोक्रे"सी को ए"शिया में अक्शमतम बताया
Sunday, November 27, 2011
शहर, शहरी और सरकार
पिछले करीब दस साल से इस गुलाबी नगर कहलाने वाले शहर में अपना ठिकाना है।
अब तो इस शहर से बेइंतहा प्यार हो गया है। इतिहास और अखबार इसे लगातार
सुनियोजित नगर नियोजन की परम्परा वाला बताते रहे हों पर हमें तो ये
परम्पराएं परकोटे की गुलाबी दीवारों से आगे कहीं नजर नहीं आईं। पर इतना
ही दिल को सूकून देने के लिए बहुत है। आखिर यहां कुछ तो गुलाबी रंग मौजू
है वरना जमाने की गुलाबियत तो कालिख में बदल गई है। दो साल पहले शहर में
बहुत शोर हुआ था। सबने कहा था इतिहास बदलने वाला है। शहर ने अपना रहनुमा
खुद चुना है। पूरे शहर ने मिलकर एक के हाथ में कमान सौंप दी है। लॉटरी से
यह तय हो गया था कि वो कोई महिला ही होगी। वैसे चाहे महिला हो या पुरुष
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बड़ी उम्मीदों से कुछ बदलने के अरमान हर शहरी
ने सजाए थे। हम भी उन्हीं में से थे। लेकिन बदला जरूर और वो भी एक बार
नहीं पांच बार पर वो था शहरी सरकार की नौकरशाही का मुखिया। जिस बादशाह को
वजीरों से काम लेना था वह अपने ही वजीरों से उलझ पड़ा। रही सही कसर बोर्ड
में कांग्रेस और भाजपा के संख्याबल ने पूरी कर दी। मानो पार्षद चुने जाना
उनके लिए कुछ मायने ही नहीं रखता। इससे ज्यादा वे कांग्रेस और भाजपा के
सिपाही हो गए। जिस अमले को शहर का ख्याल करना था वो आपस में ही ऐसा उलझा
का पूरा शहर इस सरकार के सर्कस को दम साधे देखता रहा। शहरवासियों के लिए
इससे बड़ी पीड़ा क्या हो सकती थी कि उनके रखरखाव के इंतजामों की चिता पर
ही यह पूरा खेल हो रहा है। दो साल में शहर के लिए कुछ भी तो ऐसा नहीं हुआ
जिसे लेकर इनकी कुछ प्रशंसा की जाए। कुछ भी तो नहीं है दो साल की
उपलब्धि। एक भी नवाचार नहीं। जरा भी पहल नहीं। शहर सड़ रहा है। सड़कें
टूटी हैं। बाजारों में धक्कमपेल है। गलियों, कॉलोनियों में अतिक्रमण हैं।
परकोटे के मकानों में बने अवैध गोदाम लोगों की जान को जोखिम में डाले हुए
हैं। पार्किंग की कमी से लगते जाम अनमोल समय को कुंभकर्णी भूख के समान पी
रहे हैं। क्या इसी लिए चुना था इन्हें। साधारण सभा की बैठकों में
विधानसभा जैसे नजारे हो गए। क्या क्या नहीं हुआ। धक्का मुक्की में महिला
पार्षद की साड़ी तक फट गई। यह वक्त की खासियत है कि वह किसी का इन्तजार
नहीं करता। दो साल गुजर गए, तीन भी गुजर जाएंगे। यह इस शहर की तासीर है
कि यह अपना अंदाज और बदनुमा नहीं होने देता। आप चाहे इसकी सुध लो या
नहीं। यह अपनी गति से आप ही अपना शोधन करता चलता है। पर हां वो पर्याप्त
है या नहीं यह दूसरी बात है। यदि इस शहरी सरकार के नुमाइंदों ने अब भी
अपने रंग ढंग नहीं सुधारे और शहर की सुध नहीं ली तो और कुछ हो या नहीं हो
एक अभिनव प्रयोग जिससे हम लोकतांत्रिक सुधारों की ओर बढ़ रहे थे, पर जरूर
प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। जो लोग सक्षम होते हुए भी, इस निरंकुशता पर अंकुश
नहीं लगा रहे हैं, यदि वे यह सोचते हों कि उनकी या बड़ी सरकार की इस छोटी
सरकार ऐसे कामकाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है तो इतिहास लिखेगा उनका भी
इतिहास जो तटस्थ रहे........।
अब तो इस शहर से बेइंतहा प्यार हो गया है। इतिहास और अखबार इसे लगातार
सुनियोजित नगर नियोजन की परम्परा वाला बताते रहे हों पर हमें तो ये
परम्पराएं परकोटे की गुलाबी दीवारों से आगे कहीं नजर नहीं आईं। पर इतना
ही दिल को सूकून देने के लिए बहुत है। आखिर यहां कुछ तो गुलाबी रंग मौजू
है वरना जमाने की गुलाबियत तो कालिख में बदल गई है। दो साल पहले शहर में
बहुत शोर हुआ था। सबने कहा था इतिहास बदलने वाला है। शहर ने अपना रहनुमा
खुद चुना है। पूरे शहर ने मिलकर एक के हाथ में कमान सौंप दी है। लॉटरी से
यह तय हो गया था कि वो कोई महिला ही होगी। वैसे चाहे महिला हो या पुरुष
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बड़ी उम्मीदों से कुछ बदलने के अरमान हर शहरी
ने सजाए थे। हम भी उन्हीं में से थे। लेकिन बदला जरूर और वो भी एक बार
नहीं पांच बार पर वो था शहरी सरकार की नौकरशाही का मुखिया। जिस बादशाह को
वजीरों से काम लेना था वह अपने ही वजीरों से उलझ पड़ा। रही सही कसर बोर्ड
में कांग्रेस और भाजपा के संख्याबल ने पूरी कर दी। मानो पार्षद चुने जाना
उनके लिए कुछ मायने ही नहीं रखता। इससे ज्यादा वे कांग्रेस और भाजपा के
सिपाही हो गए। जिस अमले को शहर का ख्याल करना था वो आपस में ही ऐसा उलझा
का पूरा शहर इस सरकार के सर्कस को दम साधे देखता रहा। शहरवासियों के लिए
इससे बड़ी पीड़ा क्या हो सकती थी कि उनके रखरखाव के इंतजामों की चिता पर
ही यह पूरा खेल हो रहा है। दो साल में शहर के लिए कुछ भी तो ऐसा नहीं हुआ
जिसे लेकर इनकी कुछ प्रशंसा की जाए। कुछ भी तो नहीं है दो साल की
उपलब्धि। एक भी नवाचार नहीं। जरा भी पहल नहीं। शहर सड़ रहा है। सड़कें
टूटी हैं। बाजारों में धक्कमपेल है। गलियों, कॉलोनियों में अतिक्रमण हैं।
परकोटे के मकानों में बने अवैध गोदाम लोगों की जान को जोखिम में डाले हुए
हैं। पार्किंग की कमी से लगते जाम अनमोल समय को कुंभकर्णी भूख के समान पी
रहे हैं। क्या इसी लिए चुना था इन्हें। साधारण सभा की बैठकों में
विधानसभा जैसे नजारे हो गए। क्या क्या नहीं हुआ। धक्का मुक्की में महिला
पार्षद की साड़ी तक फट गई। यह वक्त की खासियत है कि वह किसी का इन्तजार
नहीं करता। दो साल गुजर गए, तीन भी गुजर जाएंगे। यह इस शहर की तासीर है
कि यह अपना अंदाज और बदनुमा नहीं होने देता। आप चाहे इसकी सुध लो या
नहीं। यह अपनी गति से आप ही अपना शोधन करता चलता है। पर हां वो पर्याप्त
है या नहीं यह दूसरी बात है। यदि इस शहरी सरकार के नुमाइंदों ने अब भी
अपने रंग ढंग नहीं सुधारे और शहर की सुध नहीं ली तो और कुछ हो या नहीं हो
एक अभिनव प्रयोग जिससे हम लोकतांत्रिक सुधारों की ओर बढ़ रहे थे, पर जरूर
प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। जो लोग सक्षम होते हुए भी, इस निरंकुशता पर अंकुश
नहीं लगा रहे हैं, यदि वे यह सोचते हों कि उनकी या बड़ी सरकार की इस छोटी
सरकार ऐसे कामकाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है तो इतिहास लिखेगा उनका भी
इतिहास जो तटस्थ रहे........।
Wednesday, November 23, 2011
प्रेस, कॉरपोरेट और काटजू
आम तौर पर लोगों को सुर्खियों में बनाए रखने वाला मीडिया इन दिनों खुद
सुर्खियों में है। वजह है प्रेस काउंसिल के नए मुखिया मार्कण्डेय काटजू
की ओर प्रेस के स्वेच्छाचार पर उठाई अंगुली। काटजू का इशारा खास तौर पर
इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ओर है। प्रेस का दावा है कि वे स्वयं ही
स्वनियंत्रण की ओर बढ़ रहे हैं और उन्होंने आईबीए के बैनर तले इस तरह की
कवायद शुरू भी कर दी है। वे इसका उदाहरण भी देते हैं। लेकिन यह बहस नई
नहीं है और बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही है। सबको अपने कर्तव्य का भान
करवाने वाला स्वयं क्यों निरंकुश हो जाए। जब हर कोई किसी न किसी नियामक
के अधीन है तो फिर प्रेस को भी नियामक के अधीन क्यों नहीं होना चाहिए।
खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। हम जब तब देखते रहते हैं तमाम तरह की
स्टोरियां महज सनसनी बनाने के लिए तरह तरह के साउण्ड और विजुअल इफेक्ट के
साथ पेश की जाती हैं। मीडिया में से इन्फोर्मेशन गायब हो गई है और
एंटरटेनमेंट बढ़ गया है। ऐसे में काटजू की शिकायत समीचीन पड़ती है क्यों
नहीं सबकी खबर रखने वाला मीडिया भी अपने किए कहे पर जवाबदेह रहे।
सुर्खियों में है। वजह है प्रेस काउंसिल के नए मुखिया मार्कण्डेय काटजू
की ओर प्रेस के स्वेच्छाचार पर उठाई अंगुली। काटजू का इशारा खास तौर पर
इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ओर है। प्रेस का दावा है कि वे स्वयं ही
स्वनियंत्रण की ओर बढ़ रहे हैं और उन्होंने आईबीए के बैनर तले इस तरह की
कवायद शुरू भी कर दी है। वे इसका उदाहरण भी देते हैं। लेकिन यह बहस नई
नहीं है और बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही है। सबको अपने कर्तव्य का भान
करवाने वाला स्वयं क्यों निरंकुश हो जाए। जब हर कोई किसी न किसी नियामक
के अधीन है तो फिर प्रेस को भी नियामक के अधीन क्यों नहीं होना चाहिए।
खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। हम जब तब देखते रहते हैं तमाम तरह की
स्टोरियां महज सनसनी बनाने के लिए तरह तरह के साउण्ड और विजुअल इफेक्ट के
साथ पेश की जाती हैं। मीडिया में से इन्फोर्मेशन गायब हो गई है और
एंटरटेनमेंट बढ़ गया है। ऐसे में काटजू की शिकायत समीचीन पड़ती है क्यों
नहीं सबकी खबर रखने वाला मीडिया भी अपने किए कहे पर जवाबदेह रहे।
Tuesday, August 16, 2011
लोकतंत्र, भ्रष्टाचार का संरक्षक या उन्मूलक
पैंसठवा पड़ाव किसी भी जीवन में एक अहम पड़ाव होता है,सामान्यतौर पर यह जीवन पर पुनःदृष्टिपात कर जीवन में अर्जित अनुभव से समाज को लाभान्वित करने के क्रम में एक मील का पत्थर माना जाता है। स्वाधीन भारत ने भी कल इस पड़ाव में कदम रखा है,लेकिन जीवन की धारणाओं के विपरीत लोकतंत्र के जीवन में यह पड़ाव परिपक्वता की दृष्टि से अहम बनता जा रहा है। अन्ना हजारे जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। उनके प्रखर आंदोलन के तेज तले खुद को अंधकार में पा रही देश की सरकार को उन्हें संतुष्ट करने का उपाय नजर नहीं आ रहा है,नतीजतन एक बार फिर वह कांग्रेस की परिपाटियों के अनुसार दमन की नीति पर चल पड़ी है और उसने अन्ना व उसके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया है। जब भारत की राष्ट्रपति भ्रष्टाचार को कैंसर बता चुकी हों और प्रधानमंत्री स्वंय लाल किल्रे की प्राचीर से यह स्वीकार चुके हों कि सरकारी योजनाओं का पैसा बाबुओं अधिकारियों की जेब में जा रहा है,सरकारी ठेके गलत लोगों को गलत तरीके से दिए जा रहे हैं तो ऐसे में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने का उपाय लेकर जो भी जनता के सामने आएगा उसे जननेतृत्वकारी बनने से कोई नहीं रोक सकता। फिर चाहे वो अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव हों। इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना की गिरफ्तारी देश में बड़ी उथल पुथल मचाएगी। सवाल उठता है इस उथलपुथल को न्यौतने जरूरत क्यों कर पड़ गई। जहां हम यह दावा करते हैं कि हमारी संसद जनमत की अभिव्यक्ति है और वहां पारित होने वाले कानून जनता की सार्वभौमिक स्वीकृति से पारित होते हैं तो फिर जो काम हमारे सांसदों को करना चाहिए वह करने की जरुरत किसी और को क्यों। क्यों हमारे संसद अपने उद्देश्यों में ही विफल हो रही है। मैं यहां अन्ना के जनलोकपाल के पक्ष या विपक्ष में अपनी बात नहीं रख रहा हूं, मैं जरा तंत्र की स्थिति पर बात कर रहा हूं, अन्ना अकेले नहीं हैं जो संसद पर एक बिल को हू बहू पारित करने का दबाव बना रहे हैं, अन्ना के अलावा एक और समूह भी है जिसे लगता है कि वो भी देश को कानूनों का मसौदा दे सकता है, और वह समूह है एनएसी के प्रगतिशील विचारक।जो मनमाने तरीके मनमानी व्याख्याओं के साथ नए मसविदे प्रस्तुत कर रहे हैं। जहां एक ओर अन्ना के साथ जनबल की ताकत है, वहीं दूसरी ओर एनएसी के साथ सत्ता बल की ताकत है। पर सवाल यह है कि अन्ना और एनएसी को यह आवश्यकता क्यों पड़ रही है है जो काम सांसदों का है जिसे सदन के अन्दर होना चाहिए वह सदन के बाहर करें।
असल में हमारी व्यवस्था में सबसे बड़ी खामी है सांसद का अपनी पार्टीलाइन में बंधे रहने की अनिवार्यता, इसी वजह से अपने क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद निर्वाचित सांसद को सदन में वही कहना और करना होता है जो उसकी पार्टी के चंद हुक्मरान तय करते हैं, और सीधे तौर पर इसमें कहीं भी जनमत नहीं होता बल्कि यह तो चंदमत होता है, पर व्यवस्था ऐसी है कि हम इसी चंदमत को जनमत मानने पर विवश हैं। इसी वजह से अन्ना के प्रस्ताव के समर्थन में इतनी जनअभिव्यक्ति होने के बावजूद जनलोकपाल संसद का मुंह देख पाने से वंचित है जबकि वहीं दूसरी और चंदमत के आशीर्वाद के चलते एनएसी की ओर से प्रस्तावित लक्षित हिंसा के नाम पर बनाए जाने वाले मसौदे को सरकार कानूनी जामा पहनाने की पूरी तैयारी में है।
कांग्रेस अन्ना को चुनौती देती है कि वे कहीं से चुनाव लड़कर आएं। हमारी व्यवस्था में यदि अन्ना चुनकर आ भी गए तो क्या कर लेंगे।संसद में एक निर्दलीय सांसद की क्या हैसियत होती है,,,। यदि कोई व्यक्तिगत बिल ले भी आया गया तो पार्टी व्हिप जारी कर उस बिल के परखच्चे उड़ा दिए जाएंगे। क्या कांग्रेस यही चुनौती एनएसी के उन विचारकों को भी दे सकती है जो कि कांग्रेस के शब्दों में कानून बनाने का शौक रखते हैं,,,।
बहरहाल अन्ना गिरफ्तार हो चुके हैं, जनमानस अवाक है,, देखें वक्त किस करवट लेता है.....पर एक बात तय है कि यह मुद्दा तय कर देगा कि लोकतंत्र,भ्रष्टाचार का संरक्षक है या उन्मूलक
असल में हमारी व्यवस्था में सबसे बड़ी खामी है सांसद का अपनी पार्टीलाइन में बंधे रहने की अनिवार्यता, इसी वजह से अपने क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करने के बावजूद निर्वाचित सांसद को सदन में वही कहना और करना होता है जो उसकी पार्टी के चंद हुक्मरान तय करते हैं, और सीधे तौर पर इसमें कहीं भी जनमत नहीं होता बल्कि यह तो चंदमत होता है, पर व्यवस्था ऐसी है कि हम इसी चंदमत को जनमत मानने पर विवश हैं। इसी वजह से अन्ना के प्रस्ताव के समर्थन में इतनी जनअभिव्यक्ति होने के बावजूद जनलोकपाल संसद का मुंह देख पाने से वंचित है जबकि वहीं दूसरी और चंदमत के आशीर्वाद के चलते एनएसी की ओर से प्रस्तावित लक्षित हिंसा के नाम पर बनाए जाने वाले मसौदे को सरकार कानूनी जामा पहनाने की पूरी तैयारी में है।
कांग्रेस अन्ना को चुनौती देती है कि वे कहीं से चुनाव लड़कर आएं। हमारी व्यवस्था में यदि अन्ना चुनकर आ भी गए तो क्या कर लेंगे।संसद में एक निर्दलीय सांसद की क्या हैसियत होती है,,,। यदि कोई व्यक्तिगत बिल ले भी आया गया तो पार्टी व्हिप जारी कर उस बिल के परखच्चे उड़ा दिए जाएंगे। क्या कांग्रेस यही चुनौती एनएसी के उन विचारकों को भी दे सकती है जो कि कांग्रेस के शब्दों में कानून बनाने का शौक रखते हैं,,,।
बहरहाल अन्ना गिरफ्तार हो चुके हैं, जनमानस अवाक है,, देखें वक्त किस करवट लेता है.....पर एक बात तय है कि यह मुद्दा तय कर देगा कि लोकतंत्र,भ्रष्टाचार का संरक्षक है या उन्मूलक
Monday, July 18, 2011
कुछ बातें
वो कहते हैं उनकी अदाओं के दीवाने हजार हैं,
पर उन हजारों में हम सा तो कोई दूसरा कहां हैं,
---
डर लगता है तिरी जुल्फों में खो न जाऊं
पर वो घनी छांव फिर कहां से पाऊं
---
बरसों बाद मिलना और मिलकर भी नजरअंदाज करना
तेरी इस फितरत से तो मुश्किल है अब इश्क का जिंदा रहना
------------------
तमाम कोशिशों के बाद मैं उसको मना न पाया
कुछ खोट है इन चाहतों में जो हो रहा है इश्क का नाम जाया
---------------
जिन्दगी की राहों में हर एक को मंजिल की तलाश है
इसी भागमभाग में हर एक कि जिन्दगी उदास है
------------------
जब भी छाती हैं यें घटाएं, बदलियों सी बरसती हैं तेरी यादें,
जिन्दगी की घटाटोप के बीच बिजलियों सी चमकती हैं तेरी बातें
---
जब भी जिक्र होता है मन की गहराईयों में तेरा
आईने में अक्स नजर आ जाता है आज मेरा
----
अब हम जमाने को क्या कहें क्यू आती है तिरी याद
बुझा न सके हम राख के अंगार को लाख कोशिश के बाद
पर उन हजारों में हम सा तो कोई दूसरा कहां हैं,
---
डर लगता है तिरी जुल्फों में खो न जाऊं
पर वो घनी छांव फिर कहां से पाऊं
---
बरसों बाद मिलना और मिलकर भी नजरअंदाज करना
तेरी इस फितरत से तो मुश्किल है अब इश्क का जिंदा रहना
------------------
तमाम कोशिशों के बाद मैं उसको मना न पाया
कुछ खोट है इन चाहतों में जो हो रहा है इश्क का नाम जाया
---------------
जिन्दगी की राहों में हर एक को मंजिल की तलाश है
इसी भागमभाग में हर एक कि जिन्दगी उदास है
------------------
जब भी छाती हैं यें घटाएं, बदलियों सी बरसती हैं तेरी यादें,
जिन्दगी की घटाटोप के बीच बिजलियों सी चमकती हैं तेरी बातें
---
जब भी जिक्र होता है मन की गहराईयों में तेरा
आईने में अक्स नजर आ जाता है आज मेरा
----
अब हम जमाने को क्या कहें क्यू आती है तिरी याद
बुझा न सके हम राख के अंगार को लाख कोशिश के बाद
Wednesday, April 6, 2011
गांधी फिर सत्याग्रह पर हैं,,,
अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। उस भ्रष्टाचार के खिलाफ जो हमारी रगों में बहते खून के विभिन्न अवयवो में समाहित हो गया है। जीवन में भ्रष्ट कोशिकाओं की मात्रा जानने के लिए किसी लेबोरेट्री टेस्ट की जरूरत नहीं है। जहां भी हाथ रख दो वही नब्ज भ्रष्टाचार के पेट्रोल से दौड़ती महसूस होगी। कोशिश करके देखें। तंत्र की इस प्राणवायु के बिना तंत्र निष्प्राण हो जाता है। कोमा में चला जाता है। कैसा भी काम हो भ्रष्टाचार अपने चरम रूप में नजर आएगा। ऐसे में अन्ना हजारे एक मुहीम ले कर निकले हैं। उनका और उनके सहयोगियों का मत है कि लोकपाल विधेयक का उनका प्रारूप भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकता है। उनकी यह धारणा कितनी सही है या समय के साथ सही साबित होगी इस पर बात किए बिना सबसे पहले अन्ना के आंदोलन को समर्थन। आखिर गांधी के देश में एक बार फिर गांधी सड़क पर हैं और इस बार मुकाबला परायों से नहीं अपनों से है। और एक सत्य यह भी है कि यह लड़ाई फैसला करेगी कि लोकतंत्र के इस भीड़तंत्र में क्या वाकई नैतिकता सम्मान के साथ जी सकेगी या बलशालियों की रंगशाला में दरबान बनना ही नैतिकता की किस्मत है। और क्या मांग है अन्ना की। वे किसी भी अमीर उद्योगपति के गैराज में फालतू खड़ी कार तो नहीं मांग रहे ताकि जिंदगी भर बस तक में नहीं बैठ सकने वाला गरीब उस कार के पेट्रोल भर से यात्रा कर सके। या उसके वार्डरोब में जीवन में बस एक बार पहना गया कपड़ा भी नहीं मांग रहे। वे यह भी नहीं कह रहे कि धनपतियों क्यों जरूरत से ज्यादा धन अपनी तिजोरियों में भर कर गरीबों की आंतों को सूखा रहे हो, क्यों उन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होने दे रहे। नहीं वे किसी से भी कुछ नहीं मांग रहे, वे इतना ही तो कह रहे हैं कि भाई गड़बड़ी की जांच कर सके ऐसा तंत्र बना दो। इसमें भी उन्हें एतराज क्यों है। क्यों डरती है सरकार गड़बड़ी की जांच के पारदर्शी तंत्र से। आखिर ये मांग ऐसी तो नहीं तो जिसे पूरा नहीं किया जा सके। या फिर ये इसलिए पूरी नहीं हो सकती क्योंकि इसमें कोई जाति वर्ग का वोट नहीं जुड़ा। इसका समर्थन करने वाले पटरियों पर डेरा नहीं जमा सकते। वो दिल्ली की आपूर्ति ठप नहीं कर सकते। वो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को डसने वाले भ्रष्ट तंत्र पर नकेल कसने के लिए उनकी ही जिंदगी के चक्के को थाम नहीं सकते। तो सरकार और नौकरशाहों को गलतफहमी है कहीं। अन्ना ने सोए हिन्दुस्तान की कुंभकर्णी नींद को तोड़ने का काम कर दिया है। जितना इसे टाला जाएगा उतना लावा जनता के सीने में जमा होता जाएगा। सरकार जागे न जागे हिन्दुस्तान जागने लगा है। देश की कमान थामने वालो को चिंता करनी चाहिए कि कहीं यह लावा जनता के सीने से निकल कर न बहने लगे। अन्ना के रूप में गांधी ने इस देश को फिर से अपना सहारा दिया है।,,,गांधी फिर सत्याग्रह पर हैं,,, देश को फिर आजाद करवाने के लिए जुट जाएं।
Saturday, February 26, 2011
राजस्थान में भाजपा का चेहरा वसुन्धरा
वसुन्धरा राजे ने करीब सवा साल बाद एक बार फिर से औपचारिक तौर पर राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की कमान संभाल ली है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब उन्हें बनाना था, तो उनसे इस्तीफा लिया ही क्यों गया था। दरअसल इसे समझने के लिए हमें जरा बड़े परिदृश्य पर और थोड़ा फ्लैश बैक में जाना होगा। भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में पिछले कुछ सालों से एक अजीब सी उथल पुथल मची हुई है। एकचालकानुवर्तति की धारणा पर चलने वाले संगठन के मार्गदर्शन में पल्लवित पुष्पित हुई इस पार्टी में ही एकचालकानुवर्तति की धारणा के पालन का संकट खड़ा हो गया था । जब तक पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज सक्रिय थे उनका कहा पार्टी में अन्तिम हुआ करता था और अन्य सभी चाहे राजी से या चाहे बेराजी से उन्हीं की बात का अनुसरण करते नजर आते थे। लेकिन उनकी सक्रियता कम होने के साथ ही पार्टी के शीर्ष पर सर्वमान्य नेता की कमी हो गई, और लगभग समान रूप से वरिष्ठों की टोलियों ने अपनी ढपली अपने राग छेड़ने शुरू कर दिए। नेताओं में अहम की लड़ाई उग्रतम रूप में सामने आई, और नतीजे में पार्टी को अपने कई नेता खोने पड़ गए और इस प्रक्रिया में कभी उन नेताओं का अहम् कारण बना तो कहीं शीर्ष पदों पर बैठे लोगों ने अपने अहम के खातिर उनकी बलि ली। इसी दौर में पार्टी ने गोविन्दाचार्य, उमा भारती, जसवंत सिंह जैसे नेता खो दिए तो कई नेता हाशिए पर हो गए। देश प्रदेश की ईकाइयों में आपसी खींचतान ने व्यापक रूप ले लिया क्योंकि कोई ऐसी आवाज नहीं थी तो अति करने वालों को डपट सकती। बहरहाल बहुत दुर्गति के बाद पार्टी में इस बवंडर को थामने की कोशिश हुई और शीर्ष नेतृत्व में बदलाव हुआ। चमत्कार को नमस्कार करने वाली भारतीय जनता को अपनी आदत के अनुसार चमत्कारी परिवर्तन की आस थी, लेकिन ऐसा न होना था न हुआ। और लोग अपने तईं नए नेतृत्व को भी चुका हुआ मान बैठे। लेकिन कहीं कुछ बहुत आहिस्ता आहिस्ता बदल रहा है, और उसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि आलाकमान यह समझने लगा है कि भारतीय राजनीति विचारधारा की नहीं बल्कि व्यक्तित्वों की राजनीति है। ऐसे में जो व्यक्तित्व जनमानस में अपना असर छोड़ते हैं उन्हें साथ लेकर चलने से ही पार्टी खोई रंगत पा सकेगी। कांग्रेस की तरह किसी एक व्यक्ति के पूरे देश में एक समान असर वाले व्यक्तित्व के अभाव में भाजपा को सफल होने के लिए बहुत से व्यक्तित्वों का सफल समीकरण बनाना होगा। और इस सबमें सबसे अहम यह है कि एक प्रभावी और डपट भरी आवाज का पार्टी में अभी अभाव सा ही है। हां एक ऐसी समझ जरूर दिखने लगी है जो गाहे बगाहे सबका समन्वय करती नजर आती है। जसवंत सिंह की पार्टी में वापसी हो या उमा भारती को लेकर बनती अनुकूलता, सब पार्टी के दीर्घावधि फायदे की बात लगते हैं। राजस्थान में वसुन्धरा राजे की वापसी भी इसी कड़ी में एक कदम नजर आता है। प्रदेश भाजपा में यह सर्वविदित है कि यदि कोई पूरे प्रदेश में जननेता है तो वह वसुन्धरा राजे ही है। ऐसे में प्रदेश में पार्टी को उनकी हर हाल में सक्रिय जरूरत है। उनकी निष्क्रियता या पार्टी गतिविधियों से अलग हैं रहने का असर पार्टी की छवि और प्रभाव में साफ नजर आने लगा था, हालांकि संगठन का अपना प्रभाव होने से पार्टी की गतिविधियां सुचारू चलती दिख रही थीं पर पार्टी के कार्यक्रमों की धार गायब थी। मंडल स्तर तक पार्टी संगठनवादियों और वसुंधरा समर्थकों में बटी नजर आ रही थी। ऐसे में किसी भी प्रकार इस अंतर को समाप्त करने, कम से कम ऊपरी तौर पर तो, का प्रयास जरूरी था। हालांकि संगठन के कई लोगों को यह निर्णय रास नहीं आ रहा है क्योंकि अहम की इस लड़ाई में एक पक्ष की हार और एक पक्ष की जीत साफ नजर आ रही है जो कि गुटीय संघर्षों के समझौतों की सामान्य अवधारणा, तेरी भी जय जय मेरी भी जय-जय, के पूरी तरह खिलाफ है। पर यह देखने वाली बात होगी कि क्या वाकई आलाकमान की यह पॉलिटिकल इंजीनियरिंग कुछ जोरदार गुल खिलाएगी। अंजाम भले ही जो लेकिन अब एक बात तय है कि राजस्थान की राजनीति में भाजपा का एकमात्र चेहरा वसुन्धरा राजे ही है। कांग्रेस और भाजपा के बीच तेज होती जंग और आरोपों की तीखी धार के बीच रोज नई-नई खबरें सुर्खियां बनेंगी।
Friday, February 25, 2011
सवाल हां और ना के बीच पिसती जनता का
मेरे एक सीनियर अक्सर कहा करते थे, चुनाव के बाद बस बैंचे बदल जाती हैं हालात नहीं। राजस्थान विधानसभा के मंगलवार से प्रारम्भ बजट सत्र की कार्रवाई को देखने के बाद वाकई यही लगता है कि हालात बदलने इतने आसान भी नहीं। विधानसभा में उठने वाला हर मुद्दा अपनी अहमियत के बजाय पक्ष विपक्ष की रस्साकसी में उलझ कर रह जाता नजर आता है। विधानसभा के इस सत्र की शुरुआत में राज्यपाल के लम्बे अभिभाषण में जहां आंकड़ों की माया पसरी थी वहीं सुनने वालों को कुछ भी नएपन का अहसास नहीं हो रहा था, कई बार ऐसा भी लगा कि क्या इतनी छोटी-छोटी उपलब्धियां भी अभिभाषण में होनी चाहिए। पर शायद सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह अपनी उपलब्धियों को इसी बहाने विधानसभा की कार्रवाई का अंग बनाए और उनका बखान करे। पर इसके बाद जब इस पर करीब पन्द्रह घण्टे की बहस होती है और करीब चालीस से अधिक वक्ता अपने तर्क पेश करते हैं तो वह राजस्थान के विकास या सरकार के कामकाज के विश्लेषण से भटक कर कांग्रेस और भाजपा के आपसी विरोध पर आ टिकती है। हर महारथी यह साबित करने में जुटा नजर आता है कि उसके व्यंग्य बाण सबसे पैने हैं। यहां तक कि सामान्य प्रश्नकाल के दौरान भी मंत्री अपने किए को सही साबित करने की बजाय पिछली सरकारों के कामकाज पर बेजा टिप्पणियां करने में जुटे रहते हैं। पहली बार आए एक विधायक ने तो बहस के दौरान यह कहा भी कि हम हां पक्ष में हैं तो हमें हां और आप ना पक्ष में हो तो आपको ना कहना ही है। क्या वाकई इसी तरह की बहस के लिए यह व्यवस्था की गई थी। पूरी बहस में एक दो वक्ताओं को छोड़कर किसी ने भी अभिभाषण को लेकर बात नहीं कि। भाजपा विधायकों का खास शगल मंत्रीमंडल के बयान रहे तो कांग्रेसी विधायकों ने पिछली भाजपा सरकार की खिंचाई करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। इस बीच जो दो तीन काम के मुद्दे उठे वे बेजा टिप्पणियों और बेकार की बहसबाजी में उलझ कर रह गए। कांग्रेस की ओर से तो खैर कोई ऐसा नाम याद नहीं आता जिसने सरकार के कामकाज की ओवरआल प्रशंसा करने के अलावा कोई खास काम की बात कही हो।हां, रमेश खंडेलवाल ने जरूर विधवाओं की पेंशन की शर्तों को हटाने की मांग की। भाजपा में राव राजेन्द्र सिंह ने आंकड़ों के हवाले से अभिभाषण की कमियां उजागर की तो रोहिताश कुमार ने परिवहन नीति बनाने की मांग की। वाकई उनकी बात में दम था कि क्या रोडवेज की साढे चार हजार बसें पूरे प्रदेश के लिए पर्याप्त हैं और क्यों सरकार रोडवेज को प्रोफिट मेकिंग कारपोरेशन मानता है। जब गांव सड़क से जुड़ गए हैं तो उन पर बस क्यों नहीं चलनी चाहिए। मेरे सीनियर्स का कहना था कि अच्छा है इस बार विधानसभा में कार्यवाही हंगामे की भेंट नहीं चढ़ी कम से कम बहस तो हो रही है,, चलो यदि वे इसे अच्छा कह रहे हैं तो वाकई बुरा इससे और भी बहुत बुरा होता होगा।
Subscribe to:
Posts (Atom)



